शास्त्रीय मिस्री स्रोतों में एक रिवायत मिलती है कि अम्र इब्न अल-आस रज़ियल्लाहु अन्हु के शासन के समय लोगों ने नील की वार्षिक बढ़ोतरी से जुड़ी एक पुरानी प्रथा बताई। क़िब्ती महीने बऊना की बारह रातें बीतने के बाद वे अपने माता-पिता के पास रहने वाली एक कुँवारी लड़की को चुनते, माता-पिता को राज़ी करते, उसे अच्छे वस्त्र और गहने पहनाते और फिर नील में डाल देते। अम्र रज़ियल्लाहु अन्हु ने यह रस्म बंद कर दी। जब नदी अपेक्षित समय पर न बढ़ी तो उन्होंने उमर इब्न अल-ख़त्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु को लिखा। उमर ने एक पत्र भेजा जिसमें कहा गया कि नदी केवल अल्लाह के आदेश से बहती है। रिवायत के अनुसार पत्र नील में रखने के बाद पानी बढ़ गया। बची हुई सनद कमज़ोर और मुनक़ति है, इसलिए इसे निश्चित इतिहास के बजाय सावधानी से शास्त्रीय करामत की रिवायत के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
अम्र इब्न अल-आस रज़ियल्लाहु अन्हु ने इस प्रथा को स्पष्ट रूप से अस्वीकार कर दिया और कहा कि इस्लाम ऐसी जाहिली रस्मों को जारी नहीं रखता। लोगों ने यह प्रथा छोड़ दी। रिवायत के अनुसार इसके बाद नील अपेक्षित समय पर नहीं बढ़ा और हालात इतने कठिन होने लगे कि कुछ लोग इलाक़ा छोड़ने के बारे में सोचने लगे, क्योंकि मिस्र की खेती और सामान्य जीवन नदी के पानी पर निर्भर था।
अम्र रज़ियल्लाहु अन्हु ने पूरा मामला उमर इब्न अल-ख़त्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु को लिखा। उमर ने उत्तर दिया कि पुरानी रस्म को समाप्त करना सही था, क्योंकि इस्लाम ऐसे कामों को मिटाता है। साथ ही उन्होंने एक छोटा लिखित पत्र भेजा जिसे नील में रखने को कहा। रिवायत में पत्र का अर्थ यह है कि यदि नील अपनी शक्ति से बहता है तो न बहे, और यदि अल्लाह, जो एक और प्रभुत्वशाली है, उसे बहाता है तो अल्लाह से दुआ है कि वह उसे बहाए।
रिवायत बताती है कि अम्र रज़ियल्लाहु अन्हु ने वह पत्र नील में रख दिया। अगली सुबह पानी के सोलह ज़िरा बढ़ने का उल्लेख मिलता है और इसके बाद लोग पुरानी रस्म की ओर नहीं लौटे। कहानी का मुख्य अर्थ पत्र को स्वतंत्र शक्ति देना नहीं है, बल्कि मानव-बलि की प्रथा को समाप्त करना और यह बताना है कि नदी का बहाव केवल अल्लाह के आदेश में है।
यह रिवायत इब्न अब्द अल-हकम के यहाँ सुरक्षित है और अल-लालकाई तथा अबू अल-शैख़ अल-असबहानी ने भी उसी मूल रिवायती परिवार से इसे نقل किया है। बची हुई सनद इब्न लहीआ से क़ैस इब्न अल-हज्जाज और फिर एक अज्ञात माध्यम तक पहुँचती है, इसलिए इसे सहीह और जुड़ी हुई सनद नहीं कहा जा सकता। सबसे उचित प्रस्तुति यह है कि इसे उमर रज़ियल्लाहु अन्हु से जुड़ी प्रसिद्ध शास्त्रीय रिवायत के रूप में बताया जाए, सनद की सीमा स्पष्ट रखी जाए और आधुनिक माप या वैज्ञानिक कारण न जोड़े जाएँ।
निष्कर्ष
यह रिवायत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु और अम्र इब्न अल-आस रज़ियल्लाहु अन्हु के माध्यम से नील से जुड़ी एक पुरानी मानव-बलि रस्म के अंत और नदी के बहाव को केवल अल्लाह के आदेश से जोड़ने का वर्णन करती है। इसे सनद की सावधानी के साथ शास्त्रीय करामत की रिवायत के रूप में प्रस्तुत करना उचित है।