बाद की मोरक्को जीवनी-परंपरा और आधुनिक सूचीकरण सामान्यतः अल-जज़ूली का जन्म लगभग 807 हिजरी / 1404 ईस्वी के आसपास रखते हैं। वे दक्षिणी मोरक्को के जज़ूला/सूस क्षेत्र से आए, जो उनकी निस्बतों अल-जज़ूली और अल-सिमलाली में झलकता है। सबसे मज़बूत जाँचे गए प्रमाणों में जन्म का सटीक दिन, महीना और गाँव सुरक्षित रूप से स्थापित नहीं हैं, इसलिए क्षेत्रीय मूल सीमित स्थानीय दावों से अधिक भरोसेमंद है।
इमाम मुहम्मद इब्न सुलैमान अल-जज़ूली अल-शाज़िली रहमतुल्लाहि अलैह
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अल-जज़ूली की मृत्यु 1460 के दशक के मध्य में हुई। स्रोत और आधुनिक शोध 869 हिजरी और 870 हिजरी के बीच भिन्नता सुरक्षित रखते हैं, जबकि आधुनिक संदर्भों में 1465 ईस्वी सामान्य है; बाद की मोरक्को परंपरा अक्सर 16 रबी अल-अव्वल 870 हिजरी देती है। ज़हर दिए जाने की कहानी व्यापक रूप से दोहराई गई है, लेकिन वह बाद के स्रोतों से आती है और स्वयं अल-ज़िरिकली भी उसे सावधानी से ‘कहा जाता है’ के रूप में देते हैं। इसलिए सबसे सुरक्षित ऐतिहासिक निष्कर्ष यह है कि अल-जज़ूली की मृत्यु 1460 के दशक के मध्य में हुई, जबकि विष देना प्रमाणित फोरेंसिक तथ्य के बजाय बाद की संबद्ध रिपोर्ट है।
बाद की मोरक्को जीवनी-परंपरा अल-जज़ूली की पहली दफ़न-स्थली अफ़ूग़ाल में रखती है। बाद में सादी शासन में उनके अवशेष मराकेश स्थानांतरित किए गए, जहाँ सीदी मुहम्मद इब्न सुलैमान अल-जज़ूली की ज़ाविया और समाधि प्रमुख धार्मिक स्थल बन गई। पारंपरिक विवरण कभी स्थानांतरण को उनकी मृत्यु के सतहत्तर वर्ष बाद रखते हैं और शरीर के अक्षत रहने का चमत्कार जोड़ते हैं, जबकि आधुनिक ऐतिहासिक पुनर्निर्माण पुनःदफ़न को अधिक संभावना से लगभग 930 हिजरी / 1523-24 ईस्वी के आसपास, मराकेश में सादी सत्ता के सुदृढ़ होने के निकट रखता है। वर्तमान नक्शा-बिंदु, लगभग 31.63645, -7.99191 उत्तरी मदीना / रियाद लआरूस क्षेत्र में, वर्तमान समाधि और ज़ाविया की पहचान करता है; यह अफ़ूग़ाल की मूल पहली दफ़न-स्थली नहीं है। इसलिए वर्तमान स्थान को तत्काल मूल क़ब्र के बजाय सावधानी से बाद की संबद्ध दफ़न-स्थली माना जाता है।
जीवनी और ऐतिहासिक परिचय
उच्च अध्ययन के लिए अल-जज़ूली को फ़ेज़ भेजा गया। मोरक्को की संस्थागत इतिहास-परंपरा और बाद के जीवनी स्रोत उन्हें सफ़्फ़ारिन मदरसा और अल-क़रविय्यीन के आसपास के विद्वत संसार से जोड़ते हैं। उन्हें मालिकी फ़िक़्ह का गंभीर विद्यार्थी माना गया और बाद की परंपराएँ अल-मुदव्वना और इब्न अल-हाजिब से संबद्ध प्रमुख विधिक ग्रंथों के गहन अध्ययन या कंठस्थ करने का श्रेय देती हैं। मज़बूत मालिकी शिक्षा का व्यापक चित्र अच्छी तरह समर्थित है, यद्यपि छात्र-जीवन के सटीक शिक्षक-सूची और तिथियाँ कम निश्चित हैं।
उनके विद्वत निर्माण के साथ सूफ़ी प्रशिक्षण भी जुड़ा। आधुनिक शोध मुहम्मद अमग़ार को, जो सनहाजिय्या/शाज़िली परिवेश से जुड़े एक गुरु थे, अल-जज़ूली के आध्यात्मिक विकास के महत्वपूर्ण प्रारंभिक मार्गदर्शक के रूप में पहचानता है। बाद में अल-जज़ूली के चारों ओर बनी परंपरा व्यापक शाज़िली संसार से संबंधित थी, लेकिन उसने पैग़म्बर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से मुहब्बत पर अपना विशेष और सशक्त ज़ोर विकसित किया। जज़ूलिय्या में पैग़म्बर पर सलावत केवल कभी-कभार की भक्ति नहीं रही; वह स्मरण, प्रशिक्षण और सामूहिक पहचान की अनुशासित पद्धति बन गई।
अल-जज़ूली ने मोरक्को से बाहर भी यात्राएँ कीं और मुस्लिम पूर्व में एक महत्वपूर्ण अवधि बिताई। बाद की कथाएँ अलग-अलग रूप में मिस्र, हिजाज़, यरूशलम, मक्का और मदीना का नाम लेती हैं और कभी इन यात्राओं को बहुत लंबा समय देती हैं। प्रमाण किसी एक सटीक मार्ग से अधिक पूर्वी यात्रा के व्यापक तथ्य के लिए मज़बूत है। इसलिए इन यात्राओं को उनके विद्वत और आध्यात्मिक परिपक्वता के महत्वपूर्ण चरण के रूप में समझना सबसे सुरक्षित है, बिना बाद की कथाओं को एक सटीक यात्रा-कैलेंडर में बाध्य किए।
मोरक्को लौटने के बाद अल-जज़ूली ने बढ़ती संख्या में शिष्यों को एकत्र किया और उस आंदोलन को विकसित किया जो बाद में जज़ूलिय्या कहलाया। स्रोत और आधुनिक शोध उनकी गतिविधियों के चरणों को साफी, अज़मूर और अफ़ूग़ाल जैसे स्थानों से जोड़ते हैं। उनका प्रभाव ऐसे समाज में बढ़ा जो गंभीर राजनीतिक तनाव से जूझ रहा था। मरिनिद सत्ता कमज़ोर हो रही थी, अल-अंदलुस में मुस्लिम शक्ति बहुत घट चुकी थी और पुर्तगाली विस्तार मोरक्को के अटलांटिक तट पर दबाव डाल रहा था। इसलिए आधुनिक इतिहासकारों ने जज़ूलिय्या को केवल निजी रहस्यवाद का घेरा नहीं, बल्कि राजनीतिक और सैन्य असुरक्षा के दौर में सामुदायिक अनुशासन मज़बूत करने वाली धार्मिक संगठन-व्यवस्था भी माना है।
अल-जज़ूली की विरासत के केंद्र में दलाइल अल-ख़ैरात वा शवारिक़ अल-अनवार फ़ी ज़िक्र अल-सलात अला अल-नबी अल-मुख़्तार है। पूरे शीर्षक का अर्थ लगभग यह है: चुने हुए पैग़म्बर पर सलावत के स्मरण में भलाई के मार्ग और चमकते प्रकाश। यह मुख्यतः पैग़म्बर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर सलावत के लिए समर्पित भक्तिपरक मार्गदर्शिका है, जिसमें ऐसी दुआ के गुण, पैग़म्बर के नाम और प्रशंसाएँ, तथा उनके पवित्र विश्राम-स्थल से जुड़ी सामग्री भी है।
अल-जज़ूली ने पुस्तक क्यों संकलित की, इसका सबसे मज़बूत प्रमाण पुस्तक की अपनी प्रस्तावना से आता है। वहाँ वे सार रूप में बताते हैं कि वे पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर सलावत और उनके गुणों को ऐसी रूपरेखा में एकत्र करना चाहते थे जो आसानी से याद और पढ़ी जा सके। वे यह भी बताते हैं कि इसी व्यावहारिक उद्देश्य से विस्तृत इस्नाद को व्यवस्था से बाहर रखा। लेखक का यह कथन प्रेरणा के क्षण से जुड़ी बाद की कहानियों की तुलना में ऐतिहासिक रूप से अधिक सुरक्षित है। इससे पता चलता है कि दलाइल अल-ख़ैरात को पूर्ण इस्नादों पर आधारित पारंपरिक हदीस-संग्रह के बजाय उपयोगी भक्तिपरक पुस्तिका के रूप में सोचा गया था।
आधुनिक शोध संकेत करता है कि पाठ पंद्रहवीं सदी के मध्य के मोरक्को में आकार लिया और संभव है कि लगभग 1453 ईस्वी तक अल-जज़ूली के शिष्यों के लिए प्रारंभिक पुस्तिका के रूप में मौजूद था। मोरक्को की संस्थागत स्मृति इसके संकलन को फ़ेज़ में उनके विद्वत वर्षों से भी जोड़ती है। इन परंपराओं को एक ही क्षण में बाँधना आवश्यक नहीं; उपलब्ध पांडुलिपि इतिहास समय के साथ संकलन, संशोधन, नकल और पाठ-रूपों के विकास की गुंजाइश देता है। भरोसे के साथ इतना कहा जा सकता है कि पुस्तक अल-जज़ूली के भक्तिपरक कार्यक्रम से निकली और शीघ्र ही उनके अनुयायियों के आध्यात्मिक जीवन में केंद्रीय हो गई।
पाठ को तिलावत के लिए बनाया गया था। उसके बार-बार आने वाले सूत्र, लयबद्ध गद्य और व्यावहारिक संगठन ने उसे निजी भक्ति, कंठस्थ करने और सामूहिक पाठ के लिए अनुकूल बनाया। आधुनिक विद्वानों द्वारा जाँची गई एक महत्वपूर्ण पाठ-परंपरा में चार सौ से अधिक दुआएँ आठ अहज़ाब में सोमवार से सोमवार के चक्र पर व्यवस्थित हैं; अनेक बाद की मुद्रित परंपराएँ इसके बजाय सात दैनिक भागों का उल्लेख करती हैं। यह अंतर पुस्तक के वास्तविक प्रसारण-इतिहास का हिस्सा है, कोई ऐसी त्रुटि नहीं जिसे हर पांडुलिपि पर एक आधुनिक संस्करण थोपकर हल किया जा सके।
अन्य प्रसिद्ध विशेषताओं ने भी पुस्तक की भक्तिपरक पहचान को आकार दिया। एक प्रमुख खंड पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के नामों की लंबी सूची देता है, और आधुनिक शोध में जाँची गई पाठ-परंपरा में लगभग 201 नाम हैं। दलाइल अल-ख़ैरात में पैग़म्बर की क़ब्र या रौज़ा से जुड़ी सामग्री भी है, और कई पांडुलिपियों में मक्का और मदीना के पवित्र स्थलों के पहले योजनाबद्ध और बाद में अधिक विस्तृत चित्र विकसित हुए। ये दृश्य तत्व पुस्तक से जुड़ी पांडुलिपि-संस्कृति की महत्वपूर्ण पहचान बन गए और अनेक प्रतियों को पाठ तथा पवित्र कला दोनों की वस्तु बना दिया।
एक प्रसिद्ध लेकिन बाद की भक्तिपरक कथा पुस्तक की उत्पत्ति का दूसरा स्पष्टीकरण देती है। इस कथा के अनुसार अल-जज़ूली को एक बार वुज़ू या नमाज़ के लिए पानी चाहिए था, लेकिन वे गहरे कुएँ से पानी नहीं निकाल सके। फिर एक छोटी लड़की ने पानी ऊपर ला दिया और बताया कि उसका आध्यात्मिक दर्जा पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर बहुत अधिक सलावत के कारण है, जिससे अल-जज़ूली को उन पर दुरूद की पुस्तक संकलित करने की प्रेरणा मिली। यह कहानी भक्तिपरक स्मृति में प्रभावशाली बनी, लेकिन अल-जज़ूली के कई सदियों बाद के स्रोतों में आती है, जिनमें अहमद अल-सावी से चली रिपोर्ट भी है जिसे यूसुफ़ अल-नबहानी ने दर्ज किया। इसलिए इसे दलाइल अल-ख़ैरात की रचना का सत्यापित प्रत्यक्षदर्शी कारण नहीं, बल्कि बाद की हागियोग्राफ़िक परंपरा माना जाना चाहिए।
पुस्तक की सफलता अल-जज़ूली के बाद की पीढ़ी में ही दिखाई देने लगी। उनके शिष्य अब्द अल-अज़ीज़ अल-तब्बा, जो जज़ूलिय्या में महत्वपूर्ण उत्तराधिकारी बने, आधुनिक शोध में पंद्रहवीं सदी के अंतिम दौर तक फ़ेज़ के मदरसा अल-अत्तारिन में संगठित सामूहिक पाठ से जुड़े हैं। यह प्रारंभिक सामुदायिक उपयोग महत्वपूर्ण है: दलाइल अल-ख़ैरात किसी छोटे समूह की निजी पांडुलिपि बनकर नहीं रह गई। वह ऐसी सामूहिक भक्तिपरक साधना बन गई जो सलावत के साझा क्रम के माध्यम से समुदायों को जोड़ सकती थी।
प्रतियाँ बढ़ने के साथ पुस्तक मोरक्को से बहुत दूर चली गई। यह प्रारंभिक आधुनिक इस्लामी दुनिया की सबसे अधिक नकल की जाने वाली सुन्नी भक्तिपरक कृतियों में से एक बनी और उत्तरी अफ़्रीका, उस्मानी साम्राज्य, हिजाज़, सहारा के दक्षिण का अफ़्रीका, मध्य और दक्षिण एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया तथा चीन तक फैली। विशेष रूप से उस्मानी पांडुलिपियाँ व्यापक नकल, अलंकरण और विभिन्न सामाजिक समूहों में उपयोग दिखाती हैं। अलग-अलग क्षेत्रों में नकलनवीसों और कलाकारों ने पुस्तक के दृश्य कार्यक्रम को ढाला, विशेषतः मक्का, मदीना और पैग़म्बर के रौज़ा के चित्रण में, जबकि पाठकों ने पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर नियमित सलावत की केंद्रीय साधना बनाए रखी। विशाल पांडुलिपि-परंपरा ने पाठ-भिन्नताएँ भी पैदा कीं। प्रतियाँ क्रम, शब्द, विभाजन और चित्रों में अलग हैं, और बाद के विद्वानों ने प्रामाणिक पाठ-रूप स्थापित करने के लिए पांडुलिपियों की तुलना की। यह इतिहास महत्वपूर्ण है क्योंकि दलाइल अल-ख़ैरात को एक आधुनिक मुद्रित व्यवस्था तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। उसका प्रभाव जीवित पांडुलिपि और पाठ-परंपरा से फैला, जिसमें समुदाय सदियों तक उसे नकल करते, पढ़ाते, सुधारते, सजाते और प्रसारित करते रहे।
अल-जज़ूली के अंतिम वर्ष बाद की मोरक्को परंपरा में अफ़ूग़ाल से जुड़े हैं। उनकी मृत्यु 1460 के दशक के मध्य में रखी जाती है; स्रोतों में 869 हिजरी और 870 हिजरी दोनों आते हैं और आधुनिक संदर्भों में 1465 ईस्वी सामान्य है। बाद की परंपरा अक्सर 16 रबी अल-अव्वल 870 हिजरी बताती है। ज़हर दिए जाने की रिपोर्ट व्यापक हुई, लेकिन अल-ज़िरिकली जैसे बाद के जीवनीकार भी इसे सावधानी से बताते हैं और विस्तृत विष-कथाएँ बाद की हागियोग्राफी से संबंधित हैं। सुरक्षित ऐतिहासिक निष्कर्ष उनकी मृत्यु 1460 के दशक के मध्य में है; सटीक कारण को प्रमाणित तथ्य के बजाय संबद्ध रिपोर्ट ही रहना चाहिए।
बाद की मोरक्को जीवनी-परंपरा के अनुसार अल-जज़ूली को पहले अफ़ूग़ाल में दफ़न किया गया। बाद में सादी सत्ता के उभार के समय उनके अवशेष मराकेश स्थानांतरित किए गए। पारंपरिक वर्णन कभी कहते हैं कि स्थानांतरण उनकी मृत्यु के सतहत्तर वर्ष बाद हुआ और शरीर के अक्षत पाए जाने का भक्तिपरक तत्व भी जोड़ते हैं, जबकि आधुनिक ऐतिहासिक पुनर्निर्माण पुनःदफ़न को अधिक संभावना से लगभग 930 हिजरी / 1523-24 ईस्वी के आसपास, मराकेश में सादी नियंत्रण के मज़बूत होने के निकट रखता है। स्थानांतरण और मराकेश की समाधि व्यापक रूप में सुरक्षित हैं, लेकिन सटीक अंतराल और चमत्कारिक विवरण अलग-अलग प्रमाण-स्तरों से संबंधित हैं।
मराकेश में सीदी मुहम्मद इब्न सुलैमान अल-जज़ूली की ज़ाविया एक प्रमुख धार्मिक संस्था बनी और बाद की शहरी भक्तिपरक भूगोल में मराकेश के सात औलिया की यात्रा के पड़ावों में शामिल हुई। यह विकास उनकी मृत्यु के बाद के ग्रहण-इतिहास का हिस्सा है, न कि ऐसी संस्था जिसे उन्होंने अपने जीवन में उसके बाद वाले रूप में स्वयं स्थापित किया हो। फिर भी यह दिखाता है कि उनकी स्मृति शहर के पवित्र परिदृश्य में कितनी गहराई से जम गई। अल-जज़ूली का प्रभाव केवल एक पुस्तक की प्रसिद्धि पर आधारित नहीं था। जज़ूलिय्या और दलाइल अल-ख़ैरात के माध्यम से उन्होंने नियमित सलावत को ऐसी चलायमान भक्तिपरक साधना बनाने में मदद की जिसे याद किया जा सके, सामूहिक रूप से पढ़ा जा सके, सुंदरता से लिखा जा सके और भाषाओं, क्षेत्रों तथा राजनीतिक सीमाओं के पार पहुँचाया जा सके। बाद की सुन्नी संस्थाओं ने पुस्तक को मूल्यवान भक्ति के रूप में समर्थन दिया, जबकि कुछ आधुनिक सलफ़ी प्रवृत्ति के आलोचकों ने कुछ सूत्रों पर आपत्ति की। यह बाद की बहस पुस्तक के ग्रहण-इतिहास का हिस्सा है; इससे अल-जज़ूली की लेखकीय पहचान या पुस्तक की असाधारण पांडुलिपि, कलात्मक और भक्तिपरक विरासत के ऐतिहासिक प्रमाण नहीं बदलते।
ऐतिहासिक महत्व और विरासत
उनका कार्य-जीवन पंद्रहवीं सदी के मोरक्को में शाज़िली परंपरा के विकास का एक महत्वपूर्ण चरण भी है। जज़ूलिय्या ने विरासत में मिले सूफ़ी प्रशिक्षण को सलावत और पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से लगाव पर असामान्य रूप से केंद्रित ज़ोर के साथ जोड़ा। अल-जज़ूली के बाद की पीढ़ी में अब्द अल-अज़ीज़ अल-तब्बा जैसे व्यक्तियों ने तरीक़ा और दलाइल अल-ख़ैरात के सामूहिक पाठ दोनों को आगे बढ़ाने में मदद की। इस नेटवर्क ने मोरक्को के धार्मिक जीवन को प्रभावित किया और अल-जज़ूली की मृत्यु के बहुत बाद की सूफ़ी वंश-परंपराओं में भी समा गया।
अल-जज़ूली का आंदोलन दबाव में पड़े मोरक्को के सामाजिक इतिहास का भी हिस्सा है। आधुनिक शोध उसके उभार को मरिनिद पतन, राजनीतिक विखंडन, अटलांटिक तट पर पुर्तगाली विस्तार और अल-अंदलुस में अधिकांश मुस्लिम शासन के पतन से पैदा हुए व्यापक हानि-बोध के बीच रखता है। इस संदर्भ में सामूहिक पैग़म्बरी भक्ति आध्यात्मिक प्रशिक्षण और सामुदायिक एकजुटता की भाषा दोनों बन सकती थी। इस व्याख्या को अल-जज़ूली की अपनी पुस्तक की स्पष्ट व्याख्या से अलग रखना चाहिए, जो राजनीतिक घोषणापत्र के बजाय भक्तिपरक और व्यावहारिक थी।
दलाइल अल-ख़ैरात की पांडुलिपि-इतिहास ने अल-जज़ूली को भक्तिपरक साहित्य के साथ इस्लामी कला में भी महत्वपूर्ण बनाया। उत्तरी अफ़्रीका, उस्मानी दुनिया, अफ़्रीका, एशिया और चीन तक प्रतियाँ बनाई और सजाई गईं। मक्का, मदीना और पैग़म्बर के रौज़ा के चित्र अनेक पांडुलिपियों की विशेष पहचान बन गए। पाठांतर, अलग-अलग पाठ-विभाजन और बाद के विद्वानों द्वारा प्रामाणिक रूपों की तुलना करने के प्रयास एक जीवित परंपरा दिखाते हैं जिसे नकल और उपयोग किया गया, न कि एक ही रूप में जकड़ दिया गया।
मोरक्को में उनकी मरणोत्तर महत्ता भी उतनी ही स्पष्ट है। सादी शासन में अफ़ूग़ाल से मराकेश उनके अवशेषों का स्थानांतरण उनकी ज़ाविया को एक प्रमुख पवित्र संस्था बनाने में सहायक हुआ और बाद में उन्हें मराकेश के सात औलिया के मार्ग में शामिल किया गया। उसी समय दलाइल अल-ख़ैरात का वैश्विक इतिहास उनका नाम उस समाधि से बहुत आगे ले गया। पारंपरिक सुन्नी संस्थाएँ आज भी पुस्तक का सम्मान करती हैं, जबकि कुछ आधुनिक सुधारवादी और सलफ़ी आलोचक कुछ विशिष्ट सूत्रों पर आपत्ति करते हैं। दोनों प्रतिक्रियाओं को दर्ज करना सटीक ग्रहण-इतिहास का हिस्सा है: मतभेद बाद की धर्मशास्त्रीय समीक्षा से जुड़ा है, जबकि अल-जज़ूली की लेखकीय पहचान, पांडुलिपि-परंपरा का विशाल विस्तार और पुस्तक का दीर्घ सांस्कृतिक प्रभाव ऐतिहासिक रूप से अच्छी तरह स्थापित हैं।
पारिवारिक संबंध
स्रोत
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al-A'lam, entry on Muhammad ibn Sulayman al-Jazuli | Khayr al-Din al-Zirikli | Vol. 6, p. 151 in displayed digital edition | https://ablibrary.net/book_content/182/151 | नाम के रूपांतर, 807-870 हिजरी कालक्रम, फ़ेज़ अध्ययन, दलाइल की लेखकीयता, अफ़ूग़ाल मृत्यु/दफ़न परंपरा, सावधान विष-रिपोर्ट और स्थानांतरण परंपरा
Collating The Signs of Benevolent Deeds: Muḥammad al-Mahdī al-Fāsī's Textual Criticism of Dalāʾil al-Khayrāt | Guy Burak | Philological Encounters 4/1-2 (2019), pp. 135-157; DOI 10.1163/24519197-12340066 | https://doi.org/10.1163/24519197-12340066 | पांडुलिपि भिन्नताएँ, बाद की तुलना और प्रामाणिक पाठ-रूप स्थापित करने के प्रयास
Dala'il al-Khayrat in the Ottoman Empire: Manuscripts and Readership | Sabiha Göloğlu | Journal of Islamic Manuscripts 12/3-4 (2021); DOI 10.1163/1878464X-01203009 | https://doi.org/10.1163/1878464X-01203009 | उस्मानी नकल, मुद्रण, पाठक, दृश्य संस्कृति और भक्तिपरक उपयोग
L’itinérance de “morts très spéciaux” sur les routes du Maroc médiéval: Des destins singuliers | Hicham Rguig | Hespéris-Tamuda LVIII/2 (2023), pp. 301-327; al-Jazuli discussion around p. 317 | https://www.hesperis-tamuda.com/Downloads/2020-2029/2023/Fascicule-2/11.pdf | अफ़ूग़ाल से मराकेश तक अल-जज़ूली के स्थानांतरण का ऐतिहासिक पुनर्निर्माण, लगभग 930 हिजरी/1523-24 ईस्वी को अधिक संभावित मानता है; शरीर के अक्षुण्ण रहने की कथा को बाद की मनाक़िबी परंपरा के रूप में अलग करता है
The Story Behind the Dala'il al-Khayrat | Dar al-Hadith introductory booklet | p. 6; यूसुफ़ अल-नबहानी द्वारा अहमद अल-सावी की रिवायत | https://www.daralhadith.org.uk/wp-content/uploads/2017/08/Dalail-al-Khayrat-Introduction-Dua-Khatam-Booklet.pdf | कुएँ और छोटी लड़की वाली रचना-कथा का प्रत्यक्ष रूप से जाँचा जा सकने वाला बाद का साक्ष्य; केवल LATE_TRADITION के रूप में उपयोग
Sa'adat al-Darayn fi al-Salat 'ala Sayyid al-Kawnayn | Yusuf al-Nabhani | बाद का सलावत-संकलन; 394 पृष्ठों की उपलब्ध इलेक्ट्रॉनिक प्रति | https://shamela.org/pdf/2ad7c65c6422e5f3223cff9b0fc79c13 | बाद की भक्तिपरक स्वीकृति और सलावत-परंपरा; कुएँ की कथा के अकेले प्रमाण के रूप में उपयोग नहीं
Zawiya of Sidi Muhammad Ben Slimane al-Jazuli | Wikidata / linked heritage data | Entity Q95149901; Saadian-era shrine, founder Ahmad al-Araj, 16th century | https://www.wikidata.org/wiki/Q95149901 | वर्तमान समाधि की पहचान और बाद की सादी संस्थागत स्थापना
Tomb of Sidi Muhammad ibn Sulayman al-Jazuli | OpenStreetMap-derived Mapcarta | OSM node 5734277151; current coordinate 31.63645,-7.99191 | https://mapcarta.com/N5734277151 | वर्तमान समाधि-बिंदु और मराकेश स्थल की पहचान; निर्देशांक 31.63645,-7.99191
Modern critical reception of Dala'il al-Khayrat | Islamweb | Fatwa 10519 | https://www.islamweb.net/ar/fatwa/10519/ | कुछ सूत्रों पर बाद की सलफ़ी-प्रवृत्ति की आपत्तियाँ; केवल आधुनिक ग्रहण-विवाद दर्ज करने के लिए, जीवनी के लिए नहीं
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