क़ुरआन मूसा अलैहिस्सलाम और उनके साथियों की नजात को एक इलाही घटना के रूप में बताता है जिसमें समुद्र अलग हुआ और पीछा करने वाले डूब गए। आधुनिक जल-गतिकी में एक वास्तविक प्रक्रिया का अध्ययन किया गया है जिसमें तेज़ और लगातार हवा उथले पानी को एक ओर धकेलकर पहले डूबी हुई ज़मीन को कुछ समय के लिए प्रकट कर सकती है। दो हज़ार दस की एक गणनात्मक शबीह-साज़ी में पूर्वी नील डेल्टा की पुनर्निर्मित पुरानी भौगोलिक स्थिति में अस्थायी सूखा रास्ता बना, और दो हज़ार तेरह की बाद की जाँच में मॉडल के कुछ मान बदलने पर उसकी अवधि बदल गई। ये अध्ययन एक संभावित भौतिक प्रक्रिया दिखाते हैं, लेकिन ऐतिहासिक पार होने की जगह या क़ुरआनी घटना को वैज्ञानिक रूप से सिद्ध नहीं करते।
इस भौतिक प्रक्रिया में लगातार तेज़ हवा उथले पानी की सतह पर दबाव डालती है और पानी को हवा की दिशा में धकेलती है। इसके कारण विपरीत ओर पानी का स्तर नीचे जा सकता है और ऐसी ज़मीन थोड़े समय के लिए दिखाई दे सकती है जो पहले पानी में डूबी हुई थी। जल-गतिकी में यह एक पहचानी हुई प्रक्रिया है और इसका गणनात्मक नमूना बनाया जा सकता है।
दो हज़ार दस में कार्ल ड्रूज़ और वेईचिंग हान ने स्वेज़ और पूर्वी नील डेल्टा में इस प्रक्रिया पर अध्ययन प्रकाशित किया। उन्होंने प्राचीन तानिस झील और कदुआ के पास कांस्य युग के अंतिम दौर की पुनर्निर्मित भौगोलिक स्थिति का मॉडल बनाया। लगभग अट्ठाईस मीटर प्रति सेकंड की लगातार पूर्वी हवा के साथ शबीह-साज़ी में लगभग तीन से चार किलोमीटर लंबा और करीब पाँच किलोमीटर चौड़ा सूखा रास्ता बना, जो लगभग चार घंटे खुला रहा। शोधकर्ताओं ने स्वयं लिखा कि उस प्राचीन समय में पूर्वी नील डेल्टा की सही भौगोलिक स्थिति पूरी निश्चितता से ज्ञात नहीं है।
दो हज़ार तेरह में ड्रूज़ ने एरी झील के अवलोकनों से मॉडल के कुछ मान दोबारा जाँचे और फिर उन सुधारों को कदुआ वाले नमूने पर लागू किया। तल की रगड़ कम करने और लहरों का प्रभाव जोड़ने पर अट्ठाईस मीटर प्रति सेकंड की हवा में सूखा रास्ता लगभग नौ दशमलव नौ घंटे खुला रहा। उसी सुधरे हुए नमूने में लगभग चार घंटे की अवधि करीब चौबीस मीटर प्रति सेकंड की हवा पर मिली।
इन परिणामों की सीमा स्पष्ट रहनी चाहिए। वे बताते हैं कि विशेष रूप से पुनर्निर्मित उथली भौगोलिक स्थिति में लगातार तेज़ हवा पानी को इतना पीछे कर सकती है कि थोड़े समय के लिए सूखी राह बने। लेकिन वे यह सिद्ध नहीं करते कि कदुआ ही मूसा अलैहिस्सलाम के ऐतिहासिक पार होने की जगह थी, और न ही वे क़ुरआनी विवरण की हर विशेषता को दोहराते हैं। क़ुरआन समुद्र के अलग होने को अल्लाह के आदेश से हुई निशानी बताता है, जबकि वैज्ञानिक अध्ययन निश्चित मान्यताओं और मॉडल की शर्तों के भीतर एक संभावित भौतिक प्रक्रिया की जाँच करता है।
इसलिए संतुलित प्रस्तुति यह है कि क़ुरआनी घटना अपने दीन संबंधी स्थान पर बनी रहे और हवा से पानी के पीछे हटने वाले नमूने को आधुनिक शोध के रूप में दिखाया जाए, जो यह बताता है कि कुछ उथले जल-क्षेत्रों में तेज़ लगातार हवा से अस्थायी सूखा रास्ता बन सकता है।
निष्कर्ष
हवा से पानी का पीछे हटना एक वास्तविक जल-गतिकीय प्रक्रिया है और मॉडल दिखाते हैं कि लगातार तेज़ पूर्वी हवा किसी पुनर्निर्मित उथले जल-क्षेत्र में अस्थायी सूखी राह खोल सकती है। इसे पार होने से संबंधित आधुनिक भौतिक शोध के रूप में प्रस्तुत करना उचित है, ऐतिहासिक स्थान या क़ुरआनी मौजज़े के वैज्ञानिक प्रमाण के रूप में नहीं।
स्रोत
DIRECT_SUPPORT_FOR_CLM-0090-02=PASS
DIRECT_SUPPORT_FOR_CLM-0090-05=PASS