प्रदान की गई विस्तृत मनाक़िब रिवायत के अनुसार 499 हिजरी में हम्माद अद-दब्बास ने शैख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी की परीक्षा के लिए उन्हें अत्यंत ठंडे नदी के पानी में गिरा दिया। तीस वर्ष बाद शूनीज़िय्या के क़ब्रिस्तान में हम्माद की क़ब्र पर लंबे ठहराव के दौरान रिवायत क्षमा, उनके दाएँ हाथ के लिए दुआ, पाँच हज़ार औलिया अल्लाह की आमीन, हाथ के ठीक होने और मुसाफ़हे, फिर यूसुफ़ अल-हमदानी और अब्दुर्रहमान अल-कुर्दी से मंसूब अलग-अलग पुष्टियों का वर्णन करती है।
«सिर्र अल-असरार व मज़हर अल-अनवार फ़ीमा यहताजु इलैहि अल-अबरार» में एक विस्तृत मनाक़िब रिवायत है कि 27 ज़ुल-हिज्जा 529 हिजरी को शैख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी एक बड़े समूह के साथ शूनिज़िय्या क़ब्रिस्तान गए। वे शैख़ हम्माद अल-दब्बास की क़ब्र के पास बहुत देर तक खड़े रहे, यहाँ तक कि गर्मी तेज़ हो गई। लौटते समय उनके चेहरे पर स्पष्ट प्रसन्नता थी। कारण पूछा गया तो उन्होंने मध्य शाबान 499 हिजरी की एक पुरानी घटना याद की।
उस शुक्रवार अब्दुल क़ादिर, हम्माद अल-दब्बास और उनके साथियों के साथ जामिअ अल-रुसाफ़ा की ओर जा रहे थे। नदी के पुल के पास हम्माद ने अचानक उन्हें बहुत ठंडे पानी में धकेल दिया। अब्दुल क़ादिर ने अल्लाह का नाम लिया और तुरंत जुमुआ के ग़ुस्ल की नीयत की। उनके शरीर पर ऊनी जुब्बा था और आस्तीन में इल्मी पुस्तिकाएँ थीं, इसलिए उन्होंने हाथ ऊपर रखे ताकि वे भीगें नहीं। पानी से निकलकर उन्होंने कपड़ा निचोड़ा और कठोर ठंड के बावजूद समूह के पीछे चलते रहे। हम्माद ने साथियों को आगे उन्हें परेशान करने से रोका और कहा कि यह केवल परीक्षा थी; मैंने उन्हें ऐसे पर्वत जैसा पाया जो अपनी जगह से नहीं हिलता।
शैख़ अब्दुल क़ादिर ने कहा कि क़ब्र पर उन्होंने हम्माद को सजी हुई अवस्था में देखा, लेकिन उनका दायाँ हाथ काम नहीं कर रहा था। हम्माद ने कहा कि इसी हाथ से मैंने आपको नदी में गिराया था और क्षमा माँगी। अब्दुल क़ादिर ने तुरंत क्षमा कर दिया। फिर हम्माद ने हाथ ठीक होने के लिए दुआ की विनती की। शैख़ दुआ में खड़े हुए और रिवायत के अनुसार क़ब्रों में मौजूद पाँच हज़ार औलिया अल्लाह ने आमीन कही और अपनी दुआ उनकी दुआ के साथ मिलाई। दुआ जारी रही, यहाँ तक कि हम्माद का हाथ ठीक हो गया और उन्होंने उसी हाथ से प्रसन्नता के साथ मुसाफ़हा किया।
जब यह खबर बग़दाद में फैल गई तो हम्माद से जुड़े शैख़ और सूफ़ी पुष्टि के लिए शैख़ अब्दुल क़ादिर के मदरसे आए। उन्होंने कहा कि दो भरोसेमंद शैख़ चुन लो। लोगों ने शैख़ यूसुफ़ अल-हमदानी और शैख़ अब्दुर्रहमान अल-कुर्दी को चुना। थोड़ी देर में यूसुफ़ नंगे पाँव तेज़ी से आए और कहा कि अभी हम्माद उन्हें दिखाए गए और उन्होंने आदेश दिया कि उपस्थित लोगों को बता दो कि शैख़ अब्दुल क़ादिर ने सही बयान किया है। उनकी बात पूरी होने से पहले अब्दुर्रहमान अल-कुर्दी भी आए और वही पुष्टि दी। उपस्थित लोगों ने अल्लाह से क्षमा माँगी और शैख़ अब्दुल क़ादिर से माफ़ी चाही। यह रिवायत परीक्षा में धैर्य, क्षमा, गुरु के सम्मान, दुआ और ईश्वरीय कृपा पर भरोसे को एक साथ प्रस्तुत करती है।
उस शुक्रवार अब्दुल क़ादिर, हम्माद अल-दब्बास और उनके साथियों के साथ जामिअ अल-रुसाफ़ा की ओर जा रहे थे। नदी के पुल के पास हम्माद ने अचानक उन्हें बहुत ठंडे पानी में धकेल दिया। अब्दुल क़ादिर ने अल्लाह का नाम लिया और तुरंत जुमुआ के ग़ुस्ल की नीयत की। उनके शरीर पर ऊनी जुब्बा था और आस्तीन में इल्मी पुस्तिकाएँ थीं, इसलिए उन्होंने हाथ ऊपर रखे ताकि वे भीगें नहीं। पानी से निकलकर उन्होंने कपड़ा निचोड़ा और कठोर ठंड के बावजूद समूह के पीछे चलते रहे। हम्माद ने साथियों को आगे उन्हें परेशान करने से रोका और कहा कि यह केवल परीक्षा थी; मैंने उन्हें ऐसे पर्वत जैसा पाया जो अपनी जगह से नहीं हिलता।
शैख़ अब्दुल क़ादिर ने कहा कि क़ब्र पर उन्होंने हम्माद को सजी हुई अवस्था में देखा, लेकिन उनका दायाँ हाथ काम नहीं कर रहा था। हम्माद ने कहा कि इसी हाथ से मैंने आपको नदी में गिराया था और क्षमा माँगी। अब्दुल क़ादिर ने तुरंत क्षमा कर दिया। फिर हम्माद ने हाथ ठीक होने के लिए दुआ की विनती की। शैख़ दुआ में खड़े हुए और रिवायत के अनुसार क़ब्रों में मौजूद पाँच हज़ार औलिया अल्लाह ने आमीन कही और अपनी दुआ उनकी दुआ के साथ मिलाई। दुआ जारी रही, यहाँ तक कि हम्माद का हाथ ठीक हो गया और उन्होंने उसी हाथ से प्रसन्नता के साथ मुसाफ़हा किया।
जब यह खबर बग़दाद में फैल गई तो हम्माद से जुड़े शैख़ और सूफ़ी पुष्टि के लिए शैख़ अब्दुल क़ादिर के मदरसे आए। उन्होंने कहा कि दो भरोसेमंद शैख़ चुन लो। लोगों ने शैख़ यूसुफ़ अल-हमदानी और शैख़ अब्दुर्रहमान अल-कुर्दी को चुना। थोड़ी देर में यूसुफ़ नंगे पाँव तेज़ी से आए और कहा कि अभी हम्माद उन्हें दिखाए गए और उन्होंने आदेश दिया कि उपस्थित लोगों को बता दो कि शैख़ अब्दुल क़ादिर ने सही बयान किया है। उनकी बात पूरी होने से पहले अब्दुर्रहमान अल-कुर्दी भी आए और वही पुष्टि दी। उपस्थित लोगों ने अल्लाह से क्षमा माँगी और शैख़ अब्दुल क़ादिर से माफ़ी चाही। यह रिवायत परीक्षा में धैर्य, क्षमा, गुरु के सम्मान, दुआ और ईश्वरीय कृपा पर भरोसे को एक साथ प्रस्तुत करती है।
निष्कर्ष
इस स्रोत-संबंधी सावधानी को बनाए रखते हुए पूरे प्रसंग को विस्तृत क़ादिरी मनाक़िब रिवायत के रूप में प्रकाशित किया जा सकता है, जिसका केंद्र शैख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी का धैर्य, क्षमा और दुआ है, और जिसमें रिवायत के अनुसार पाँच हज़ार औलिया की आमीन तथा बग़दाद में बाद की पुष्टियाँ भी शामिल हैं।
स्रोत
Bahjat al-Asrar wa Ma‘din al-Anwar, p.118, episode al-Ighatha li-Sahib al-Qabr; accessible excerpt reproduces the 27 Dhu al-Hijja 529 AH Shuniziyya visit and the 499 AH cold-water trial.
Ibn Rajab, Dhayl Tabaqat al-Hanabila, 2/194–195: source-level warning concerning al-Shattanufi’s Bahjat al-Asrar and reliance on its reports unless known independently.
Ibn Hajar, al-Durar al-Kamina, biography of al-Shattanufi: the book contained unusual narratives and people criticized many of its stories and isnads.