नामित पुराने स्रोत इब्राहीम अल-ख़व्वास रहमतुल्लाह अलैह की अंतिम बीमारी और मृत्यु को रय की जामे मस्जिद में रखते हैं। सिफ़त अल-सफ़वा में २९१ हिजरी का कथन है, साथ ही २८४ हिजरी का दूसरा कथन भी सुरक्षित है, और यूसुफ़ बिन अल-हुसैन अल-राज़ी को उनके ग़ुस्ल तथा दफ़न की व्यवस्था करने वाला बताया गया है।
इब्राहीम अल-ख़व्वास
PER-000437
नेक व्यक्ति
पुष्ट
दफ़न स्थान अज्ञात
साझा ऐतिहासिक दायरा
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इब्राहीम अल-ख़व्वास रहमतुल्लाह अलैह तीसरी हिजरी सदी के जाने-माने आरंभिक सूफ़ी मशाइख़ में थे। पुराने सूफ़ी स्रोत उन्हें अनुशासित तवक्कुल, इबादत, हलाल कमाई, सफ़र, आत्म-संयम और लोगों की सेवा से जोड़ते हैं और उनसे संबंधित करामात की रिवायतें भी सुरक्षित रखते हैं। वही स्रोत उनकी अंतिम बीमारी और मृत्यु को रय की जामे मस्जिद में रखते हैं और यूसुफ़ बिन अल-हुसैन अल-राज़ी को उनके ग़ुस्ल और दफ़न की व्यवस्था करने वाला बताते हैं; इसलिए बग़दाद का शूनीज़िय्या स्थान एक संबद्ध मक़ाम है, ऐतिहासिक रूप से सिद्ध मुख्य क़ब्र नहीं।
पुराने स्रोत उनके अंतिम संस्कार और दफ़न को रय से जोड़ते हैं और बग़दाद के शूनीज़िय्या स्थान को उनकी क़ब्र बताने वाला कोई नामित पुराना स्रोत प्रस्तुत नहीं करती। इसलिए बग़दाद का स्थान एक संबद्ध मक़ाम या स्मृति-संबंध के रूप में रखा गया है, ऐतिहासिक रूप से सिद्ध मुख्य दफ़नगाह के रूप में नहीं।
जीवनी और ऐतिहासिक परिचय
इब्राहीम अल-ख़व्वास रहमतुल्लाह अलैह, अबू इसहाक़ इब्राहीम बिन अहमद बिन इस्माईल अल-ख़व्वास, तीसरी हिजरी सदी के सूफ़ी संसार की एक जानी-पहचानी शख़्सियत थे। वह जुनैद बग़दादी, अबू अल-हुसैन अल-नूरी और दूसरे आरंभिक मशाइख़ के दौर के सूफ़ी वातावरण से जुड़े थे, और उनकी जीवनी में तवक्कुल, अनुशासित यात्रा, हलाल कमाई, भूख की साधना, साथियों की सेवा और बाहरी साधनों पर दिल का निर्भर न रहना प्रमुख था।
हिल्यत अल-औलिया व तबक़ात अल-अस्फ़िया, जिल्द १०, पृष्ठ २२९ के अनुसार उन्होंने तवक्कुल का मार्ग अबू अब्दुल्लाह मुहम्मद बिन इस्माईल अल-मग़रिबी से सीखा और वही इस मार्ग में उनके उस्ताद थे। इस प्रकार उनकी आध्यात्मिक शिक्षा आरंभिक सूफ़ी परंपरा की संगति, इबादत, यात्रा, आत्म-संयम और अल्लाह पर भरोसे से जुड़ी हुई दिखाई जाती है।
अर-रिसाला अल-क़ुशैरिय्या, जिल्द १, पृष्ठ ३०३–३०४, उनके व्यावहारिक तवक्कुल का उदाहरण देती है कि वह सफ़र में सुई, धागा, पानी का छोटा बर्तन और कैंची रखते थे। उनका कहना था कि अल्लाह पर भरोसा शरीर ढकने, नमाज़ और पाकी की ज़िम्मेदारी को समाप्त नहीं करता। उसी पुस्तक, जिल्द १, पृष्ठ १०५ में उनसे दिल की पाँच दवाएँ बयान हुई हैं: क़ुरआन को सोच-विचार के साथ पढ़ना, पेट हल्का रखना, रात की नमाज़, सहर के समय विनम्र दुआ और नेक लोगों की संगति।
इब्न अल-जौज़ी ने सिफ़त अल-सफ़वा, जिल्द २, पृष्ठ २९८ में उनकी सेवा का एक प्रसंग दर्ज किया है। वह खजूर के पत्तों से टोकरियाँ बनाकर नदी में डाल देते थे; बाद में उन्हें पता चला कि एक गरीब विधवा अपने पाँच अनाथ बच्चों के लिए उन टोकरियों को निकालकर बेचती थी। स्थिति जानने के बाद उन्होंने उस स्त्री और उसके बच्चों की देखभाल कई वर्षों तक की।
हिल्यत अल-औलिया, जिल्द १०, पृष्ठ ३३० में उनकी करामात के अंतर्गत एक रिवायत है जिसमें वह एक यहूदी यात्री के साथ खुले पानी को पार करके किनारे पहुँचते हैं। उसी रिवायत में असामान्य ढंग से भोजन पहुँचने और उस यात्री के प्रभावित होकर इस्लाम स्वीकार करने का उल्लेख है; इस खबर को उसी पुस्तक में वर्णित आध्यात्मिक रिवायत के रूप में रखा गया है।
ख़ैर अल-नस्साज से हिल्यत अल-औलिया, जिल्द १०, पृष्ठ ३३०–३३१ में एक और रिवायत आती है। उसमें हाजिर नामक स्थान पर तीव्र प्यास, एक सवार द्वारा पानी दिए जाने, थोड़े समय में मदीना दिखाई देने और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम तक रिज़वान का सलाम पहुँचाने की हिदायत का उल्लेख है। इसे भी पुराने सूफ़ी स्रोत में वर्णित करामत के रूप में ही सुरक्षित रखा गया है।
उनकी अंतिम बीमारी और मृत्यु के बारे में नामित पुराने स्रोत रय की जामे मस्जिद का स्पष्ट उल्लेख करते हैं। सिफ़त अल-सफ़वा २९१ हिजरी का कथन देती है और २८४ हिजरी का दूसरा कथन भी सुरक्षित रखती है, जबकि यूसुफ़ बिन अल-हुसैन अल-राज़ी को ग़ुस्ल और दफ़न की ज़िम्मेदारी निभाने वाला बताया गया है। अर-रिसाला अल-क़ुशैरिय्या और सियर अस-सलफ़ अस-सालिहीन भी रय का संदर्भ रखते हैं; इसी कारण बग़दाद के शूनीज़िय्या स्थान को उनकी सिद्ध मूल क़ब्र के बजाय बाद का संबद्ध मक़ाम माना गया है।
हिल्यत अल-औलिया व तबक़ात अल-अस्फ़िया, जिल्द १०, पृष्ठ २२९ के अनुसार उन्होंने तवक्कुल का मार्ग अबू अब्दुल्लाह मुहम्मद बिन इस्माईल अल-मग़रिबी से सीखा और वही इस मार्ग में उनके उस्ताद थे। इस प्रकार उनकी आध्यात्मिक शिक्षा आरंभिक सूफ़ी परंपरा की संगति, इबादत, यात्रा, आत्म-संयम और अल्लाह पर भरोसे से जुड़ी हुई दिखाई जाती है।
अर-रिसाला अल-क़ुशैरिय्या, जिल्द १, पृष्ठ ३०३–३०४, उनके व्यावहारिक तवक्कुल का उदाहरण देती है कि वह सफ़र में सुई, धागा, पानी का छोटा बर्तन और कैंची रखते थे। उनका कहना था कि अल्लाह पर भरोसा शरीर ढकने, नमाज़ और पाकी की ज़िम्मेदारी को समाप्त नहीं करता। उसी पुस्तक, जिल्द १, पृष्ठ १०५ में उनसे दिल की पाँच दवाएँ बयान हुई हैं: क़ुरआन को सोच-विचार के साथ पढ़ना, पेट हल्का रखना, रात की नमाज़, सहर के समय विनम्र दुआ और नेक लोगों की संगति।
इब्न अल-जौज़ी ने सिफ़त अल-सफ़वा, जिल्द २, पृष्ठ २९८ में उनकी सेवा का एक प्रसंग दर्ज किया है। वह खजूर के पत्तों से टोकरियाँ बनाकर नदी में डाल देते थे; बाद में उन्हें पता चला कि एक गरीब विधवा अपने पाँच अनाथ बच्चों के लिए उन टोकरियों को निकालकर बेचती थी। स्थिति जानने के बाद उन्होंने उस स्त्री और उसके बच्चों की देखभाल कई वर्षों तक की।
हिल्यत अल-औलिया, जिल्द १०, पृष्ठ ३३० में उनकी करामात के अंतर्गत एक रिवायत है जिसमें वह एक यहूदी यात्री के साथ खुले पानी को पार करके किनारे पहुँचते हैं। उसी रिवायत में असामान्य ढंग से भोजन पहुँचने और उस यात्री के प्रभावित होकर इस्लाम स्वीकार करने का उल्लेख है; इस खबर को उसी पुस्तक में वर्णित आध्यात्मिक रिवायत के रूप में रखा गया है।
ख़ैर अल-नस्साज से हिल्यत अल-औलिया, जिल्द १०, पृष्ठ ३३०–३३१ में एक और रिवायत आती है। उसमें हाजिर नामक स्थान पर तीव्र प्यास, एक सवार द्वारा पानी दिए जाने, थोड़े समय में मदीना दिखाई देने और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम तक रिज़वान का सलाम पहुँचाने की हिदायत का उल्लेख है। इसे भी पुराने सूफ़ी स्रोत में वर्णित करामत के रूप में ही सुरक्षित रखा गया है।
उनकी अंतिम बीमारी और मृत्यु के बारे में नामित पुराने स्रोत रय की जामे मस्जिद का स्पष्ट उल्लेख करते हैं। सिफ़त अल-सफ़वा २९१ हिजरी का कथन देती है और २८४ हिजरी का दूसरा कथन भी सुरक्षित रखती है, जबकि यूसुफ़ बिन अल-हुसैन अल-राज़ी को ग़ुस्ल और दफ़न की ज़िम्मेदारी निभाने वाला बताया गया है। अर-रिसाला अल-क़ुशैरिय्या और सियर अस-सलफ़ अस-सालिहीन भी रय का संदर्भ रखते हैं; इसी कारण बग़दाद के शूनीज़िय्या स्थान को उनकी सिद्ध मूल क़ब्र के बजाय बाद का संबद्ध मक़ाम माना गया है।
ऐतिहासिक महत्व और विरासत
इब्राहीम अल-ख़व्वास रहमतुल्लाह अलैह का ऐतिहासिक महत्त्व आरंभिक सूफ़ी परंपरा में ऐसे अनुशासित तवक्कुल की प्रतिनिधि शिक्षा से है जिसमें अल्लाह पर भरोसे को इबादत, पाकी, हलाल साधनों और व्यावहारिक ज़िम्मेदारी से अलग नहीं किया गया। पुराने सूफ़ी स्रोत अबू अब्दुल्लाह अल-मग़रिबी को इस मार्ग में उनका उस्ताद बताते हैं और उनकी शिक्षाओं को आरंभिक सूफ़ी विरासत में सुरक्षित रखते हैं।
उनकी जीवनी का नैतिक और सामाजिक पक्ष भी महत्त्वपूर्ण है। सिफ़त अल-सफ़वा एक गरीब विधवा और पाँच अनाथ बच्चों की कई वर्षों तक देखभाल का प्रसंग दर्ज करती है, जबकि अर-रिसाला अल-क़ुशैरिय्या तवक्कुल और दिल की पाँच दवाओं से संबंधित उनकी व्यावहारिक शिक्षा सुरक्षित रखती है।
हिल्यत अल-औलिया समुद्र पार करने और बहुत कम समय में मदीना पहुँचने की रिवायतों को उनकी करामात के अंतर्गत रखती है। इन आध्यात्मिक रिवायतों को दफ़न के सवाल से अलग रखना चाहिए, क्योंकि पुस्तकीय प्रमाण उनकी अंतिम बीमारी, मृत्यु और अंतिम संस्कार की व्यवस्था को रय से जोड़ते हैं और बग़दाद के शूनीज़िय्या स्थान को एक संबद्ध मक़ाम ही रहने देते हैं।
उनकी जीवनी का नैतिक और सामाजिक पक्ष भी महत्त्वपूर्ण है। सिफ़त अल-सफ़वा एक गरीब विधवा और पाँच अनाथ बच्चों की कई वर्षों तक देखभाल का प्रसंग दर्ज करती है, जबकि अर-रिसाला अल-क़ुशैरिय्या तवक्कुल और दिल की पाँच दवाओं से संबंधित उनकी व्यावहारिक शिक्षा सुरक्षित रखती है।
हिल्यत अल-औलिया समुद्र पार करने और बहुत कम समय में मदीना पहुँचने की रिवायतों को उनकी करामात के अंतर्गत रखती है। इन आध्यात्मिक रिवायतों को दफ़न के सवाल से अलग रखना चाहिए, क्योंकि पुस्तकीय प्रमाण उनकी अंतिम बीमारी, मृत्यु और अंतिम संस्कार की व्यवस्था को रय से जोड़ते हैं और बग़दाद के शूनीज़िय्या स्थान को एक संबद्ध मक़ाम ही रहने देते हैं।
पारिवारिक संबंध
स्रोत
صفة الصفوة | ابن الجوزي | ج 2، ص 298–300: خدمة الأرملة والأيتام؛ الوفاة في جحلية الأولياء وطبقات الأصفياء | أبو نعيم الأصبهاني | ج 10، ص 229 و326–331: أبو عبد الله المغربي أستاذه
الرسالة القشيرية | أبو القاسم عبد الكريم القشيري | ج 1، ص 105 و303–304: أدوية القلب الخمسة؛ الإبرة وا
سير السلف الصالحين | قوام السنة إسماعيل بن محمد الأصبهاني | ج 1، ص 1325–1326: مرضه ووفاته في جامع الري وأقواله
طبقات الصوفية | أبو عبد الرحمن السلمي | ترجمة إبراهيم الخواص؛ وفاته في الري سنة 291هـ؛ يخت
المنتظم في تاريخ الملوك والأمم | ابن الجوزي | ترجمة أبي عبد الله المغربي وإبراهيم الخواص؛ يختلف
Additional donor web references (unpaired):
https://ftp.shamela.ws/book/12031/1316
https://shamela.ws/book/12031/1318
https://ftp.shamela.ws/book/10495/3711
https://mail.shamela.ws/book/10495/3812
https://mail.shamela.ws/book/10495/3813
https://www.islamweb.net/ar/library/content/1087/48/%D8%A3%D8%A8%D9%88-%D8%A5%D8%B3%D8%AD%D8%A7%D9%82-%D8%A5%D8%A8%D8%B1%D8%A7%D9%87%D9%8A%D9%85-%D8%A8%D9%86-%D8%A3%D8%AD%D9%85%D8%AF-%D8%A7%D9%84%D8%AE%D9%88%D8%A7%D8%B5
https://www.islamweb.net/ar/library/content/1087/133/%D8%A8%D8%A7%D8%A8-%D8%A7%D9%84%D8%AA%D9%88%D9%83%D9%84
https://www.islamweb.net/ar/library/content/1072/850/%D8%B0%D9%83%D8%B1-%D8%A5%D8%A8%D8%B1%D8%A7%D9%87%D9%8A%D9%85-%D8%A7%D9%84%D8%AE%D9%88%D8%A7%D8%B5
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