हज़रत मरयम अलैहस्सलाम

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हज़रत मरयम बिन्त इमरान अलैहस्सलाम क़ुरआन में निजी नाम से उल्लिखित एकमात्र महिला और सबसे विस्तार से वर्णित सम्मानित महिलाओं में से हैं। उनकी कहानी जन्म से पहले शुरू होती है, जब उनकी माता गर्भस्थ बच्चे को अल्लाह की इबादत और सेवा के लिए समर्पित करने की मन्नत करती हैं। जन्म, नामकरण और सुरक्षा की दुआ के बाद अल्लाह मरयम को अच्छी तरह स्वीकार करता है, सुंदर विकास देता है और नबी ज़करिय्या अलैहिस्सलाम की अभिरक्षा में रखता है। उनकी इबादतगाह में ज़करिय्या बार-बार ऐसी रोज़ी पाते हैं जिसे मरयम सीधे अल्लाह की ओर से बताती हैं। शास्त्रीय तफ़सीरें इसे अक्सर बेमौसम फलों के रूप में समझाती हैं, और इब्न कसीर इस घटना को नेक बंदों और औलिया की करामात की दलील बताते हैं। यही इबादतगाह वाला प्रसंग ज़करिय्या की अपनी दुआ का मोड़ बनता है। क़ुरआन तुरंत कहता है: “उसी समय ज़करिय्या ने अपने रब से दुआ की।” तबरी, इब्न कसीर और क़ुर्तुबी समझाते हैं कि मरयम के पास अल्लाह की असाधारण अता देखकर ज़करिय्या के दिल में यह आशा जागी कि जो रब सामान्य कारणों के बिना उन्हें रोज़ी दे सकता है, वही बढ़ती उम्र और बाँझ पत्नी के बावजूद उन्हें नेक संतान भी दे सकता है। उन्होंने दुआ की और अगली आयत में नमाज़ की अवस्था में यह्या अलैहिस्सलाम की खुशख़बरी आती है। इससे यह आध्यात्मिक अर्थ सामने आता है कि किसी नेक बंदे पर अल्लाह की विशेष करामात देखना इंसान के दिल में अल्लाह की शक्ति पर नई उम्मीद पैदा कर सकता है और उसे दुआ की ओर प्रेरित कर सकता है। इसके बाद मरयम की अपनी महान परीक्षा और प्रतिष्ठा सामने आती है। अल्लाह उन्हें चुनता और पवित्र करता है, किसी मानव पिता के बिना मसीह ईसा इब्न मरयम की शुभसूचना देता है, और सूरह मरयम उनके अलग होने, फ़रिश्ते से मुलाक़ात, गर्भ, खजूर के पेड़ के पास प्रसव-पीड़ा, अल्लाह की ओर से सांत्वना और रोज़ी, क़ौम के पास वापसी तथा शिशु ईसा के बोलने से उनकी सार्वजनिक बेगुनाही का वर्णन करती है। क़ुरआन उनके विरुद्ध बड़े कलंक की निंदा करता, उन्हें सिद्दीक़ा कहता, उनकी पवित्रता, ईमान और आज्ञाकारिता की प्रशंसा करता और उन्हें उनके पुत्र के साथ संसारों के लिए निशानी बनाता है। सहीह हदीसें भी उन्हें श्रेष्ठ और पूर्णता प्राप्त महिलाओं में रखती हैं। उनकी अंतिम जीवन-कथा, मृत्यु और दफ़्न इस्लामी प्राथमिक स्रोतों से निश्चित नहीं, इसलिए यरूशलम और इफ़िसुस की बाद की परंपराएँ पवित्र इतिहास की परंपराएँ हैं, प्रमाणित इस्लामी कब्रें नहीं।
जन्म

क़ुरआन हज़रत मरयम अलैहस्सलाम के जन्म का विवरण देता है, लेकिन कोई कैलेंडर तिथि या निश्चित जन्मस्थान नहीं बताता। क़ुरआन ३:३५-३६ कहता है कि इमरान की पत्नी ने गर्भस्थ बच्चे को अल्लाह की सेवा के लिए समर्पित करने की मन्नत की, फिर एक लड़की को जन्म दिया, उसका नाम मरयम रखा और उसके तथा उसकी संतान के लिए दिव्य सुरक्षा माँगी। क़ुरआन ३:३७ कहता है कि अल्लाह ने मरयम को कृपापूर्वक स्वीकार किया और उन्हें अच्छा विकास दिया। क़ुरआन या प्रमाणित हदीस कोई निश्चित वर्ष, आयु, नगर या सुरक्षित पूर्ण कालक्रम नहीं देती, इसलिए बाद की कालक्रम-रचनाओं को निश्चित जन्म-डेटा के रूप में प्रस्तुत नहीं करना चाहिए।

निधन

हज़रत मरयम अलैहस्सलाम के बारे में समीक्षा किए गए क़ुरआन और अत्यंत प्रमाणित हदीस प्रमाण उनकी मृत्यु की तिथि, मृत्यु के समय आयु, मृत्यु का कारण या निश्चित स्थान नहीं बताते। क़ुरआन २३:५० कहता है कि मरयम और उनके पुत्र को एक ऊँची, समतल और बहते पानी वाली जगह में आश्रय दिया गया, लेकिन शास्त्रीय व्याख्याकार उस स्थान पर अलग-अलग मत रखते हैं और यह आयत मृत्यु-सूचना नहीं है। बाद की यरूशलम “डॉर्मिशन” परंपराएँ और इफ़िसुस की अंतिम-निवास परंपराएँ उनके अंतिम दिनों को भिन्न रूप से बताती हैं। इसलिए सटीक इस्लामी मृत्यु-कालक्रम अनिर्णीत रहता है।

दफ़न या संबद्ध स्थान

स्थान का प्रकार: विवादित / बाद की पवित्र-भूगोल परंपराएँ; कोई प्रमाणित इस्लामी दफ़न नहीं। हज़रत मरयम अलैहस्सलाम के बारे में समीक्षा किए गए न तो क़ुरआन और न अत्यंत प्रमाणित हदीस उनकी दफ़न-स्थली पहचानते हैं। एक प्रमुख प्राचीन ईसाई परंपरा यरूशलम की क़िदरोन घाटी या गेथसेमनी में चट्टान काटकर बनी क़ब्र को मरयम का मक़बरा मानकर सम्मान देती है। आधुनिक विद्वत् अध्ययन इस तीर्थस्थल की निरंतर वंदना और ऐतिहासिक विकास को दर्ज करते हैं। एक अलग और बाद की परंपरा पश्चिमी तुर्किये में इफ़िसुस के पास एक घर को मरयम के अंतिम निवास और मृत्यु से जोड़ती है। प्रारंभिक डॉर्मिशन परंपराओं का आलोचनात्मक अध्ययन सामान्यतः यरूशलम परंपरा को पहले का और इफ़िसुस परंपरा को ऐतिहासिक रूप से बहुत बाद का और कमज़ोर मानता है। ये परंपराएँ मरयम की पवित्र स्मृति के इतिहास के लिए महत्त्वपूर्ण प्रमाण हैं, लेकिन किसी इस्लामी क़ब्र को प्रमाणित नहीं करतीं। क्योंकि इस्लामी प्राथमिक स्रोत दफ़न-स्थान नहीं बताते और बाद की परंपराएँ भी एकमत नहीं हैं, इसलिए किसी एक मज़ार, शहर, निर्देशांक या नक़्शा-बिंदु को मरयम की सिद्ध क़ब्र के रूप में प्रस्तुत नहीं करना चाहिए।

जीवनी और ऐतिहासिक परिचय

हज़रत मरयम अलैहस्सलाम क़ुरआन में इमरान की बेटी और नबी ईसा अलैहिस्सलाम की माता के रूप में सामने आती हैं। उनकी कहानी केवल किसी दूसरे नबी की कथा की प्रस्तावना नहीं है; यह जन्म से पहले शुरू होती है, उनकी परवरिश और इबादत का पीछा करती है, चमत्कारी गर्भ और जन्म को उनके अपने अनुभव से बताती है, उन पर लगाए गए आरोप को सामने लाती है और फिर बार-बार उनकी पवित्रता, सच्चाई और ईमान की रक्षा करती है।

कहानी इमरान की पत्नी से शुरू होती है। क़ुरआन ३:३५ में वे गर्भस्थ बच्चे को अल्लाह की सेवा के लिए समर्पित करने की मन्नत करती हैं। बेटी के जन्म पर क़ुरआन ३:३६ नाम “मरयम” सुरक्षित रखता है और माता की वह दुआ भी कि मरयम और उनकी संतान शैतान के प्रभाव से सुरक्षित रहें। क़ुरआन पिता का नाम इमरान बताता है, लेकिन माता का निजी नाम नहीं देता। हन्ना या हिन्ना बिन्त फ़ाक़ूज़ जैसे नाम शास्त्रीय तफ़सीर से आते हैं, इसलिए उन्हें तफ़सीरी परंपरा ही कहना चाहिए।

सहीह हदीस माता की सुरक्षा वाली दुआ को विशेष अर्थ देती है। सहीह बुख़ारी में है कि मरयम और उनके पुत्र को जन्म के समय शैतान के स्पर्श से विशेष सुरक्षा मिली। यह रिवायत माता की दुआ और मरयम की विशिष्ट सुरक्षा को जोड़ती है, बिना बाद की असिद्ध वंशावली बातें जोड़ने की आवश्यकता के।

इसके बाद अल्लाह मरयम को “अच्छे स्वीकार” के साथ स्वीकार करता है, उन्हें सुंदर विकास देता है और नबी ज़करिय्या अलैहिस्सलाम की देखरेख में रखता है। क़ुरआन ३:४४ बाद में उन कलमों के डालने का उल्लेख करता है जिनसे यह तय होना था कि उनकी अभिरक्षा कौन लेगा। इसलिए ज़करिय्या का संबंध अभिभावकता, शिक्षा और धार्मिक देखभाल का है, जैविक पितृत्व का नहीं।

फिर उनकी कहानी का एक अत्यंत आध्यात्मिक दृश्य आता है। जब भी ज़करिय्या मरयम की इबादतगाह या मिहराब में प्रवेश करते, उनके पास रोज़ी पाते। वे पूछते कि यह कहाँ से आई और मरयम जवाब देतीं कि यह अल्लाह की ओर से है; अल्लाह जिसे चाहता है बेहिसाब रोज़ी देता है। क़ुरआन स्वयं केवल “रोज़ी” कहता है। तबरी, इब्न कसीर और दूसरे शास्त्रीय मुफ़स्सिर अक्सर गर्मी के फल सर्दी में और सर्दी के फल गर्मी में मिलने की रिवायत बताते हैं, और इब्न कसीर साफ़ लिखते हैं कि इसमें औलिया की करामात की दलील है।

क़ुरआन इसके तुरंत बाद कहता है: “उसी समय ज़करिय्या ने अपने रब से दुआ की” और नेक संतान माँगी। तबरी समझाते हैं कि मरयम के पास सामान्य मानवीय कारणों के बिना आने वाली रोज़ी देखकर ज़करिय्या को आशा हुई कि अल्लाह बढ़ती उम्र और बाँझ पत्नी के बावजूद उन्हें भी संतान दे सकता है। इब्न कसीर भी यही कारण-संबंध बताते हैं और क़ुर्तुबी कहते हैं कि मरयम की यह असाधारण रोज़ी ज़करिय्या की दुआ का कारण बनी। अगली आयत में फ़रिश्ते उन्हें नमाज़ में खड़े हुए यह्या अलैहिस्सलाम की शुभसूचना देते हैं। इस प्रकार क़ुरआनी क्रम मरयम की करामात, ज़करिय्या की आशा, दुआ और स्वीकृति की खुशख़बरी को बहुत निकट जोड़ता है। सावधान धार्मिक निष्कर्ष यह है कि किसी नेक बंदे पर अल्लाह की विशेष अता देखकर एक नबी ने उसी समय और इबादत के वातावरण में अल्लाह से अपनी ज़रूरत माँगी;

इसके बाद मरयम की आध्यात्मिक प्रतिष्ठा सीधे बताई जाती है। क़ुरआन ३:४२ में फ़रिश्ते कहते हैं कि अल्लाह ने उन्हें चुना, पवित्र किया और संसार की महिलाओं पर चुना। अगली आयत उन्हें आज्ञाकारिता, सज्दा और रुकू का आदेश देती है। इसलिए उनका सम्मान केवल ईसा की माता होने से नहीं, बल्कि अपनी इबादत, पवित्रता और समर्पण से भी स्थापित है।

क़ुरआन ३:४५-४७ में मसीह ईसा इब्न मरयम की शुभसूचना आती है। मरयम साफ़ पूछती हैं कि उन्हें बच्चा कैसे होगा जबकि किसी पुरुष ने उन्हें छुआ नहीं। क़ुरआनी उत्तर इस गर्भ को अल्लाह की सीधी शक्ति का चमत्कार बताता है और ईसा के जन्म में कोई मानव पिता नहीं जोड़ता।

सूरह मरयम इस घटना को अधिक व्यक्तिगत निकटता से बताती है। मरयम अपने परिवार से अलग होकर एक पूर्वी स्थान पर जाती हैं, फ़रिश्ते से मुलाक़ात होती है और वे रहमान की पनाह माँगती हैं। उन्हें पवित्र पुत्र की शुभसूचना मिलती है, फिर गर्भ ठहरता है और वे दूर स्थान चली जाती हैं। प्रसव-पीड़ा उन्हें खजूर के तने तक ले आती है; पाठ उनकी पीड़ा, दुखी न होने की सांत्वना, नीचे बहते पानी, ताज़ी पकी खजूरों और खाने-पीने की हिदायत बताता है।

फिर वे शिशु को उठाए अपनी क़ौम के पास लौटती हैं। लोग उन पर गंभीर आरोप लगाते और “हारून की बहन” कहते हैं। मरयम बच्चे की ओर संकेत करती हैं और शिशु ईसा बोलकर अपने को अल्लाह का बंदा, नबी और अपनी माता के प्रति नेक बताते हैं। क़ुरआनी कथा में यही चमत्कारी भाषण मरयम की सार्वजनिक बेगुनाही सिद्ध करता है। सहीह मुस्लिम नबी मुहम्मद की यह व्याख्या सुरक्षित करता है कि पहले लोग अपने व्यक्तियों का नाम पिछले नबियों और नेक लोगों के नाम पर रखते थे, इसलिए यह वाक्य मरयम को मूसा के भाई हारून की जैविक बहन नहीं बनाता।

जन्म-कथा के बाद भी क़ुरआन मरयम की प्रतिष्ठा की रक्षा करता है। वह उनके विरुद्ध बड़े कलंक की निंदा करता है, उन्हें सिद्दीक़ा कहता है, उनकी पवित्रता और ईमान की प्रशंसा करता है और उन्हें उनके पुत्र के साथ निशानी बनाता है। सहीह हदीसें भी मरयम बिन्त इमरान को श्रेष्ठ महिलाओं और असाधारण पूर्णता प्राप्त महिलाओं में गिनती हैं। मध्यकालीन मुस्लिम विद्वानों में उनकी नुबुव्वत पर वास्तविक मतभेद रहा; सुरक्षित सामान्य वर्णन यह है कि वे इस्लाम की सबसे महान नेक और सिद्दीक़ा महिलाओं में से हैं, जबकि नुबुव्वत एक विद्वतापूर्ण मतभेद रहा।

मरयम के अंतिम वर्ष उनके युवाकाल और ईसा के जन्म की कहानी जितने स्पष्ट नहीं हैं। क़ुरआन २३:५० कहता है कि अल्लाह ने उन्हें और उनके पुत्र को एक ऐसी ऊँची जगह आश्रय दिया जहाँ ठहराव और बहता पानी था, लेकिन यह किसी आधुनिक शहर को निश्चित नहीं करता और मृत्यु की ख़बर भी नहीं। समीक्षा किए गए इस्लामी प्राथमिक स्रोत उनकी मृत्यु की तारीख़, उम्र, कारण या कब्र सिद्ध नहीं करते। यरूशलम का मरयम से जुड़ा मक़बरा और इफ़िसुस की बाद की परंपरा ईसाई पवित्र भूगोल के इतिहास में महत्त्वपूर्ण हैं, लेकिन प्रमाणित इस्लामी दफ़्न नहीं।

ऐतिहासिक महत्व और विरासत

हज़रत मरयम अलैहस्सलाम इस्लामी पवित्र इतिहास में केंद्रीय हैं क्योंकि क़ुरआन उन्हें असाधारण रूप से पूर्ण व्यक्तिगत कथा देता है और एक पूरी सूरह उनके नाम पर है। वे केवल ईसा की कहानी शुरू करने वाली माता नहीं, बल्कि इबादत, इलाही स्वीकार्यता, परीक्षा, धैर्य और बेगुनाही की स्वतंत्र मिसाल हैं।

इबादतगाह में रोज़ी की घटना मुस्लिम आध्यात्मिकता में विशेष महत्त्व रखती है। क़ुरआन कहता है कि ज़करिय्या मरयम के पास रोज़ी पाते और वे उसे अल्लाह की ओर से बताती थीं। इब्न कसीर इसे औलिया की करामात की दलील कहते हैं। तबरी, इब्न कसीर और क़ुर्तुबी फिर उसी असाधारण रोज़ी को ज़करिय्या की तत्काल संतान-दुआ और यह्या की शुभसूचना से जोड़ते हैं। इसलिए यह प्रसंग इस बात का मज़बूत क़ुरआनी उदाहरण है कि किसी नेक बंदे पर अल्लाह की विशेष अता देखना दिल में अल्लाह की शक्ति पर नई आशा जगा सकता है और इंसान को दुआ की ओर प्रेरित कर सकता है।

मरयम का मातृत्व इस्लामी धर्मविज्ञान के लिए भी मूलभूत है। क़ुरआन किसी मानव पिता के बिना ईसा के चमत्कारी जन्म की पुष्टि करता है, मरयम पर लगाए गए कलंक को कठोरता से अस्वीकार करता है और साथ ही उन्हें सिद्दीक़ा कहकर माता और पुत्र दोनों की मानवता स्पष्ट रखता है। इस तरह उनकी कहानी चमत्कार, पवित्रता और इलाही शक्ति को शुद्ध तौहीद के साथ जोड़ती है।

सहीह हदीसें मरयम बिन्त इमरान को श्रेष्ठ महिलाओं और असाधारण पूर्णता प्राप्त महिलाओं में रखकर महिला आध्यात्मिक उत्कृष्टता की बड़ी मिसाल बनाती हैं। उनकी नुबुव्वत पर मध्यकालीन मतभेद भी दिखाता है कि मुस्लिम विद्वानों ने उनके आध्यात्मिक दर्जे को कितनी गंभीरता से लिया, हालाँकि क़ुरआन की स्पष्ट उपाधि उनके लिए “सिद्दीक़ा” है।

मुस्लिम-ईसाई संवाद में भी मरयम एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण साझा किंतु अलग-अलग ढंग से समझी जाने वाली हस्ती हैं। दोनों परंपराएँ उन्हें गहरा सम्मान देती हैं, जबकि क़ुरआन उन्हें अपने विशिष्ट नबुव्वत और ईश्वर की एकता के दृष्टिकोण में रखता है। यरूशलम और इफ़िसुस की बाद की पवित्र परंपराएँ उनकी व्यापक ऐतिहासिक स्मृति दिखाती हैं, पर इन्हें क़ुरआन और सहीह हदीस से सिद्ध जीवन तथा दफ़्न की बातों से अलग रखना आवश्यक है।

पारिवारिक संबंध

स्रोत

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Tafsir al-Tabari | Muhammad ibn Jarir al-Tabari | Commentary on Q 19:28; printed pagination varies | https://quran.ksu.edu.sa/tafseer/tabary/sura19-aya28.html | “हारून की बहन” पर प्रारंभिक व्याख्यात्मक मत और सहीह मुस्लिम की व्याख्या से संगत रिवायत
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Tafsir al-Qurtubi | Muhammad ibn Ahmad al-Qurtubi | Commentary on Q 5:75; displayed p. 120, printed pagination varies | https://quran.ksu.edu.sa/tafseer/qortobi/sura5-aya75.html | मरयम की नुबुव्वत के विरुद्ध तर्क का उल्लेख, लेकिन यह प्रश्न भी कि क्या सिद्दीक़ा होना नुबुव्वत को बाहर करता है
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Al-Mizan fi Tafsir al-Qur'an | Muhammad Husayn al-Tabataba'i | Commentary on Q 3:42-60 | https://al-islam.org/al-mizan-exegesis-quran-volume-6-sayyid-muhammad-husayn-tabatabai/sura-aali-imran-verses-42-60 | मरयम के चयन, फ़रिश्तों से संवाद और बिना पुरुष के गर्भ का इमामी दृष्टि से विश्लेषण
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