दारुल उलूम क़ादरिया जीलानिया की प्रकाशित संस्थापक-जीवनी के अनुसार उनका जन्म १४ दिसंबर १९३५, १७ रमज़ान १३५४ हिजरी, रावलपिंडी क्षेत्र के संधू सैयदां में हुआ। वही स्रोत उनके पिता का नाम शैख़ सैयद विलायत अली शाह अल-जीलानी बताता है।
हज़रत मुफक्किर-ए-इस्लाम डॉ. पीर सैयद अब्दुल क़ादिर शाह जीलानी रहिमहुल्लाह
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डब्ल्यूएफ़आईए जामिया मस्जिद ग़ौसिया की आधिकारिक जनाज़ा घोषणा के अनुसार उनका निधन शनिवार १८ अक्तूबर २०२५, २५ रबी अल-आख़िर १४४७ हिजरी को हुआ। अगले दिन लंदन में उनकी नमाज़-ए-जनाज़ा हुई और वॉल्थमस्टो से लेयटन तक जनाज़ा जुलूस के बाद उनका पार्थिव शरीर पाकिस्तान भेजा गया।
पाकिस्तान में आस्ताना आलिया क़ादरिया जीलानिया, हुसैनिया शरीफ़, चाकिया चाक पोस्ट के निकट, कहूटा रोड, इस्लामाबाद में एक और नमाज़-ए-जनाज़ा हुई और बाद की रिपोर्ट उनका दफ़्न उसी स्थान पर बताती है। वर्तमान स्थल-जाँच उसी हुसैनिया शरीफ़ परिसर के भीतर उनके व्यक्ति-विशेष मानचित्रित स्थान की पहचान करती है। दफ़्न संबंध मज़बूत है और कच्चे मानचित्र निर्देशांक केवल निर्धारित भौगोलिक फ़ील्डों में रखे गए हैं।
जीवनी और ऐतिहासिक परिचय
संस्थापक-जीवनी उन्हें ऐसे विद्यार्थी के रूप में पेश करती है जिसने ज्ञान के लिए भारतीय उपमहाद्वीप और हिजाज़ में यात्रा की, पारंपरिक इस्लामी शिक्षा को आधुनिक अकादमिक अध्ययन से जोड़ा और पीएचडी तथा विधि स्नातक प्राप्त किए। वही स्रोत बताता है कि कम उम्र से सार्वजनिक भाषण उनके जीवन का हिस्सा था। मृत्यु के बाद की स्वतंत्र रिपोर्टें भी उन्हें आलिम, मुफस्सिर, शोधकर्ता और प्रचारक कहती हैं। लेकिन इस शोध में ठीक विश्वविद्यालयों, शोधप्रबंध का शीर्षक, उपाधियों की तिथियाँ और पूरी प्रमाणित शिक्षकों की पूरी सूची स्थापित नहीं हुई, इसलिए ये विवरण नहीं गढ़े गए।
उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ ब्रिटेन जाना था। दारुल उलूम क़ादरिया जीलानिया के अनुसार वे १९७० के दशक में इंग्लैंड आए और पूरे देश में व्याख्यान देते रहे, उस समय जब उनसे जुड़ा सुन्नी-बरेलवी अहल-ए-सुन्नत नेटवर्क सार्वजनिक संस्थाएँ विकसित कर रहा था। पोठवार की मृत्यु-स्मृति रिपोर्ट बताती है कि वे लगभग आधी सदी पहले लंदन चले गए और वहाँ इस्लामी शिक्षा और प्रचार में समर्पित रहे। ब्रिटिश उर्दू रिपोर्टिंग देशभर के दौरों, विद्वानों और समुदायों से मुलाक़ात, सार्वजनिक भाषणों और सुन्नी धार्मिक संस्थाओं को संगठित करने के प्रयासों का उल्लेख करती है।
वॉल्थमस्टो में उन्होंने दारुल उलूम क़ादरिया जीलानिया स्थापित किया, जो उनके नाम से जुड़ा मुख्य ब्रिटिश केंद्र बना। ब्रिटेन का चैरिटी कमीशन संबंधित इंटरनेशनल मुस्लिम मूवमेंट को चैरिटी संख्या २८५३९७ के रूप में दर्ज करती है; ट्रस्ट दस्तावेज़ १४ अगस्त १९८२ और पंजीकरण २० सितंबर १९८२ है, और दारुल उलूम क़ादरिया जीलानिया उसका कार्यकारी नाम है। धर्मार्थ उद्देश्य में बच्चों और बड़ों की क़ुरआन और हदीस आधारित धार्मिक शिक्षा तथा उर्दू, अरबी, अंग्रेज़ी और फ़ारसी भाषाओं को बढ़ावा देना शामिल था। केंद्र मस्जिद, विद्यालय और सामुदायिक संस्था के रूप में विकसित हुआ।
इसलिए ब्रिटेन में उनका काम केवल व्यक्तिगत भाषणों तक सीमित नहीं था। संस्था का वर्तमान उद्देश्य पारंपरिक विद्वानों, कक्षाओं, सभाओं और सामुदायिक कार्यक्रमों के माध्यम से ज्ञान को आचरण से जोड़ना है। आज की सेवाओं में सांध्य मदरसा, क़ुरआन अध्ययन, हिफ़्ज़ और तजवीद, दैनिक और जुमे की नमाज़ें, निकाह तथा जनाज़ा सहायता शामिल हैं। इन बाद की सेवाओं को उनके स्थापित संस्थान की जारी विरासत समझना चाहिए, न कि यह दावा कि हर कार्यक्रम उन्होंने स्वयं बनाया। चैरिटी कमीशन इंटरनेशनल मुस्लिम मूवमेंट को इंग्लैंड और वेल्स में धार्मिक, शैक्षिक और सामुदायिक सद्भाव से जुड़ा धर्मार्थ कार्य करने वाली संस्था के रूप में दर्ज करता है।
ब्रिटिश मुस्लिम सार्वजनिक धार्मिक संस्कृति में उनका सबसे दिखाई देने वाला योगदान लंदन का वार्षिक मीलाद जुलूस था। उनकी संस्था उन्हें ब्रिटेन में ऐसा पहला जुलूस आयोजित करने वाला बताती है; इस राष्ट्रीय प्राथमिकता के दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई। फिर भी वॉल्थमस्टो की लंबी परंपरा स्पष्ट है: जंग ने २०१९ में उनकी अगुवाई में ३६वें वार्षिक जुलूस को दर्ज किया और दारुल उलूम ने २०२२ में ३९वें जुलूस को ब्रिटेन के पुराने और बड़े मीलाद आयोजनों में गिना। इन कार्यक्रमों में ब्रिटेन भर और यूरोप से पुरुष, महिलाएँ, बच्चे, उलेमा और मशाइख आते और जुलूस के बाद बड़े धार्मिक सम्मेलन होते थे।
उनका संगठनात्मक काम एक मस्जिद से आगे गया। ब्रिटिश सामुदायिक रिपोर्टिंग १९७९ में जमाअत-ए-अहल-ए-सुन्नत नेटवर्क की शुरुआती गठन उनसे जोड़ती है और ड्यूसबरी तथा ईस्ट हैम की शुरुआती सुन्नी सम्मेलन का उल्लेख करती है। संबंधित मरकज़ी जमाअत-ए-अहल-ए-सुन्नत ब्रिटेन और ओवरसीज़ ट्रस्ट आज चैरिटी कमीशन में पंजीकृत है, लेकिन उसका आधिकारिक ट्रस्ट दस्तावेज़ १४ जुलाई १९९६ और पंजीकरण १० जनवरी १९९७ है। इसके उद्देश्य में सहिष्णुता और सद्भाव के साथ सुन्नी-बरेलवी शिक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य, युवा मनोरंजन और गरीबी निवारण शामिल हैं। आंदोलन की स्मृति और औपचारिक चैरिटी तिथियाँ अलग होने के कारण दोनों दर्ज किए गए हैं।
वार्षिक सम्मेलन उनके ब्रिटिश कार्यक्रम का एक और बड़ा भाग थे। जंग ने २०१९ में दारुल उलूम क़ादरिया जीलानिया में ४१वें ताजदार-ए-अौलिया सम्मेलन में उनका संबोधन दर्ज किया, जहाँ ब्रिटेन भर से विद्वान और रूहानी मार्गदर्शक आए और कश्मीर, भारतीय मुसलमानों की नागरिकता, पवित्र ग्रंथों के सम्मान तथा पाकिस्तान में शांति पर प्रस्ताव भी पारित हुए। अन्य रिपोर्टें लंबे समय से चल रहे ताजदार-ए-ख़त्म-ए-नुबुव्वत सम्मेलनों और उनके अध्यक्षीय या मुख्य भाषणों को दर्ज करती हैं। इस तरह उनकी ब्रिटिश गतिविधियों में धार्मिक और रूहानी उपदेश, अक़ीदी शिक्षा, संगठनात्मक समन्वय और मुस्लिम सार्वजनिक प्रश्नों पर टिप्पणी एक साथ दिखाई देती है।
उनके सार्वजनिक संदेश में सुन्नी धार्मिक पहचान, पैग़म्बर के प्रति श्रद्धा, अहल-ए-बैत, सहाबा और औलिया, विशेष रूप से शैख़ अब्दुल क़ादिर अल-जीलानी, के प्रति सम्मान लगातार दिखाई देता है। २०१९ के वॉल्थमस्टो संबोधन में उन्होंने औलिया को धार्मिक शिक्षा और शांति के ऐतिहासिक माध्यम के रूप में प्रस्तुत किया, जबकि अन्य रिपोर्टें मीलाद और ख़त्म-ए-नुबुव्वत पर उनके भाषणों को दर्ज करती हैं। २०२२ और २०२४ तक ब्रिटिश उर्दू रिपोर्टिंग उन्हें मरकज़ी जमाअत-ए-अहल-ए-सुन्नत ब्रिटेन और ओवरसीज़ ट्रस्ट का संस्थापक और मुख्य संरक्षक कहती रही, जिससे कई दशकों तक उनके सार्वजनिक नेतृत्व की निरंतरता स्पष्ट होती है।
उनकी लंबी ब्रिटिश सेवा विवादों से पूरी तरह मुक्त नहीं थी। अक्टूबर २०१६ में ईवनिंग स्टैंडर्ड ने रिपोर्ट किया कि दारुल उलूम क़ादरिया जीलानिया के एक धार्मिक आयोजन में उत्तेजक पुस्तिकाएँ कथित रूप से बाँटी गईं जिन पर उनका नाम और चित्र था। जीलानी ने पुस्तिका लिखने या उसके वितरण की अनुमति देने से इंकार किया, कहा कि वे उसकी सामग्री से सहमत नहीं थे और यदि वितरण हुआ तो उनकी या मस्जिद समिति की अनुमति के बिना हुआ; पुलिस ने जाँच शुरू की। उसी रिपोर्ट ने डीएम डिजिटल पर २०११ के एक भाषण से जुड़े पहले ऑफकॉम निर्णय का भी उल्लेख किया, जबकि जीलानी ने कहा कि निर्णय प्रसारक के विरुद्ध था, उनके शब्दों का संदर्भ गलत समझा गया और उन्होंने हत्या की वकालत नहीं की। उपलब्ध स्रोतों में २०१६ की पुलिस जाँच का अंतिम परिणाम नहीं मिला, इसलिए आरोप और खंडन से आगे दोष या निर्दोषता का निष्कर्ष नहीं निकाला गया।
अक्टूबर २०२५ में लंदन में उनकी मृत्यु ने उनके ब्रिटिश नेटवर्क की व्यापकता दिखा दी। डब्ल्यूएफ़आईए जामिया मस्जिद ग़ौसिया ने घोषणा की कि उनका निधन शनिवार १८ अक्टूबर २०२५, २५ रबी अल-आख़िर १४४७ हिजरी को हुआ और १९ अक्टूबर को लंदन में बड़ी नमाज़-ए-जनाज़ा आयोजित की गई। दारुल उलूम क़ादरिया जीलानिया, वॉल्थमस्टो से लेटन स्थित जामिया मस्जिद ग़ौसिया तक जनाज़ा जुलूस रखा गया; महिलाओं के लिए दारुल उलूम में अलग व्यवस्थाएँ थीं। पोठवार ने ब्रिटेन भर से उलेमा, धार्मिक व सामाजिक नेताओं और समुदाय के लोगों की भागीदारी दर्ज की। इसके बाद उनका पार्थिव शरीर पाकिस्तान ले जाया गया।
उनका पार्थिव शरीर पाकिस्तान पहुँचने के बाद आस्ताना आलिया क़ादरिया जीलानिया, हुसैनिया शरीफ़, कहूटा रोड पर एक और नमाज़-ए-जनाज़ा हुई और बाद की रिपोर्ट के अनुसार हजारों लोगों की मौजूदगी में उन्हें वहीं दफ़्न किया गया। वर्तमान स्थल-जाँच इस दफ़्न संबंध को उसी हुसैनिया शरीफ़ संस्थागत परिसर से संगत पाती है। उनकी ऐतिहासिक महत्ता विशेष रूप से ब्रिटेन में बने स्थायी संस्थानों, देशव्यापी धार्मिक-प्रचार जाल, दशकों पुरानी मीलाद और सम्मेलन परंपराओं तथा उन विद्वानों और अनुयायियों में है जिन्होंने उनकी मृत्यु के बाद भी इस काम को जारी रखा।
ऐतिहासिक महत्व और विरासत
ब्रिटिश मुस्लिम सार्वजनिक धार्मिक संस्कृति में भी उनका प्रभाव बड़ा था। संस्था का यह दावा कि उन्होंने ब्रिटेन में पहला मीलाद जुलूस आयोजित किया, स्वतंत्र ऐतिहासिक पुष्टि चाहता है; फिर भी २०१९ का दस्तावेज़ित ३६वाँ जुलूस और २०२२ का ३९वाँ जुलूस उनकी अगुवाई में कई दशकों से चली आ रही लंदन की परंपरा को सिद्ध करते हैं। ये जुलूस और उनसे जुड़े सम्मेलन विभिन्न ब्रिटिश शहरों, मस्जिदों, विद्वानों, परिवारों और यूरोपीय आगंतुकों को जोड़ने वाले मंच बने।
उन्होंने ट्रस्टों और सम्मेलन-नेटवर्कों के माध्यम से संगठित सुन्नी-बरेलवी सार्वजनिक प्रतिनिधित्व में भी भूमिका निभाई। आंदोलन-वृत्तांत प्रारंभिक संगठन को १९७९ तक ले जाते हैं, जबकि वर्तमान मरकज़ी जमाअत-ए-अहल-ए-सुन्नत ब्रिटेन और ओवरसीज़ ट्रस्ट का औपचारिक ट्रस्ट दस्तावेज़ और चैरिटी कमीशन पंजीकरण बाद के हैं। यह अंतर उपयोगी है क्योंकि इससे अनौपचारिक आंदोलन के इतिहास और पंजीकृत धर्मार्थ संस्था के कानूनी इतिहास को अलग समझा जा सकता है।
उनकी विरासत को प्रभाव और विवाद दोनों के साथ पढ़ना चाहिए। समर्थक दशकों की शिक्षा, रूहानी मार्गदर्शन, मीलाद, ख़त्म-ए-नुबुव्वत और औलिया सम्मेलन तथा संस्थापक के बाद भी चलने वाली लंदन की संस्था को याद करते हैं; सार्वजनिक रिपोर्टिंग विवादित बयान और २०१६ पुस्तिका विवाद भी दर्ज करती है, जिसे अनुमति देना करने से उन्होंने इंकार किया और जिसका पुलिस जाँच का अंतिम परिणाम इस अनुसंधान में नहीं मिला। जिम्मेदार जीवनी न प्रशंसा को तटस्थ प्रमाण बनाती है, न आरोप को अप्रमाणित दोष।
उनकी मृत्यु पर प्रतिक्रिया उनकी अंतरराष्ट्रीय पहुँच का अंतिम प्रमुख संकेत थी। लंदन की बड़ी नमाज़-ए-जनाज़ा और जनाज़ा जुलूस के बाद उनका पार्थिव शरीर पाकिस्तान ले जाया गया, जहाँ हुसैनिया शरीफ़ में एक और नमाज़-ए-जनाज़ा में हजारों लोग शामिल हुए। इस क्रम ने वॉल्थमस्टो, लेटन और कहूटा रोड को एक ही स्मृति-श्रृंखला में जोड़ दिया और दिखाया कि उनकी परिपक्व संस्थाएँ ब्रिटेन में थीं जबकि पारिवारिक, रूहानी और दफ़्न संबंध पाकिस्तान से गहरे जुड़े रहे।
पारिवारिक संबंध
स्रोत
दारुल उलूम क़ादरिया जीलानिया — संस्थापक जीवनी | दारुल उलूम क़ादरिया जीलानिया | https://dqj.org.uk/mufakkir-e-islam-dr-pir-syed-abdul-qadir-jilani/ | जन्म, पिता, वंश-दावा, अध्ययन-यात्रा, ब्रिटेन आगमन और संस्थापक भूमिकाइंटरनेशनल मुस्लिम मूवमेंट | इंग्लैंड और वेल्स चैरिटी कमीशन | चैरिटी 285397 | https://register-of-charities.charitycommission.gov.uk/en/charity-search/-/charity-details/285397/full-print | 1982 पंजीकरण, दारुल उलूम क़ादरिया जीलानिया कार्य-नाम और धार्मिक-शैक्षिक उद्देश्य
मरकज़ी जमात-ए-अहले सुन्नत यूके एंड ओवरसीज़ ट्रस्ट | इंग्लैंड और वेल्स चैरिटी कमीशन | चैरिटी 1060064 | https://register-of-charities.charitycommission.gov.uk/en/charity-search/-/charity-details/1060064/full-print | कानूनी पंजीकरण, ट्रस्ट डीड और सुन्नी बरेलवी चैरिटी उद्देश्य
मुफक्किर-ए-इस्लाम डॉ. सैयद अब्दुल क़ादिर शाह जीलानी की जनाज़ा घोषणा | डब्ल्यूएफ़आईए जामिया मस्जिद ग़ौसिया | https://www.wfia.org.uk/janazah-mufakkir-e-islam/ | निधन और लंदन जनाज़ा
पाकिस्तान धार्मिक शिक्षा महानिदेशालय | मदरसा सूची | https://www.dgre.gov.pk/Detail/ZWE2YmVlZmEtMGMzZS00NmRhLTg2YjYtNjRmMjcxYzFhM2Nk | हुसैनिया शरीफ़, चाकिया चाक पोस्ट के निकट, कहूटा रोड, इस्लामाबाद की संस्थागत पहचान
पोठवार की जनाज़ा-पश्चात रिपोर्ट | donor जाँच में सुरक्षित | स्थायी कड़ी मुख्य donor वेब फ़ील्डों में सुरक्षित नहीं | पाकिस्तान जनाज़ा और हुसैनिया शरीफ़ में दफ़्न
लंदन ईवनिंग स्टैंडर्ड, 7 अक्तूबर 2016 | https://www.standard.co.uk/news/crime/leaflet-handed-out-at-east-london-mosque-tells-muslims-to-kill-all-who-insult-the-prophet-a3363446.html | 2016 पुस्तिका आरोप, इनकार और पुलिस जाँच का निष्पक्ष दस्तावेज़
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