उनका जन्म मक्का में ईस्वी छठी शताब्दी के मध्य के आसपास हुआ। निश्चित वर्ष और विवाह के समय आयु के बारे में रिवायतें अलग हैं, इसलिए किसी एक संख्या को निश्चित नहीं माना गया।
हज़रत ख़दीजा बिन्त ख़ुवैलिद
PER-000002
अहल अल-बैत
पुष्ट
साझा कब्रिस्तान बिंदु
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उम्मुल-मोमिनीन हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाह अलैहा बिन्त ख़ुवैलिद मक्का के बनू असद क़ुरैश की प्रतिष्ठित महिला, पैग़म्बर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की पहली पत्नी, उनकी संतान की माता और आरंभिक इस्लामी दावत की सबसे निर्णायक सहायक थीं। मुस्लिम ऐतिहासिक परंपरा उन्हें पहली ईमान लाने वाली शख़्सियत के रूप में याद करती है। पहली वह्य के बाद उनकी सूझ-बूझ, पैग़म्बर के चरित्र की नैतिक गवाही और निरंतर पारिवारिक तथा आर्थिक सहयोग ने मक्का की आरंभिक और असुरक्षित जमाअत को स्थिरता दी।
उनका निधन मक्का में हिजरत से लगभग तीन वर्ष पहले, सामान्यतः 619 के आसपास हुआ। इसी सामान्य समय में अबू तालिब का भी निधन हुआ और यह काल बाद की सीरत में दुख का वर्ष कहलाया।
ख़दीजा सलामुल्लाह अलैहा की दफ़्नगाह मक्का के हजून क़ब्रिस्तान से जोड़ी जाती है, जो बाद में जन्नतुल-मुअल्ला कहलाया। दर्ज निर्देशांक उस ऐतिहासिक क़ब्रिस्तान और ज़ियारत क्षेत्र को दिखाते हैं; केवल निर्देशांक किसी व्यक्तिगत क़ब्र का ऐतिहासिक प्रमाण नहीं हैं।
जीवनी और ऐतिहासिक परिचय
हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाह अलैहा बिन्त ख़ुवैलिद मक्का में क़ुरैश की प्रतिष्ठित शाखा बनू असद इब्न अब्दुल-उज़्ज़ा से थीं। वंशावली परंपरा उनके पिता का नाम ख़ुवैलिद इब्न असद सुरक्षित रखती है, जबकि बाद की जीवनी पुस्तकों में माता का नाम फ़ातिमा सलामुल्लाह अलैहा बिन्त ज़ाइदा मिलता है। जाँची गई स्रोत सामग्री के सुरक्षित माता-पिता वाले खाने खाली हैं और उनमें बदलाव नहीं किया गया; इसलिए प्रसिद्ध वंश को केवल सावधान स्रोत-आधारित वर्णन के रूप में लिखा गया है।
इस्लाम से पहले मक्का के समाज में वह सम्मान, समझदारी और व्यापार के लिए प्रसिद्ध थीं। सीरत लेखक उन्हें संपन्न महिला बताते हैं जो व्यापारिक यात्राओं के लिए भरोसेमंद प्रतिनिधि नियुक्त करती थीं। मुहम्मद की ईमानदारी और निष्पक्ष व्यवहार ने उन्हें प्रभावित किया और फिर विवाह हुआ। विवाह के समय उनकी निश्चित आयु, पहले विवाहों और कुछ पारिवारिक विवरणों में रिवायतें अलग हैं, इसलिए किसी एक विवादित विवरण को निश्चित सत्य नहीं बनाया गया।
उनका वैवाहिक जीवन लगभग पच्चीस वर्ष रहा और इसमें नुबुव्वत से पहले के वर्ष तथा वह्य का पहला दशक दोनों शामिल थे। अधिकतर जीवनी परंपराएँ क़ासिम अलैहिस्सलाम, अब्दुल्लाह अलैहिस्सलाम, ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा, रुक़य्या सलामुल्लाह अलैहा, उम्म कुलसूम सलामुल्लाह अलैहा और सैयदा फ़ातिमा सलामुल्लाह अलैहा को इस घर की संतान बताती हैं, हालांकि कुल संख्या और कुछ नामों पर मतभेद है। सहीह अल-बुख़ारी में पैग़म्बर का यह कथन सुरक्षित है कि उन्हें ख़दीजा सलामुल्लाह अलैहा से संतान मिली, जो इस विवाह की पारिवारिक केंद्रीयता दिखाता है।
वह्य से पहले भी ख़दीजा सलामुल्लाह अलैहा का घर पैग़म्बर के लिए शांति, विश्वास और व्यावहारिक साथ का केंद्र था। ग़ार-ए-हिरा में एकांत के दिनों का सामान इसी घर से जाता और वह यहीं लौटते थे। यही पृष्ठभूमि बताती है कि पहली वह्य के बाद वह सबसे पहले ख़दीजा सलामुल्लाह अलैहा के पास आए; यह केवल वैवाहिक निकटता नहीं, बल्कि परखे हुए भरोसे का संकेत था।
लगभग ६१० ईस्वी में रमज़ान के दौरान पहली वह्य आई। पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वआलिहि वसल्लम वह्य की महानता, भार और अनजान जिम्मेदारी के गहरे प्रभाव में घर लौटे। ख़दीजा सलामुल्लाह अलैहा ने न बेचैनी बढ़ाई और न उस नूरानी घटना को छोटा किया; उन्होंने सांत्वना दी और उनके सिद्ध चरित्र को प्रमाण बनाया: वह रिश्ते निभाते हैं, निर्बल का भार उठाते हैं, निर्धन की सहायता करते हैं, मेहमान का सम्मान करते हैं और सत्य के कारण आने वाली कठिनाइयों में लोगों की मदद करते हैं।
फिर ख़दीजा सलामुल्लाह अलैहा पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वआलिहि वसल्लम को अपने विद्वान संबंधी वरक़ा इब्न नौफ़ल के पास ले गईं, जो पहले ग्रंथों और नुबुव्वत की परंपरा जानते थे। वरक़ा ने वह्य लाने वाले को वही नामूस बताया जो मूसा अलैहिस्सलाम के पास आया था। उन्होंने कहा कि क़ौम विरोध करेगी, झुठलाएगी और संभव है वतन से निकाल दे; उन्होंने जीवित रहने पर सहायता की इच्छा जताई। ख़दीजा सलामुल्लाह अलैहा ने ईमान, विवेकपूर्ण जाँच, विद्वत परामर्श और आगे के ख़तरों की प्रारंभिक समझ को एक साथ जोड़ा।
ख़दीजा सलामुल्लाह अलैहा की सेवा पहली सांत्वना पर समाप्त नहीं हुई। उन्होंने सबसे पहले ईमान लाकर पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वआलिहि वसल्लम की पुष्टि की, घर को सुरक्षित दावत-केंद्र बनाया, सामाजिक प्रतिष्ठा से सुरक्षा दी और आर्थिक दबाव कम किया ताकि वह शिक्षा, इबादत, प्रचार तथा पीड़ितों की देखभाल पर ध्यान दे सकें। मुस्नद अहमद की प्रसिद्ध रिवायत याद करती है कि उन्होंने उस समय ईमान लाया जब लोगों ने इनकार किया, पुष्टि की जब लोगों ने झुठलाया और अपने धन से सहायता की जब लोगों ने वंचित किया।
उनकी संपत्ति केवल निजी सुविधा के लिए नहीं रही। सामान्य सीरत स्मृति इसे दावत के खर्च, आने वालों और आश्रितों की आवश्यकताओं तथा आर्थिक दबाव में कमज़ोर ईमान वालों की सहायता से जोड़ती है। उन्होंने भोजन, आश्रय, सलाह और आर्थिक सहयोग दिया।
शिअब अबी तालिब का सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार लगभग तीन वर्ष चला। बाद की सीरत परंपरा ख़दीजा सलामुल्लाह अलैहा को शेष साधन खर्च करने, भोजन और आवश्यक सामान पहुँचाने तथा परिवार के साथ कष्ट सहने से जोड़ती है। बहुत ऊँचे दाम पर सामान खरीदने की बातें बाद की रिवायतों में हैं, लेकिन उनकी उपस्थिति, आर्थिक क़ुर्बानी और साधनों के बहुत कम हो जाने की मूल स्मृति मजबूत है।
उनकी प्रतिष्ठा सबसे मज़बूती से सहीह हदीसों में दर्ज है। सहीह अल-बुख़ारी और सहीह मुस्लिम में जिब्रील द्वारा उनके लिए उनके रब का सलाम और जन्नत में ऐसे घर की खुशख़बरी है जिसमें न शोर होगा न थकान। दूसरी प्रामाणिक रिवायत उन्हें अपने समय और अपनी उम्मत की श्रेष्ठ महिलाओं में रखती है। ये गुण बाद की बढ़ी हुई प्रशंसा नहीं, बल्कि आरंभिक हदीसी धरोहर का हिस्सा हैं।
हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा की रिवायत बताती है कि पैग़म्बर ख़दीजा सलामुल्लाह अलैहा का बार-बार उल्लेख करते और उनकी सहेलियों के साथ भलाई का संबंध बनाए रखते थे। यह केवल निजी प्रेम नहीं था; इसमें कृतज्ञता, वफ़ादारी और उन बलिदानों की पहचान थी जो इस्लाम के सार्वजनिक रूप से शक्तिशाली होने से पहले दिए गए। इस्लामी नैतिकता में उनका जीवन इस बात का स्थायी उदाहरण बना कि घर के भीतर सूझ-बूझ, विश्वास और शांत सेवा इतिहास की बड़ी दिशा बदल सकती है।
ख़दीजा सलामुल्लाह अलैहा का निधन मक्का में हिजरत से लगभग तीन वर्ष पहले, सामान्यतः 619 के आसपास माना जाता है। इसी सामान्य काल में अबू तालिब का भी निधन हुआ और बाद की सीरत स्मृति ने इसे दुख का वर्ष कहा। उनकी दफ़्नगाह मक्का के हजून क़ब्रिस्तान से जोड़ी जाती है, जो बाद में जन्नतुल-मुअल्ला कहलाया। पैग़म्बर की निरंतर स्मृति, उनकी सहेलियों के प्रति वफ़ादारी और संतान द्वारा चलने वाली पारिवारिक विरासत ने उनकी महानता को जीवित रखा।
इस्लाम से पहले मक्का के समाज में वह सम्मान, समझदारी और व्यापार के लिए प्रसिद्ध थीं। सीरत लेखक उन्हें संपन्न महिला बताते हैं जो व्यापारिक यात्राओं के लिए भरोसेमंद प्रतिनिधि नियुक्त करती थीं। मुहम्मद की ईमानदारी और निष्पक्ष व्यवहार ने उन्हें प्रभावित किया और फिर विवाह हुआ। विवाह के समय उनकी निश्चित आयु, पहले विवाहों और कुछ पारिवारिक विवरणों में रिवायतें अलग हैं, इसलिए किसी एक विवादित विवरण को निश्चित सत्य नहीं बनाया गया।
उनका वैवाहिक जीवन लगभग पच्चीस वर्ष रहा और इसमें नुबुव्वत से पहले के वर्ष तथा वह्य का पहला दशक दोनों शामिल थे। अधिकतर जीवनी परंपराएँ क़ासिम अलैहिस्सलाम, अब्दुल्लाह अलैहिस्सलाम, ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा, रुक़य्या सलामुल्लाह अलैहा, उम्म कुलसूम सलामुल्लाह अलैहा और सैयदा फ़ातिमा सलामुल्लाह अलैहा को इस घर की संतान बताती हैं, हालांकि कुल संख्या और कुछ नामों पर मतभेद है। सहीह अल-बुख़ारी में पैग़म्बर का यह कथन सुरक्षित है कि उन्हें ख़दीजा सलामुल्लाह अलैहा से संतान मिली, जो इस विवाह की पारिवारिक केंद्रीयता दिखाता है।
वह्य से पहले भी ख़दीजा सलामुल्लाह अलैहा का घर पैग़म्बर के लिए शांति, विश्वास और व्यावहारिक साथ का केंद्र था। ग़ार-ए-हिरा में एकांत के दिनों का सामान इसी घर से जाता और वह यहीं लौटते थे। यही पृष्ठभूमि बताती है कि पहली वह्य के बाद वह सबसे पहले ख़दीजा सलामुल्लाह अलैहा के पास आए; यह केवल वैवाहिक निकटता नहीं, बल्कि परखे हुए भरोसे का संकेत था।
लगभग ६१० ईस्वी में रमज़ान के दौरान पहली वह्य आई। पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वआलिहि वसल्लम वह्य की महानता, भार और अनजान जिम्मेदारी के गहरे प्रभाव में घर लौटे। ख़दीजा सलामुल्लाह अलैहा ने न बेचैनी बढ़ाई और न उस नूरानी घटना को छोटा किया; उन्होंने सांत्वना दी और उनके सिद्ध चरित्र को प्रमाण बनाया: वह रिश्ते निभाते हैं, निर्बल का भार उठाते हैं, निर्धन की सहायता करते हैं, मेहमान का सम्मान करते हैं और सत्य के कारण आने वाली कठिनाइयों में लोगों की मदद करते हैं।
फिर ख़दीजा सलामुल्लाह अलैहा पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वआलिहि वसल्लम को अपने विद्वान संबंधी वरक़ा इब्न नौफ़ल के पास ले गईं, जो पहले ग्रंथों और नुबुव्वत की परंपरा जानते थे। वरक़ा ने वह्य लाने वाले को वही नामूस बताया जो मूसा अलैहिस्सलाम के पास आया था। उन्होंने कहा कि क़ौम विरोध करेगी, झुठलाएगी और संभव है वतन से निकाल दे; उन्होंने जीवित रहने पर सहायता की इच्छा जताई। ख़दीजा सलामुल्लाह अलैहा ने ईमान, विवेकपूर्ण जाँच, विद्वत परामर्श और आगे के ख़तरों की प्रारंभिक समझ को एक साथ जोड़ा।
ख़दीजा सलामुल्लाह अलैहा की सेवा पहली सांत्वना पर समाप्त नहीं हुई। उन्होंने सबसे पहले ईमान लाकर पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वआलिहि वसल्लम की पुष्टि की, घर को सुरक्षित दावत-केंद्र बनाया, सामाजिक प्रतिष्ठा से सुरक्षा दी और आर्थिक दबाव कम किया ताकि वह शिक्षा, इबादत, प्रचार तथा पीड़ितों की देखभाल पर ध्यान दे सकें। मुस्नद अहमद की प्रसिद्ध रिवायत याद करती है कि उन्होंने उस समय ईमान लाया जब लोगों ने इनकार किया, पुष्टि की जब लोगों ने झुठलाया और अपने धन से सहायता की जब लोगों ने वंचित किया।
उनकी संपत्ति केवल निजी सुविधा के लिए नहीं रही। सामान्य सीरत स्मृति इसे दावत के खर्च, आने वालों और आश्रितों की आवश्यकताओं तथा आर्थिक दबाव में कमज़ोर ईमान वालों की सहायता से जोड़ती है। उन्होंने भोजन, आश्रय, सलाह और आर्थिक सहयोग दिया।
शिअब अबी तालिब का सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार लगभग तीन वर्ष चला। बाद की सीरत परंपरा ख़दीजा सलामुल्लाह अलैहा को शेष साधन खर्च करने, भोजन और आवश्यक सामान पहुँचाने तथा परिवार के साथ कष्ट सहने से जोड़ती है। बहुत ऊँचे दाम पर सामान खरीदने की बातें बाद की रिवायतों में हैं, लेकिन उनकी उपस्थिति, आर्थिक क़ुर्बानी और साधनों के बहुत कम हो जाने की मूल स्मृति मजबूत है।
उनकी प्रतिष्ठा सबसे मज़बूती से सहीह हदीसों में दर्ज है। सहीह अल-बुख़ारी और सहीह मुस्लिम में जिब्रील द्वारा उनके लिए उनके रब का सलाम और जन्नत में ऐसे घर की खुशख़बरी है जिसमें न शोर होगा न थकान। दूसरी प्रामाणिक रिवायत उन्हें अपने समय और अपनी उम्मत की श्रेष्ठ महिलाओं में रखती है। ये गुण बाद की बढ़ी हुई प्रशंसा नहीं, बल्कि आरंभिक हदीसी धरोहर का हिस्सा हैं।
हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा की रिवायत बताती है कि पैग़म्बर ख़दीजा सलामुल्लाह अलैहा का बार-बार उल्लेख करते और उनकी सहेलियों के साथ भलाई का संबंध बनाए रखते थे। यह केवल निजी प्रेम नहीं था; इसमें कृतज्ञता, वफ़ादारी और उन बलिदानों की पहचान थी जो इस्लाम के सार्वजनिक रूप से शक्तिशाली होने से पहले दिए गए। इस्लामी नैतिकता में उनका जीवन इस बात का स्थायी उदाहरण बना कि घर के भीतर सूझ-बूझ, विश्वास और शांत सेवा इतिहास की बड़ी दिशा बदल सकती है।
ख़दीजा सलामुल्लाह अलैहा का निधन मक्का में हिजरत से लगभग तीन वर्ष पहले, सामान्यतः 619 के आसपास माना जाता है। इसी सामान्य काल में अबू तालिब का भी निधन हुआ और बाद की सीरत स्मृति ने इसे दुख का वर्ष कहा। उनकी दफ़्नगाह मक्का के हजून क़ब्रिस्तान से जोड़ी जाती है, जो बाद में जन्नतुल-मुअल्ला कहलाया। पैग़म्बर की निरंतर स्मृति, उनकी सहेलियों के प्रति वफ़ादारी और संतान द्वारा चलने वाली पारिवारिक विरासत ने उनकी महानता को जीवित रखा।
ऐतिहासिक महत्व और विरासत
ख़दीजा सलामुल्लाह अलैहा की ऐतिहासिक महत्ता आरंभिक और सबसे असुरक्षित इस्लामी दावत में उनकी पुष्टि, सुरक्षा और व्यावहारिक सहायता से शुरू होती है। पहली वह्य के बाद उनका नैतिक तर्क संदेश की विश्वसनीयता को पैग़म्बर के पहले से सिद्ध चरित्र से जोड़ता है।
वह आरंभिक इस्लामी इतिहास में महिला की सक्रिय धार्मिक, आर्थिक और बौद्धिक भूमिका का प्रमुख उदाहरण हैं। उनका व्यापार, निर्णय और संसाधनों का उपयोग दिखाता है कि पारिवारिक अधिकार और आर्थिक क्षमता ईमान, सामाजिक सेवा और सुधार की शक्ति बन सकते हैं।
उनकी श्रेष्ठता केंद्रीय हदीसी स्रोतों में सुरक्षित है: उनके रब की ओर से सलाम, जन्नत के शांत घर की खुशख़बरी और श्रेष्ठ महिलाओं में स्थान। इसलिए उनका दर्जा साझा मुस्लिम स्मृति का भाग है, किसी एक बाद के धार्मिक मत की विशेष रचना नहीं।
उनकी विरासत पैग़म्बर के साथ वफ़ादार संगति, फ़ातिमा सलामुल्लाह अलैहा के माध्यम से अहलुल-बैत की निरंतरता और दबाव में अडिग सेवा को जोड़ती है। इसी कारण वह केवल पैग़म्बर के घर की ऐतिहासिक पत्नी नहीं, बल्कि पहली मुस्लिम जमाअत की बुनियादी निर्माताओं में हैं।
शिअब अबी तालिब के बहिष्कार में ख़दीजा सलामुल्लाह अलैहा की सेवा का सबसे स्पष्ट व्यावहारिक रूप दिखाई देता है, जहाँ धन, सामाजिक प्रतिष्ठा और निजी सुविधा को दावत तथा घिरे हुए परिवार की आवश्यकताओं के लिए लगाया गया। उनका जीवन दिखाता है कि आरंभिक इस्लाम की रक्षा केवल प्रचार या युद्ध से नहीं, बल्कि घर, भोजन, विश्वास, आर्थिक सहारा और निरंतर मानवीय देखभाल से भी हुई।
वह आरंभिक इस्लामी इतिहास में महिला की सक्रिय धार्मिक, आर्थिक और बौद्धिक भूमिका का प्रमुख उदाहरण हैं। उनका व्यापार, निर्णय और संसाधनों का उपयोग दिखाता है कि पारिवारिक अधिकार और आर्थिक क्षमता ईमान, सामाजिक सेवा और सुधार की शक्ति बन सकते हैं।
उनकी श्रेष्ठता केंद्रीय हदीसी स्रोतों में सुरक्षित है: उनके रब की ओर से सलाम, जन्नत के शांत घर की खुशख़बरी और श्रेष्ठ महिलाओं में स्थान। इसलिए उनका दर्जा साझा मुस्लिम स्मृति का भाग है, किसी एक बाद के धार्मिक मत की विशेष रचना नहीं।
उनकी विरासत पैग़म्बर के साथ वफ़ादार संगति, फ़ातिमा सलामुल्लाह अलैहा के माध्यम से अहलुल-बैत की निरंतरता और दबाव में अडिग सेवा को जोड़ती है। इसी कारण वह केवल पैग़म्बर के घर की ऐतिहासिक पत्नी नहीं, बल्कि पहली मुस्लिम जमाअत की बुनियादी निर्माताओं में हैं।
शिअब अबी तालिब के बहिष्कार में ख़दीजा सलामुल्लाह अलैहा की सेवा का सबसे स्पष्ट व्यावहारिक रूप दिखाई देता है, जहाँ धन, सामाजिक प्रतिष्ठा और निजी सुविधा को दावत तथा घिरे हुए परिवार की आवश्यकताओं के लिए लगाया गया। उनका जीवन दिखाता है कि आरंभिक इस्लाम की रक्षा केवल प्रचार या युद्ध से नहीं, बल्कि घर, भोजन, विश्वास, आर्थिक सहारा और निरंतर मानवीय देखभाल से भी हुई।
पारिवारिक संबंध
स्रोत
Sahih al-Bukhari | Muhammad ibn Ismail al-Bukhari | Hadith 3 | https://sunnah.com/bukhari:3 | First revelation, Khadija's reassurance, and consultation with Waraqa ibn NawfalSahih al-Bukhari | Muhammad ibn Ismail al-Bukhari | Hadith 3820 | https://sunnah.com/bukhari:3820 | Gabriel's greeting and glad tidings of a peaceful house in Paradise
Sahih al-Bukhari | Muhammad ibn Ismail al-Bukhari | Hadith 3818 | https://sunnah.com/bukhari:3818 | The Prophet's lasting remembrance of Khadija, her friends, and their children
Sahih al-Bukhari | Muhammad ibn Ismail al-Bukhari | Hadith 3432 | https://sunnah.com/bukhari:3432 | Khadija's excellence among the women of her community
Sahih Muslim | Muslim ibn al-Hajjaj | Hadith 2432 | https://sunnah.com/muslim:2432 | Glad tidings of a house in Paradise without noise or fatigue
Khadijah | Encyclopaedia Britannica | Biographical entry; pagination not applicable | https://www.britannica.com/biography/Khadijah | Meccan background, marriage, early support, and death chronology
The Mother of the Faithful Khadijah bint Khuwaylid | Ahmed Zaki Yamani; Al-Furqan Islamic Heritage Foundation | Published study, pp. 21–38 | https://al-furqan.com/the-mother-of-the-faithful-khadijah-bint-khuwaylid/ | Lineage, social setting, marriage, household, early support, death, and burial tradition
Musnad Ahmad ibn Hanbal | Ahmad ibn Hanbal | Hadith 24864 in the Dar al-Risala numbering; grading varies by scholarly assessment | https://dorar.net/h/RHTwe0WT?osoul=1 | Report praising Khadija's belief, confirmation, financial support, and children
चित्र दीर्घा
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