हज़रत शैख़-उल-क़ुरआन मौलाना मुहम्मद अब्दुल ग़फ़ूर हज़ारवी रहिमहुल्लाह

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बाद की विस्तृत जीवनी स्पष्ट रूप से उनके पिता का नाम मौलाना अब्दुल हमीद बताती है और विस्तृत वंश-दावे भी प्रस्तुत करती है। पिता का नाम सीधे उल्लेखित होने के कारण सुरक्षित रखा गया है, लेकिन लंबी पितृ और मातृ श्रृंखलाओं को स्वतंत्र रूप से जाँचे गए प्रारंभिक वंश-साक्ष्य के बिना सिद्ध जैविक वंशावली में नहीं बदला गया। माता, जीवनसाथी और संतान के संरचित खाने खाली हैं क्योंकि वे सुरक्षित रूप से स्थापित नहीं हुए।
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हज़रत शैख़-उल-क़ुरआन अबुल-हक़ाइक़ अल्लामा मौलाना मुहम्मद अब्दुल ग़फ़ूर हज़ारवी रहिमहुल्लाह बीसवीं सदी के प्रमुख सुन्नी हनफ़ी आलिम, क़ुरआन के मुफ़स्सिर और शिक्षक, ख़तीब, लेखक तथा धार्मिक और राष्ट्रीय नेता थे। उनका जन्म शुक्रवार 9 ज़ुलहिज्जा 1329 हिजरी, अर्थात 1 दिसंबर 1911 को हज़ारा क्षेत्र के कोट नजीबुल्लाह के निकट चंबा पिंड में मौलाना अब्दुल हमीद रहिमहुल्लाह के घर हुआ। उन्होंने गोलड़ा शरीफ़ में हज़रत पीर सैयद मेहर अली शाह से इल्मी और रूहानी फ़ैज़ पाया, दारुल उलूम मंज़र-ए-इस्लाम बरेली में उच्च धार्मिक शिक्षा प्राप्त की और बाद में गुजरात तथा वज़ीराबाद में शिक्षण और ख़िताबत की व्यापक सेवा की। वज़ीराबाद की जामिया मस्जिद ओवैसिया और जामिया निज़ामिया ओवैसिया उनकी क़ुरआनी शिक्षा का मुख्य केंद्र बनीं। वे पाकिस्तान आंदोलन में मुस्लिम लीग के सक्रिय धार्मिक नेताओं में रहे, मार्च 1940 के ऐतिहासिक लाहौर अधिवेशन में उपस्थित थे और पाकिस्तान बनने के बाद जमीयत उलेमा-ए-पाकिस्तान की केंद्रीय नेतृत्व तक पहुँचे। उनका विसाल शुक्रवार 7 शाबान 1390 हिजरी, अर्थात 9 अक्तूबर 1970 को वज़ीराबाद में हुआ।
जन्म

हज़रत शैख़-उल-क़ुरआन अबुल-हक़ाइक़ अल्लामा मौलाना मुहम्मद अब्दुल ग़फ़ूर हज़ारवी रहिमहुल्लाह का जन्म शुक्रवार की सुबह 9 ज़ुलहिज्जा 1329 हिजरी, अर्थात 1 दिसंबर 1911 को हज़ारा क्षेत्र के कोट नजीबुल्लाह के निकट चंबा पिंड में हुआ। उनके पिता मौलाना अब्दुल हमीद रहिमहुल्लाह थे।

निधन

हज़रत शैख़-उल-क़ुरआन अब्दुल ग़फ़ूर हज़ारवी रहिमहुल्लाह का विसाल शुक्रवार 7 शाबान 1390 हिजरी, अर्थात 9 अक्तूबर 1970 को वज़ीराबाद में हुआ। पारिवारिक गवाही के अनुसार फ़ज्र के बाद लगभग पौने सात बजे विसाल हुआ; अगले दिन शनिवार को लगभग दो बजे जनाज़े की नमाज़ अदा की गई और उसी दिन सूर्यास्त से पहले दफ़्न किया गया।

दफ़न या संबद्ध स्थान

हज़रत शैख़-उल-क़ुरआन मौलाना मुहम्मद अब्दुल ग़फ़ूर हज़ारवी रहिमहुल्लाह मेहराबाद शरीफ़, भट्टीके, वज़ीराबाद में अपने प्रसिद्ध मज़ार में दफ़्न हैं। मज़ार सालाना उर्स, क़ुरआन ख़्वानी और ज़ियारत का केंद्र है और समकालीन धार्मिक रिपोर्टें इसी व्यक्तिगत मज़ार की निरंतर पहचान करती हैं।

जीवनी और ऐतिहासिक परिचय

हज़रत शैख़-उल-क़ुरआन अबुल-हक़ाइक़ अल्लामा मौलाना मुहम्मद अब्दुल ग़फ़ूर हज़ारवी रहिमहुल्लाह का जन्म शुक्रवार की सुबह 9 ज़ुलहिज्जा 1329 हिजरी, अर्थात 1 दिसंबर 1911 को हज़ारा क्षेत्र के कोट नजीबुल्लाह के निकट चंबा पिंड में हुआ। उनके पिता मौलाना अब्दुल हमीद, दादा मौलाना मुहम्मद आलम और परदादा फ़क़ीर ग़ुलाम मुहम्मद थे। सुरक्षित जीवनी और पारिवारिक वंशावली में पितृवंश हज़रत मुहम्मद इब्न अल-हनफ़िय्या रज़ियल्लाहु अन्हु के माध्यम से हज़रत अली कर्रमल्लाहु वज्हह तक और मातृवंश सिद्दीक़ी परिवार के रूप में हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु अन्हु तक बताया गया है। पारिवारिक गवाही के अनुसार उनकी माता मौलाना अब्दुर्रहीम रहिमहुल्लाह की बहन थीं।

उन्होंने क़ुरआन, अरबी, फ़ारसी और दर्स-ए-निज़ामी की प्रारंभिक पुस्तकें पहले अपने पिता मौलाना अब्दुल हमीद रहिमहुल्लाह से पढ़ीं। बाद में मौलाना अहमद दीन, मौलाना मुहिब्बुन्नबी, मौलाना यार मुहम्मद बंदियालवी, मौलाना क़ुत्बुद्दीन ग़ोरग़ुश्तवी, मियाँ अब्दुल हक़ ग़ोरग़ुश्तवी, अल्लामा मुश्ताक़ अहमद कानपुरी और अन्य उस्तादों से शिक्षा ली। पारिवारिक गवाही में अहमद दीन और मुहिब्बुन्नबी के साथ उनकी पढ़ाई को नियमित और लंबी बताया गया है और गोलड़ा शरीफ़ में ठहरकर शिक्षा लेने का भी उल्लेख है। जीवनी स्रोतों में हज़रत पीर सैयद मेहर अली शाह से हम्दुल्लाह और मुल्ला हसन पढ़ने का उल्लेख मिलता है। उच्च हदीसी शिक्षा के लिए वे दारुल उलूम मंज़र-ए-इस्लाम बरेली गए और मौलाना हामिद रज़ा ख़ान रहिमहुल्लाह से पढ़े।

हज़रत पीर सैयद मेहर अली शाह गोलरवी रहिमहुल्लाह उनके उस्ताद भी थे और पीर-ए-तरीक़त भी। पारिवारिक अभिलेख के अनुसार 1926 में अब्दुल ग़फ़ूर हज़ारवी ने उनके हाथ पर बैअत की। गोलड़ा शरीफ़ से यह इल्मी और रूहानी संबंध जीवन भर उनकी धार्मिक शिक्षा, ख़िताबत और तरबियत में प्रभावी रहा।

शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने गुजरात में पीर वली शाह से संबंधित शिक्षण संस्था जामिया शाह विलायत, जो अंजुमन अल-ख़ुद्दाम अल-सूफ़िया से जुड़ी थी, में लगभग पाँच वर्ष पढ़ाया। इसी अवधि में उन्होंने शीशियाँ वाला गेट की जामिया मस्जिद, चौधरी ज़हूरुल्लाह की कोठी के सामने, लगभग पाँच वर्ष जुमे की ख़िताबत भी की। यह समय उनकी शिक्षण और सार्वजनिक ख़िताबत की मज़बूत नींव बना।

लगभग 1935–36 में वज़ीराबाद उनकी स्थायी धार्मिक गतिविधियों का केंद्र बन गया। रेलवे स्टेशन के निकट जामिया मस्जिद ओवैसिया में उन्होंने शिक्षण, ख़िताबत और धार्मिक शिक्षा जारी रखी और उसी शैक्षिक वातावरण में जामिया निज़ामिया ओवैसिया में दर्स-ए-निज़ामी तथा दौरा-ए-तफ़सीर-ए-क़ुरआन की नियमित कक्षाएँ होती थीं। मस्जिद, मदरसा और क़ुरआन के पाठ कई दशकों तक उनकी इल्मी सेवा का केंद्र रहे।

क़ुरआन की शिक्षा उनके इल्मी जीवन की सबसे प्रमुख पहचान थी। अलग-अलग क्षेत्रों से आलिम और विद्यार्थी उनके दौरा-ए-तफ़सीर में भाग लेते थे और इसी दीर्घ क़ुरआनी सेवा ने शैख़-उल-क़ुरआन की उपाधि को उनकी स्थायी सार्वजनिक और विद्वत पहचान बना दिया। उनके अनेक शागिर्दों ने बाद में पाकिस्तान और विदेशों के मदरसों, मस्जिदों और इल्मी केंद्रों में शिक्षण और ख़िताबत की सेवाएँ दीं।

उन्होंने 1930 के दशक में धार्मिक और राजनीतिक संगठन में भी सक्रिय भूमिका निभाई। पारिवारिक और जीवनी अभिलेख उन्हें नीली पोश आंदोलन और मदरसा तालीम-उल-मिल्लत से जोड़ते हैं, जिसके बाद वे मुस्लिम लीग के साथ सक्रिय रूप से जुड़े। मार्च 1940 में लाहौर के मिंटो पार्क में हुए ऐतिहासिक मुस्लिम लीग अधिवेशन में उनकी उपस्थिति अभिलेखीय तस्वीरों से स्थापित है और उन्हें लाहौर प्रस्ताव के प्रमुख धार्मिक समर्थकों में गिना गया। 1941 में वज़ीराबाद की पाकिस्तान कॉन्फ़्रेंस भी पाकिस्तान आंदोलन में उनकी गतिविधि का महत्वपूर्ण प्रसंग थी।

पाकिस्तान आंदोलन के दौरान उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में सार्वजनिक सभाओं को संबोधित किया और मुस्लिम लीग के पक्ष में धार्मिक और राजनीतिक समर्थन संगठित किया। मौलाना ज़फ़र अली ख़ान के साथ एक प्रसिद्ध सभा की जीवनी परंपरा उनकी प्रभावशाली ख़िताबत और ज़फ़र अली ख़ान द्वारा उनकी काव्यात्मक प्रशंसा को सुरक्षित रखती है। सविनय अवज्ञा के दौर में वे गिरफ़्तार भी हुए और कुछ समय गुजराँवाला जेल में रहे।

पाकिस्तान बनने के बाद वे जमीयत उलेमा-ए-पाकिस्तान की धार्मिक और राजनीतिक गतिविधियों में केंद्रीय भूमिका निभाते रहे। 1968 में संगठन की पुनर्व्यवस्था और सुधार के लिए देशव्यापी दौरों में उन्होंने अन्य वरिष्ठ आलिमों के साथ भाग लिया। लाहौर की जामिया नईमिया में हुए महत्वपूर्ण अधिवेशन में उन्हें पहले प्रांतीय अध्यक्ष और बाद में केंद्रीय अध्यक्ष चुना गया, और जीवन के अंतिम वर्षों में वे राष्ट्रीय स्तर पर सुन्नी धार्मिक राजनीति के प्रमुख प्रतिनिधियों में थे।

उनकी इल्मी रचनाओं में मनाक़िब अल-जलीला, सिराज मुनीर, शहीद-ए-कर्बला, तफ़सीर अल-करीम और अनेक छोटे रिसाले शामिल हैं, जिन्हें बाद में रसाइल-ए-शैख़-उल-क़ुरआन के नाम से सुरक्षित और प्रकाशित किया गया। प्रोफ़ेसर डॉक्टर पीर मुहम्मद आसिफ़ हज़ारवी ने उनके जीवन और सेवाओं पर विस्तृत जीवनी फ़ैज़ान-ए-शैख़-उल-क़ुरआन तैयार की; उपलब्ध डिजिटलकृत प्रति 1170 पृष्ठों की है और मकतबा बज़्म चिश्तिया ग़फ़ूरिया, वज़ीराबाद से संबद्ध है।

हज़रत शैख़-उल-क़ुरआन अब्दुल ग़फ़ूर हज़ारवी रहिमहुल्लाह का विसाल शुक्रवार 7 शाबान 1390 हिजरी, अर्थात 9 अक्तूबर 1970 को वज़ीराबाद में फ़ज्र के बाद लगभग पौने सात बजे हुआ, जैसा कि पारिवारिक गवाही में दर्ज है। अगले दिन शनिवार को लगभग दो बजे जनाज़े की नमाज़ हुई और उसी दिन सूर्यास्त से पहले दफ़्न किया गया। मेहराबाद शरीफ़, भट्टीके, वज़ीराबाद में उनका मज़ार प्रसिद्ध ज़ियारत केंद्र है, जहाँ सालाना उर्स, क़ुरआन ख़्वानी और धार्मिक सभाएँ उनकी इल्मी और रूहानी स्मृति को जीवित रखती हैं।

ऐतिहासिक महत्व और विरासत

अब्दुल ग़फ़ूर हज़ारवी रहिमहुल्लाह की सबसे प्रमुख ऐतिहासिक सेवा क़ुरआन की शिक्षा और तफ़सीर थी। वज़ीराबाद में उनके दौरा-ए-तफ़सीर, दर्स-ए-निज़ामी और निरंतर क़ुरआनी शिक्षण ने आलिमों की एक व्यापक पीढ़ी तैयार की और शैख़-उल-क़ुरआन की उपाधि इसी सेवा की स्थायी पहचान बनी।

हज़ारा, गोलड़ा शरीफ़, बरेली, गुजरात और वज़ीराबाद से जुड़ी उनकी इल्मी यात्रा बीसवीं सदी के सुन्नी हनफ़ी शैक्षिक नेटवर्क का महत्वपूर्ण उदाहरण है। जामिया मस्जिद ओवैसिया और जामिया निज़ामिया ओवैसिया उनके समय में शिक्षण, ख़िताबत और धार्मिक तरबियत का संयुक्त केंद्र बनीं।

पाकिस्तान आंदोलन में उनकी भागीदारी उन्हें देश के राजनीतिक इतिहास से भी जोड़ती है। मार्च 1940 के लाहौर अधिवेशन में उनकी अभिलेखीय उपस्थिति, मुस्लिम लीग के लिए सार्वजनिक कार्य, वज़ीराबाद पाकिस्तान कॉन्फ़्रेंस और बाद में जमीयत उलेमा-ए-पाकिस्तान की केंद्रीय नेतृत्व उनकी राष्ट्रीय सेवाओं के प्रमुख अध्याय हैं।

उनकी रचनाएँ, रिसाले, शागिर्द और मेहराबाद शरीफ़ वज़ीराबाद में स्थित मज़ार उनकी इल्मी और रूहानी विरासत को बाद की पीढ़ियों तक ले गए। विस्तृत जीवनी फ़ैज़ान-ए-शैख़-उल-क़ुरआन ने उनके परिवार, शिक्षा, राजनीतिक गतिविधि और धार्मिक सेवाओं का इतिहास व्यापक दस्तावेज़ी रूप में सुरक्षित किया।

पारिवारिक संबंध

स्रोत

प्रत्यक्ष पारिवारिक ध्वनि-गवाही और मज़ार की तख़्ती | शैख़-उल-क़ुरआन का परिवार | 2026-09-01 | जन्म, विसाल, जनाज़ा और दफ़्न, मातृ पारिवारिक संबंध, 1926 की बैअत, गुजरात और वज़ीराबाद की शिक्षण जानकारी तथा पारिवारिक रचना-सूची
अल्लामा मौलाना अब्दुल ग़फ़ूर हज़ारवी | स्कॉलर्स पाकिस्तान | नाम और वंश, पिता मौलाना अब्दुल हमीद, पितृ और मातृ वंश, जन्म, उस्ताद, पीर मेहर अली शाह से संबंध, पाकिस्तान आंदोलन और विसाल | https://www.scholars.pk/ur/scholar/hazrat-allama-molana-abdul-ghafoor-hazarvi
पाकिस्तान की सुबह | डॉन अभिलेखागार | मार्च 1940 के लाहौर अधिवेशन की अभिलेखीय तस्वीर और लाहौर प्रस्ताव के प्रमुख समर्थकों में मौलाना अब्दुल ग़फ़ूर हज़ारवी की पहचान | https://www.dawn.com/news/1340676
अल्लामा मुफ़्ती मुहम्मद अब्दुल क़य्यूम हज़ारवी | स्कॉलर्स पाकिस्तान | 1968 में जमीयत उलेमा-ए-पाकिस्तान की पुनर्व्यवस्था, जामिया नईमिया अधिवेशन और अब्दुल ग़फ़ूर हज़ारवी का प्रांतीय तथा फिर केंद्रीय अध्यक्ष चुना जाना | https://www.scholars.pk/ur/scholar/hazrat-allama-molana-mufti-abdul-qayyum-hazarvi
फ़ैज़ान-ए-शैख़-उल-क़ुरआन | प्रोफ़ेसर डॉक्टर पीर मुहम्मद आसिफ़ हज़ारवी | 1170 पृष्ठ, मकतबा बज़्म चिश्तिया ग़फ़ूरिया वज़ीराबाद; डिजिटलकृत प्रति का ग्रंथसूची अभिलेख | https://www.scribd.com/doc/104937040/Faizan-e-Shaikh-ul-Quran-by-Profesor-Doctor-Muhammad-Asif-Hzerve
मौलाना मुहम्मद अब्दुल ग़फ़ूर हज़ारवी की धार्मिक और राष्ट्रीय सेवाएँ | मुहम्मद आसिफ़ हज़ारवी | परास्नातक शोधप्रबंध, पंजाब विश्वविद्यालय, पाठ्यक्रम आरंभ 1986 | https://thesis.asianindexing.com/thesis.php?ari_id=1676730565243
वज़ीराबाद में सालाना उर्स पर क़ुरआन ख़्वानी | दावत-ए-इस्लामी | 28 फ़रवरी 2023; शैख़-उल-क़ुरआन मौलाना अब्दुल ग़फ़ूर हज़ारवी के व्यक्तिगत मज़ार और पीर मुहम्मद आरिफ़ हज़ारवी की उपस्थिति की पहचान | https://news.dawateislami.net/wazirabad-mazar-shareef-quran-khani
मेहराबाद शरीफ़, भट्टीके में अब्दुल ग़फ़ूर हज़ारवी का मज़ार | दैनिक ख़बरें | 29 जनवरी 2018 | मज़ार की स्थानीय पहचान | https://dailykhabrain.com.pk/2018/01/29/94092/
शहीद-ए-कर्बला | मौलाना अब्दुल ग़फ़ूर हज़ारवी | मुहर्रम रिसालों की पुस्तक-सूची में लेखकीय निस्बत | https://urdumehfil.net/%D9%85%D8%A7%DB%81-%D9%88-%D8%B3%D8%A7%D9%84-months-and-years/

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