शैख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी और शैशव में रमज़ान की उल्लेखनीय निशानी

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बहजत अल-असरार में शैख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी की माता उम्म अल-ख़ैर फ़ातिमा से मंसूब एक रिवायत सुरक्षित है कि शैशव अवस्था में वे रमज़ान के दिन के समय दूध नहीं पीते थे। रिवायत यह भी बताती है कि एक दिन चाँद दिखाई न देने के कारण लोगों को रमज़ान शुरू होने में संदेह था, तो दिन में उनका दूध न पीना स्थानीय लोगों ने एक निशानी माना और बाद में वह दिन रमज़ान का ही माना गया।

शैख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी की प्रारंभिक जीवन-परंपरा में रमज़ान से जुड़ा एक उल्लेखनीय प्रसंग सुरक्षित है। बहजत अल-असरार इस रिवायत को उनकी माता उम्म अल-ख़ैर फ़ातिमा से मंसूब करता है और इसे नामित रावियों की एक श्रृंखला के माध्यम से बयान करता है।

रिवायत के अनुसार अब्दुल क़ादिर अभी दूध पीने वाले शिशु थे, तभी उनकी माता ने रमज़ान के दिनों में एक असामान्य बात देखी। दिन के समय वे दूध नहीं पीते थे, जबकि रात आने के बाद फिर सामान्य रूप से दूध पी लेते थे। बार-बार ऐसा होने से घर वालों के लिए यह अवस्था रमज़ान के रोज़े के समय से जुड़ी एक विशेष निशानी बन गई।

इसके बाद रिवायत एक विशेष दिन का वर्णन करती है। उस दिन नया चाँद स्पष्ट दिखाई नहीं दिया था और लोगों में यह संदेह था कि रमज़ान शुरू हो चुका है या नहीं। ऐसी स्थिति में कोई स्पष्ट बाहरी संकेत तुरंत सबके सामने निर्णय नहीं कर पा रहा था। घर में शिशु अब्दुल क़ादिर पर ध्यान गया तो वही जानी-पहचानी अवस्था दिखाई दी: दिन था और वे अपनी माता का दूध नहीं पी रहे थे।

यह बात लोगों तक पहुँची और स्थानीय रूप से उनके इस व्यवहार को रमज़ान शुरू होने की निशानी माना गया। बाद में वह दिन रमज़ान का ही दिन माना गया। इस तरह क़ादिरी मनाक़िब परंपरा में यह घटना केवल किसी शिशु की असामान्य आदत के रूप में नहीं रही, बल्कि शैख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी के बचपन से जुड़ी रमज़ान की एक प्रारंभिक निशानी के रूप में याद की गई।

घटना का क्रम बहुत स्पष्ट है: माता के अनुसार रमज़ान के दिन दूध न पीने वाला एक शिशु; फिर ऐसा दिन जब चाँद छिपा होने के कारण महीने के आरंभ पर संदेह हो; उसी दिन फिर दूध न पीना; और आसपास के लोगों का इस स्थिति को रमज़ान की निशानी के रूप में लेना।

यह रिवायत बहजत अल-असरार, पृष्ठ 116, में एक बाद की मनाक़िब संप्रेषण-श्रृंखला के साथ सुरक्षित है, जो अंततः उम्म अल-ख़ैर फ़ातिमा से मंसूब कथनों तक पहुँचती है। इसलिए इसे उसी रूप में प्रस्तुत करना उचित है जिस रूप में स्रोत इसे सुरक्षित करता है: शैख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी के शैशव से संबंधित एक उल्लेखनीय रमज़ानी निशानी की क़ादिरी मनाक़िब रिवायत।

निष्कर्ष

इसे सावधानी के साथ क़ादिरी मनाक़िब रिवायत के रूप में प्रकाशित किया जा सकता है कि शैख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी शैशव में रमज़ान के दिन दूध नहीं पीते थे और चाँद छिपे होने वाले एक दिन यही व्यवहार स्थानीय लोगों ने रमज़ान की निशानी माना।

स्रोत

Bahjat al-Asrar wa Ma‘din al-Anwar, p.116; later reproduced chain: Abu Ali Ishaq al-Hamadani <- Muhammad b. Abd al-Latif al-Suhrawardi <- Ahmad b. As‘ad al-Muqri <- Abu Sa‘d Abd Allah b. Sulayman b. Ja‘ran and Umm Ahmad al-Jiliyya, reporting repeated statements of Umm al-Khayr Fatima.
Ibn Rajab, Dhayl Tabaqat al-Hanabila, 2/194–195: source-level warning concerning al-Shattanufi’s Bahjat al-Asrar and reliance on its reports unless known independently.
Ibn Hajar, al-Durar al-Kamina, biography of al-Shattanufi: the book contained unusual narratives and people criticized many of its stories and isnads.