लताइफ़ अल-मिनन में एक नामित शाज़िली रिवायत सुरक्षित है जिसमें अबू ज़करिया यह्या अल-बिलबीसी, अबू अल-हसन अल-शाज़िली की संगति के बाद अंदलुस की ओर यात्रा करते हैं। विदाई के समय शाज़िली उन्हें विशेष रूप से अबू अल-अब्बास इब्न मकनून से मिलने का निर्देश देते हैं। जब यह्या अंततः उनके पास पहुँचे, तो रिवायत के अनुसार इब्न मकनून ने पहली मुलाक़ात के बावजूद उन्हें नाम से पुकारा, महान शैख़ से उनकी संगति का उल्लेख किया और उस निजी बात की ओर तुरंत संकेत कर दिया जो अबू अल-हसन ने उनके बारे में यह्या से कही थी।
जब यह्या ने अंदलुस की ओर यात्रा करने का निश्चय किया, तब विदाई का समय इस कहानी की शुरुआत बन गया। अल-शाज़िली ने उन्हें एक स्पष्ट निर्देश दिया: जब अंदलुस पहुँचो तो शैख़ अबू अल-अब्बास इब्न मकनून को खोजो और उनसे मिलो। लताइफ़ अल-मिनन की भाषा इब्न मकनून को ऊँची आध्यात्मिक स्थिति वाले ऐसे व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करती है जो सामान्य लोगों में बहुत प्रकट या आसानी से पहचाने जाने वाले नहीं थे। यह्या यह निर्देश लेकर पश्चिम की यात्रा पर निकल गए।
पुराना स्रोत रास्ते में कल्पित रोमांच नहीं जोड़ता। वह सीधे यह्या के अंदलुस पहुँचने की ओर बढ़ता है। वहाँ उन्होंने उस व्यक्ति को खोजा जिसका नाम अल-शाज़िली ने दिया था। अंदलुसी जीवनी सामग्री इस नाम को वास्तविक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भी देती है: अबू अल-अब्बास अहमद बिन मुहम्मद बिन मकनून अल-लख़मी को अल-मरिय्या से जुड़े अंदलुसी व्यक्तियों में दर्ज किया गया है, और स्थानीय ऐतिहासिक स्मृति में अबू अल-अब्बास इब्न मकनून को एक ज़ाहिद शैख़ के रूप में भी याद किया गया।
फिर कहानी का असाधारण क्षण आता है। लताइफ़ अल-मिनन स्पष्ट करती है कि इब्न मकनून यह्या को पहले नहीं जानते थे। फिर भी जैसे ही उनकी नज़र यात्री पर पड़ी, उन्होंने उसे नाम से पुकारा: «या यह्या!» उन्होंने उसका स्वागत किया, उस महान शैख़ से उसकी मुलाक़ात का उल्लेख किया जिसके साथ वह रहा था, और फिर वह बात कही जिसने पूरी यात्रा को एक सूत्र में बाँध दिया: अबू अल-हसन ने मेरे बारे में जो बात तुम्हें बताई है, उसे किसी से प्रकट मत करना।
इस एक क्षण में यात्रा के दोनों छोर मिल गए। शुरुआत में अल-शाज़िली की निजी विदाई-हिदायत और एक कम-प्रकट अंदलुसी शैख़ का उल्लेख था; अंत में वही शैख़ पहली नज़र में यात्री को पहचान रहा था और उसी निजी बात की ओर संकेत कर रहा था जिसे यह्या अपने हृदय में लेकर चला था।
रिवायत की सुंदरता उसकी सादगी में है: विदाई, यात्रा, एक नेक व्यक्ति की तलाश, पहली मुलाक़ात में पहचान और एक अमानत की रक्षा। इसे उसी तरह प्रस्तुत करना सबसे अच्छा है जैसे शास्त्रीय स्रोत ने सुरक्षित किया—आध्यात्मिक पहचान, मार्गदर्शन और दो नेक लोगों के मिलन की एक शाज़िली मंसूब करामत के रूप में।
निष्कर्ष
इस कहानी की सबसे यादगार छवि यह है कि यह्या अल-शाज़िली की विदाई-हिदायत को लेकर अंदलुस पहुँचे और पहली मुलाक़ात में इब्न मकनून ने उन्हें नाम से पुकारा तथा अबू अल-हसन की निजी बात की ओर संकेत किया। शाज़िली जीवनी परंपरा में यह आध्यात्मिक पहचान, मार्गदर्शन और दो नेक लोगों के मिलन की सुंदर रिवायत है।