हज़रत क़ाज़ी अबू सअद अल-मुबारक बिन अली बिन अल-हुसैन अल-मुख़र्रिमी रहिमहुल्लाह

वंश शोध नोट — और देखें
शास्त्रीय पहचान “अल-मुबारक बिन अली बिन अल-हुसैन, अबू सअद अल-मुख़र्रिमी” विश्वसनीय रूप से प्रमाणित है, इसलिए उनके पिता अली बिन अल-हुसैन को सुरक्षित रखा गया है। ‘अल-मुख़र्रिमी’ निस्बत बग़दाद के एक स्थान अल-मुख़र्रिम से जुड़ी है। उन्हें बहुत बाद के फ़ख़रुद्दीन अबू सईद अल-मुबारक अल-मुख़र्रिमी से नहीं मिलाया गया, जिनकी मृत्यु 664 हिजरी में हुई। पिता के लिए कोई स्थायी रजिस्ट्री-कोड गढ़ा नहीं गया।
PER-000950 हनबली फ़क़ीह, क़ाज़ी, शिक्षक और हदीस रावी पुष्ट साझा कब्रिस्तान बिंदु सुन्नी स्रोत-दायरा
⚙️ प्रिंट, साझा और अन्य विकल्प
📱 व्हाट्सऐप 📧 ईमेल सहेजे गए पृष्ठ

क्यू आर संकेत

पृष्ठ का क्यू आर
पृष्ठ का क्यू आर
क़ाज़ी अबू सअद अल-मुबारक बिन अली बिन अल-हुसैन अल-मुख़र्रिमी रहिमहुल्लाह पाँचवीं और छठी हिजरी सदी के संधिकाल में बग़दाद के प्रमुख हनबली फ़क़ीह, क़ाज़ी, शिक्षक और हदीस रावी थे। इब्न अल-जौज़ी उनका जन्म रजब ४४६ हिजरी और मृत्यु १२ मुहर्रम ५१३ हिजरी दर्ज करते हैं। बाब अल-अज़ज में उनका मदरसा हनबली शिक्षा का महत्वपूर्ण केंद्र बना और अब्द अल-क़ादिर अल-जीलानी ने उनसे फ़िक़्ह पढ़ी, फिर बाद में उसी मदरसे में पढ़ाया और वअज़ किया।
जन्म

इब्न अल-जौज़ी उनका जन्म रजब ४४६ हिजरी में दर्ज करते हैं और इब्न अबी यअला भी ४४६ हिजरी का वर्ष देते हैं। जाँचे गए मजबूत शास्त्रीय स्रोत इससे अधिक सटीक दिन सिद्ध नहीं करते, इसलिए रजब ४४६ हिजरी को समर्थित ऐतिहासिक रूप में रखा गया है।

निधन

इब्न अल-जौज़ी स्पष्ट रूप से क़ाज़ी अबू सअद अल-मुख़र्रिमी रहिमहुल्लाह की मृत्यु १२ मुहर्रम ५१३ हिजरी दर्ज करते हैं। इब्न कसीर भी उनकी मृत्यु ५१३ हिजरी में रखते हैं और वही दफ़्न-निस्बत दोहराते हैं।

दफ़न या संबद्ध स्थान

इब्न अल-जौज़ी के अनुसार उन्हें अबू बक्र अल-ख़ल्लाल के पास, इमाम अहमद बिन हनबल की क़ब्र के पाँव की ओर दफ़्न किया गया। बग़दाद की शास्त्रीय भूगोल परंपरा अहमद बिन हनबल की क़ब्र को बाब हरब क़ब्रिस्तान में रखती है, इसलिए क़ाज़ी अबू सअद का ऐतिहासिक दफ़्न उसी क़ब्रिस्तान समूह में मजबूत रूप से स्थापित है। आधुनिक बग़दाद में उनकी अलग व्यक्तिगत क़ब्र विश्वसनीय रूप से पहचानी नहीं गई है। बाब हरब क़ब्रिस्तान का ऐतिहासिक परिवेश अधिक स्पष्ट रूप से बताया जा सकता है। अल-ख़तीब अल-बग़दादी इसे शहर से बाहर खंदक के पार क़ुत्रब्बुल जाने वाले मार्ग की दिशा में बताते हैं, इसे नेक लोगों की क़ब्रों के लिए प्रसिद्ध स्थान कहते हैं और अहमद इब्न हनबल तथा बिश्र अल-हाफ़ी की क़ब्रें वहीं रखते हैं। बाद में याक़ूत अल-हमवी भी अहमद इब्न हनबल, बिश्र अल-हाफ़ी, अल-ख़तीब अल-बग़दादी और असंख्य विद्वानों व इबादतगुज़ारों को उसी क़ब्रिस्तान में दर्ज करते हैं। इससे अबू सअद अल-मुख़र्रिमी का ऐतिहासिक दफ़्न-परिवेश बहुत मज़बूत सिद्ध होता है, यद्यपि आधुनिक बग़दाद में उनकी अलग क़ब्र की विश्वसनीय स्थायी निशानी अभी भी सिद्ध नहीं है।

जीवनी और ऐतिहासिक परिचय

क़ाज़ी अबू सअद अल-मुबारक बिन अली बिन अल-हुसैन अल-मुख़र्रिमी रहिमहुल्लाह अब्बासी बग़दाद के महत्वपूर्ण हनबली फ़क़ीह, क़ाज़ी, शिक्षक और हदीस रावी थे। शास्त्रीय स्रोत लगातार उनकी कुनियत “अबू सअद” देते हैं, “अबू सईद” नहीं, और उन्हें अल-मुख़र्रिमी अल-बग़दादी कहते हैं। इब्न अल-जौज़ी उनका जन्म रजब ४४६ हिजरी में दर्ज करते हैं और इब्न अबी यअला भी ४४६ हिजरी का वर्ष देते हैं। उनकी मृत्यु १२ मुहर्रम ५१३ हिजरी में हुई। उनका जीवन उस समय का है जब बग़दाद में हनबली फ़िक़्ह शिक्षण, न्यायिक सेवा और स्थायी मदरसों के माध्यम से अधिक संस्थागत हो रहा था।

उनकी शिक्षा में हदीस रिवायत और व्यवस्थित हनबली फ़िक़्ह दोनों शामिल थे। इब्न अबी यअला अबू अल-हुसैन इब्न अल-मुहतदी, जाबिर बिन यासीन, इब्न अल-मअमून, इब्न अल-नक़्क़ूर और अन्य को उनके हदीस-शैख़ों में गिनते हैं; इब्न अल-जौज़ी इब्न अल-मसलमा और अल-सैरफ़ीनी को भी जोड़ते हैं। फ़िक़्ह में उन्होंने क़ाज़ी अबू यअला के बौद्धिक मंडल के प्रमुख हनबली विद्वानों, विशेषतः अबू जअफ़र अब्द अल-ख़ालिक़ बिन ईसा इब्न अबी मूसा और याक़ूब अल-बरज़बीनी, से अध्ययन किया; अल-ज़हबी स्वयं क़ाज़ी अबू यअला को भी उनके शिक्षकों में रखते हैं।

प्रारंभिक हनबली जीवनियों में क़ाज़ी अबू सअद अल-मुख़र्रिमी के लिए किसी अलग सूफ़ी पीर या ख़िरक़ा देने वाले आध्यात्मिक मुर्शिद की सुरक्षित पहचान नहीं मिलती। उनके मज़बूती से सिद्ध विद्वत शिक्षक क़ाज़ी अबू यअला इब्न अल-फ़र्रा, अबू जअफ़र अब्दुल ख़ालिक़ इब्न ईसा इब्न अबी मूसा और याक़ूब इब्न सतूरा अल-बरज़बीनी थे; इब्न अल-जौज़ी यह भी लिखते हैं कि उन्होंने अबू यअला से हदीस और कुछ फ़िक़्ह सुनी। इसलिए किसी असिद्ध आध्यात्मिक पीर का नाम गढ़ने के बजाय इन्हीं प्रमाणित विद्वत शैख़ों को उनकी स्थापित शिक्षकीय कड़ी के रूप में रखा गया है।

अल-मुख़र्रिमी केवल विद्यार्थी नहीं रहे बल्कि सक्रिय फ़क़ीह बने। इब्न अबी यअला बताते हैं कि उन्होंने पढ़ाया, फ़तवा दिया, उनकी न्यायिक गवाही स्वीकार की गई और वे बाब अल-अज़ज के क़ाज़ी बने। इब्न अल-जौज़ी भी लिखते हैं कि उन्होंने कई न्यायिक अधिकारियों की ओर से नायब क़ाज़ी की सेवा की और उनके न्यायिक आचरण की प्रशंसा करते हैं। इस तरह उनका फ़िक़्ही जीवन कक्षा और अदालत दोनों में था: वे हनबली क़ानून पढ़ाते, विद्यार्थी तैयार करते और अब्बासी बग़दाद के न्याय प्रशासन में भाग लेते थे।

जीवनी स्रोत उनकी विद्वत्ता और व्यक्तिगत प्रतिष्ठा को भी रेखांकित करते हैं। इब्न अबी यअला उनके व्यवहार और संगति की प्रशंसा करते हैं और उन्हें अच्छा वाद-विवादकर्ता बताते हैं। वे नियमित रोज़े और रात की इबादत का भी उल्लेख करते हैं, जबकि अल-ज़हबी उन्हें संयमी और पवित्र चरित्र वाला कहते हैं। इन बातों को भक्तिपरक प्रमाण नहीं बल्कि जीवनी-साक्ष्य के रूप में पढ़ना चाहिए; फिर भी वे दिखाती हैं कि बाद के हनबली लेखकों ने उनकी पेशेवर प्रतिष्ठा को अनुशासित व्यक्तिगत धार्मिक अभ्यास के साथ याद रखा।

पुस्तकें उनकी विद्वत जीवन का एक और बड़ा हिस्सा थीं। इब्न अल-जौज़ी कहते हैं कि उन्होंने बहुत विशाल पुस्तक-संग्रह बनाया और उनके पहले ऐसा संग्रह किसी ने नहीं जुटाया था; अल-ज़हबी भी उनकी बड़ी पुस्तक-संपदा का उल्लेख करते हैं। एक बाद की कथा में उनसे संबद्ध पंक्तियाँ पुस्तक पाने की खुशी और मृत्यु के बाद उसके दूसरे व्यक्ति के पास चले जाने की विडंबना व्यक्त करती हैं। उनकी लाइब्रेरी की सटीक संख्या या पूर्ण सूची ज्ञात नहीं है, इसलिए कोई कृत्रिम संख्या नहीं दी गई, पर स्रोतों का बार-बार इस विषय पर ज़ोर उनके पुस्तक-प्रेम को महत्वपूर्ण बनाता है।

उनकी सबसे स्थायी संस्थागत उपलब्धि बाब अल-अज़ज में बनाया गया मदरसा था। अल-ज़हबी और इब्न अल-जौज़ी दोनों इसे उनकी स्थापना बताते हैं। इस विद्यालय ने व्यक्तिगत विद्वत अधिकार को स्थायी शिक्षण संस्था से जोड़ा और हनबली शिक्षा का महत्वपूर्ण माध्यम बना। स्रोत उन्हें किसी बड़े सुरक्षित लेखकीय फ़िक़्ही ग्रंथ-संग्रह के लिए प्रसिद्ध नहीं करते; उनकी विरासत पढ़ाने, क़ाज़ी सेवा, पुस्तक-संग्रह और उस मदरसे में अधिक स्पष्ट दिखाई देती है जो उनके बाद भी चलता रहा।

बाब अल-अज़ज मदरसे का विशेष महत्व शैख़ अब्द अल-क़ादिर अल-जीलानी से संबंध के कारण है। अल-ज़हबी अब्द अल-क़ादिर की जीवनी में स्पष्ट लिखते हैं कि उन्होंने फ़िक़्ह अबू सअद अल-मुख़र्रिमी से पढ़ी। शास्त्रीय स्रोत आगे बताते हैं कि अल-मुख़र्रिमी का मदरसा बाद में उनके शिष्य अब्द अल-क़ादिर को सौंपा गया; उन्होंने वहाँ पढ़ाया, वअज़ किया और बढ़ती भीड़ के कारण उसे विस्तृत किया। बाद की स्मृति में संस्था अब्द अल-क़ादिर से प्रसिद्ध हुई, लेकिन पुराने स्रोत अल-मुख़र्रिमी को उसका संस्थापक और उनके महत्वपूर्ण हनबली शिक्षकों में सुरक्षित रखते हैं।

शैख़ अब्दुल क़ादिर अल-जीलानी के साथ उनका संबंध कई अलग स्तरों पर समझना चाहिए। अल-ज़हबी और इब्न अल-जौज़ी सुरक्षित रखते हैं कि अब्दुल क़ादिर ने अबू सअद अल-मुख़र्रिमी से फ़िक़्ह पढ़ी और बाद में बाब अल-अज़ज का अल-मुख़र्रिमी मदरसा अब्दुल क़ादिर को सौंपा गया, जहाँ उन्होंने पढ़ाया, वअज़ किया और उसे विस्तृत किया। अल-समआनी की रिपोर्ट में उसी अब्दुल क़ादिर की हम्माद अल-दब्बास से अलग आध्यात्मिक संगति दर्ज है; इस तरह अल-मुख़र्रिमी उनके प्रमुख हनबली फ़िक़्ह शिक्षक और संस्थागत पूर्वज थे, जबकि हम्माद एक अलग आध्यात्मिक संगति के शैख़ थे। बहुत बाद की हनबली जीवनी-परंपरा अब्दुल क़ादिर के ख़िरक़ा लेने को भी अल-मुख़र्रिमी से जोड़ती है, लेकिन यहाँ इसे केवल बाद की संबंधित परंपरा माना गया है, प्रारंभिक निर्विवाद तथ्य नहीं।

उनके सार्वजनिक जीवन के अंतिम चरण में वह राजनीतिक और आर्थिक दबाव भी दिखाई देता है जो न्याय प्रशासन से जुड़े विद्वानों पर पड़ सकता था। इब्न अल-जौज़ी लिखते हैं कि ५११ हिजरी में उन्हें न्याय पद से हटा दिया गया और वक़्फ़ वित्त से संबंधित हिसाब के मामले में पूछताछ हुई, जिसके बाद उन्होंने बड़ी रकम अदा की। इस घटना को न सिद्ध भ्रष्टाचार का अंतिम आरोप बनाया गया है और न बचाव की कथा; यह केवल दिखाती है कि अल-मुख़र्रिमी की सार्वजनिक भूमिका अब्बासी राजधानी की प्रशासनिक और वित्तीय संरचनाओं के भीतर थी।

क़ाज़ी अबू अल-हुसैन इब्न अबी यअला, जो उन्हें व्यक्तिगत रूप से जानते थे, एक असाधारण रूप से निकट जीवनी-चित्र सुरक्षित रखते हैं। वे अल-शरीफ़ अबू जअफ़र की शिक्षण सभा में उनके साथ होने का उल्लेख करते हैं, उनके आचरण और संगति की प्रशंसा करते हैं, उन्हें वाद-विवाद में दक्ष बताते हैं और नियमित रोज़े तथा रात की तहज्जुद दर्ज करते हैं। वे यह भी लिखते हैं कि बग़दाद में कई स्थानों पर उनकी जनाज़ा-नमाज़ हुई और जामिअ अल-क़स्र में दो बार अदा की गई। ये विवरण बहुत बाद की करामात-साहित्य से नहीं बल्कि उनके समय के निकट एक हनबली परिचित की स्मृति से आते हैं, इसलिए उनके व्यक्तिगत चरित्र और विद्वत प्रतिष्ठा के लिए विशेष महत्व रखते हैं।

अल-मुख़र्रिमी की मृत्यु १२ मुहर्रम ५१३ हिजरी में हुई। इब्न अबी यअला निकट-समकालीन विवरण देते हैं कि उनकी जनाज़ा-नमाज़ कई स्थानों पर हुई, जिनमें जामिअ अल-क़सर भी था, और उन्हें इमाम अहमद बिन हनबल की क़ब्र के पास दफ़्न किया गया। इब्न अल-जौज़ी अधिक सटीक रूप से लिखते हैं कि उन्हें अबू बक्र अल-ख़ल्लाल के बगल में, अहमद बिन हनबल की क़ब्र के पाँव की ओर दफ़्न किया गया। इब्न कसीर भी बाद में इसी स्थान को दोहराते हैं। इससे ऐतिहासिक दफ़्न समूह बहुत मजबूत रूप से स्थापित होता है।

उनकी दफ़्न-निस्बत बग़दाद के ऐतिहासिक बाब हरब क़ब्रिस्तान से मजबूत रूप से जुड़ी है। इब्न अल-जौज़ी लिखते हैं कि उन्हें अबू बक्र अल-ख़ल्लाल के पास, इमाम अहमद बिन हनबल की क़ब्र के पाँव की ओर दफ़्न किया गया, और इब्न कसीर बाद में इसी स्थान को दोहराते हैं। बग़दाद के पुराने भौगोलिक स्रोत बाब हरब क़ब्रिस्तान को अहमद बिन हनबल और अनेक विद्वानों व ज़ाहिदों की दफ़्न-गाह बताते हैं। इसलिए क़ब्रिस्तान-स्तर की दफ़्न-निस्बत मजबूत है, लेकिन आधुनिक शहर में उनकी अलग व्यक्तिगत क़ब्र भरोसेमंद निशान से पहचानी नहीं जाती।

ऐतिहासिक महत्व और विरासत

अल-मुख़र्रिमी की ऐतिहासिक अहमियत इस बात में है कि वे बग़दाद की विकसित होती हनबली विद्वत परंपरा और छठी हिजरी सदी के अधिक संस्थागत संसार के बीच एक कड़ी थे। प्रमुख हनबली फ़क़ीहों से प्रशिक्षण, स्वयं फ़तवा और शिक्षण, तथा बाब अल-अज़ज के क़ाज़ी के रूप में सेवा दिखाती है कि मज़हब विद्वत संचार और सार्वजनिक न्याय प्रशासन दोनों के माध्यम से सक्रिय था।

बाब अल-अज़ज का उनका मदरसा उनकी भूमिका को विशेष संस्थागत महत्व देता है। यह पुस्तकें, छात्र और मान्य शिक्षक को जोड़ने वाला स्थायी हनबली शिक्षण केंद्र था। बाद में इसे अब्द अल-क़ादिर अल-जीलानी को सौंपा जाना दिखाता है कि एक फ़क़ीह की स्थापित संस्था कैसे व्यापक शिक्षण और वअज़ आंदोलन का मंच बन सकती थी, जबकि पुरानी विद्वत अधिकार-श्रृंखला भी बनी रही।

इसलिए अब्द अल-क़ादिर अल-जीलानी से संबंध केवल एक किनारे की कथा नहीं है। शास्त्रीय जीवनियाँ अल-मुख़र्रिमी को स्पष्ट रूप से अब्द अल-क़ादिर के फ़िक़्ह शिक्षकों में रखती हैं और उनके मदरसे को वह संस्था बताती हैं जिसे बाद में प्रसिद्ध जीलानी शैख़ ने बढ़ाया। इससे अल-मुख़र्रिमी मध्यकालीन बग़दाद से निकले अत्यंत प्रभावशाली धार्मिक नेटवर्क से जुड़ते हैं, बिना उन्हें बाद की क़ादिरी संत परंपरा में कृत्रिम रूप से बदलने के।

अल-मुख़र्रिमी और अब्दुल क़ादिर अल-जीलानी के संबंध को सही स्तर पर रखना बाद की क़ादिरी इतिहास-समझ के लिए भी महत्वपूर्ण है। सबसे मज़बूत प्रारंभिक स्रोत अल-मुख़र्रिमी को फ़िक़्ह और संस्था की दिशा में रखते हैं—अब्दुल क़ादिर के फ़िक़्ह शिक्षक और बाब अल-अज़ज मदरसे के संस्थापक के रूप में—जबकि हम्माद अल-दब्बास को अलग रूप से अब्दुल क़ादिर की आध्यात्मिक संगति से जोड़ते हैं। बाद की ख़िरक़ा परंपरा अल-मुख़र्रिमी संबंध को अतिरिक्त आध्यात्मिक आयाम देती है, लेकिन स्रोत-स्तर बाद का होने के कारण इसे अलग रखा गया है। इससे अल-मुख़र्रिमी की वास्तविक ऐतिहासिक महत्ता अधिक साफ़ होती है: वे उस संस्थागत वातावरण के महत्वपूर्ण विद्वत पूर्वज थे जो बाद में अब्दुल क़ादिर के कारण प्रसिद्ध हुआ, बिना हर बाद की मनाक़िबी दावे को स्वतः उनके साथ जोड़ने के।

अबू बक्र अल-ख़ल्लाल के पास और अहमद बिन हनबल के निकट उनका दफ़्न उन्हें बग़दाद की हनबली स्मृति के एक अत्यंत महत्वपूर्ण भौतिक स्थल से जोड़ता है। ऐतिहासिक बाब हरब क़ब्रिस्तान की निस्बत मजबूत है, लेकिन व्यक्तिगत क़ब्र आज पहचानी नहीं गई है; यह अंतर मध्यकालीन मजबूत दफ़्न-साक्ष्य और आधुनिक क़ब्र-पहचान की सीमा को स्पष्ट रखता है।

पारिवारिक संबंध

स्रोत

अल-मुन्तज़म फ़ी तारीख़ अल-मुलूक व अल-उमम | इब्न अल-जौज़ी | जिल्द १७, पृष्ठ १८३–१८५ | https://islamweb.net/ar/library/content/421/2199/ | रजब ४४६ हिजरी में जन्म, शिक्षक, फ़िक़्ह, फ़तवा, शिक्षण, न्यायिक सेवा, विशाल पुस्तक-संग्रह, बाब अल-अज़ज मदरसा, ५११ हिजरी में पद से हटना, १२ मुहर्रम ५१३ हिजरी में मृत्यु और अबू बक्र अल-ख़ल्लाल के पास इमाम अहमद की क़ब्र के पाँव की ओर दफ़्न
सियर आलाम अल-नुबला | अल-ज़हबी | जिल्द १९, पृष्ठ ४२८ | https://www.islamweb.net/ar/library/content/60/4867/ | शैख़ अल-हनाबिला, शिक्षक, बाब अल-अज़ज मदरसा, बाद में अब्द अल-क़ादिर अल-जीलानी का वहाँ पढ़ाना और विस्तार करना, विशाल पुस्तक-संग्रह और ५१३ हिजरी में मृत्यु
सियर आलाम अल-नुबला, अब्द अल-क़ादिर अल-जीलानी की जीवनी | अल-ज़हबी | जिल्द २०, पृष्ठ ४४०–४४२ | https://islamweb.net/ar/library/content/60/5282/ | अब्द अल-क़ादिर का अबू सअद अल-मुख़र्रिमी से फ़िक़्ह पढ़ना और बाद में अल-मुख़र्रिमी के मदरसे को संभालकर बढ़ाना
अल-बिदाया व अल-निहाया | इब्न कसीर | ५१३ हिजरी की घटनाएँ | https://www.islamweb.net/ar/library/content/59/1933/ | अबू सअद अल-मुख़र्रिमी की विद्वत, न्यायिक और मदरसा पहचान तथा अबू बक्र अल-ख़ल्लाल के पास अहमद बिन हनबल के निकट दफ़्न
मुअजम अल-बुलदान, बाब हरब | याक़ूत अल-हमवी | https://ablibrary.net/book_content/638/307 | बाब हरब क़ब्रिस्तान का भौगोलिक विवरण, जहाँ अहमद बिन हनबल, बिश्र अल-हाफ़ी और अनेक विद्वान व ज़ाहिद दफ़्न थे
तबक़ात अल-हनाबिला | क़ाज़ी अबू अल-हुसैन इब्न अबी यअला | जिल्द 2, पृष्ठ 259, जीवनी 704 | https://islamweb.net/ar/library/content/1070/873/ | अबू सअद के शिक्षक, शिक्षण, फ़तवा, क़ाज़ी सेवा, आचरण, अल-शरीफ़ अबू जअफ़र की सभा, रोज़ा, तहज्जुद, कई जनाज़ा नमाज़ें और इमाम अहमद के पास दफ़्न
तारीख़ बग़दाद | अल-ख़तीब अल-बग़दादी | बग़दाद के क़ब्रिस्तान, जिल्द 1 | https://www.masaha.org/book/view/2730/page/133 | बाब हरब क़ब्रिस्तान शहर से बाहर खंदक के पार क़ुत्रब्बुल मार्ग की दिशा में, नेक लोगों की क़ब्रों के लिए प्रसिद्ध, अहमद इब्न हनबल और बिश्र अल-हाफ़ी की क़ब्रें
शज़रात अल-ज़हब | इब्न अल-इमाद अल-हनबली | जिल्द 4, पृष्ठ 199 | https://ablibrary.net/book_content/4586/199 | अब्दुल क़ादिर का अल-मुख़र्रिमी से हनबली फ़िक़्ह पढ़ना, हम्माद अल-दब्बास की संगति और बाद की परंपरा में अल-मुख़र्रिमी से ख़िरक़ा लेने की निस्बत

💬 आगंतुक टिप्पणियाँ

अभी कोई स्वीकृत टिप्पणी नहीं; पहली टिप्पणी आप करें।

टिप्पणी प्रशासनिक स्वीकृति के बाद प्रकाशित होगी।