उमर इब्न अल-ख़त्ताब

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हज़रत उमर इब्न अल-ख़त्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु नबी के प्रमुख सहाबियों, दूसरे ख़लीफ़ा-ए-राशिद और शुरुआती इस्लामी इतिहास की प्रभावशाली प्रशासनिक तथा न्यायिक हस्तियों में से थे। उनका जीवन मक्का में प्रारंभिक विरोध से इस्लाम स्वीकार करने, मदीना में सेवा, बड़े अभियानों में भाग लेने, हज़रत अबू बक्र रज़ियल्लाहु अन्हु के दौर में वरिष्ठ सलाह और फिर तेज़ी से फैलते राज्य के नेतृत्व तक पहुँचा। सहीह हदीसें उनके ईमान, अंतर्दृष्टि, साहस, मशवरे और नबी से निकट संबंध के अनेक पहलू सुरक्षित रखती हैं। घातक हमले के बाद उन्हें हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा की दोबारा अनुमति से हुजरा-ए-मुबारक के भीतर नबी और हज़रत अबू बक्र रज़ियल्लाहु अन्हु के पास दफ़्न किया गया।
जन्म

पुराने जीवनीकार हज़रत उमर इब्न अल-ख़त्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु का जन्म मक्का में आमुल-फ़ील के लगभग तेरह वर्ष बाद, करीब ५८४ ईस्वी, रखते हैं। यह ईस्वी तारीख़ जीवनी परंपरा का अनुमान है।

निधन

हज़रत उमर इब्न अल-ख़त्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु को ज़िलहिज्जा २३ हिजरी के अंतिम दिनों में फ़ज्र की नमाज़ के दौरान घातक रूप से घायल किया गया और उनका निधन २३ तथा २४ हिजरी की कैलेंडर सीमा के आसपास हुआ। सहीह अल-बुख़ारी हमला, अंतिम निर्देश, छह-सदस्यीय शूरा और दफ़न की अनुमति का मूल विवरण सुरक्षित रखती है; कुछ ईस्वी रूपांतरण और आयु संबंधी रिवायतें अलग हैं।

दफ़न या संबद्ध स्थान

सहीह अल-बुख़ारी के अनुसार अंतिम बीमारी में हज़रत उमर इब्न अल-ख़त्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु ने हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा से अनुमति माँगी कि उन्हें नबी और हज़रत अबू बक्र रज़ियल्लाहु अन्हु के पास दफ़्न किया जाए। हज़रत आयशा ने वह जगह उन्हें दे दी जो उन्होंने अपने लिए रखी थी, और हज़रत उमर ने कहा कि मृत्यु के बाद अनुमति फिर माँगी जाए। दोबारा अनुमति मिलने के बाद उन्हें हुजरा-ए-मुबारक के भीतर दफ़्न किया गया। हुजरा-ए-मुबारक मस्जिद-ए-नबवी के भीतर बंद और संरक्षित आंतरिक स्थान है। दिए गए नक्शा-निर्देशांक पवित्र परिसर के लिए स्थान-संदर्भ हैं, हज़रत उमर की अलग दिखाई देने वाली क़ब्र के व्यक्तिगत निर्देशांक नहीं। पुरानी रिवायतें तीनों क़ब्रों की सटीक भीतरी व्यवस्था के कुछ विवरणों में अलग हैं।

जीवनी और ऐतिहासिक परिचय

हज़रत उमर इब्न अल-ख़त्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु का नसब क़ुरैश के बनू अदी तक सुरक्षित है। उनकी कुनियत अबू हफ़्स और सबसे प्रसिद्ध उपाधि अल-फ़ारूक़ थी, यद्यपि इसके सबसे पुराने प्रयोग के बारे में रिवायतें अलग हैं। उनके पिता अल-ख़त्ताब इब्न नुफ़ैल थे और माता को सामान्यतः हंतमा बिन्त हिशाम इब्न अल-मुग़ीरा अल-मख़ज़ूमिया कहा जाता है। पुराने जीवनीकार उनका जन्म मक्का में आमुल-फ़ील के लगभग तेरह वर्ष बाद, करीब ५८४ ईस्वी, रखते हैं। इस्लाम से पहले वे पढ़ना-लिखना जानते थे, व्यापार और यात्रा का अनुभव रखते थे और स्पष्ट बोलने वाले शक्तिशाली व्यक्ति के रूप में याद किए गए। उन्होंने शुरुआत में इस्लाम का विरोध किया। उनके इस्लाम स्वीकार करने की प्रसिद्ध कथा बहन फ़ातिमा बिन्त अल-ख़त्ताब और बहनोई सईद इब्न ज़ैद के घर क़ुरआनी आयतें सुनने या पढ़ने से जुड़ी है; इसे विशेष रूप से सूरह ताहा की शुरुआती आयतों से जोड़ना आरंभिक सीरत की रिवायत है और प्रमाण की दृष्टि से सहीह संग्रहों के बराबर नहीं रखा जाना चाहिए।

इस्लाम स्वीकार करने के बाद उनकी शक्ति मुस्लिम समुदाय की सेवा में दिखाई देने लगी। सहीह अल-बुख़ारी में अब्दुल्लाह इब्न मसऊद से यह कथन सुरक्षित है कि उमर के इस्लाम लाने के बाद मुसलमानों को शक्ति मिली। वे मदीना हिजरत कर नई जमाअत का हिस्सा बने और उनकी बेटी हज़रत हफ़्सा रज़ियल्लाहु अन्हा के नबी से निकाह के कारण पारिवारिक संबंध भी बना। पुराने स्रोत उन्हें बद्र, उहुद, ख़ंदक़, हुदैबिया, ख़ैबर, मक्का की विजय, हुनैन और तबूक में उपस्थित बताते हैं। बद्र के क़ैदियों पर उनकी सलाह, हुदैबिया में तीखे प्रश्न और वे सहीह रिवायतें जिनमें बाद की वह्य कुछ मामलों में उनकी राय के अनुकूल आई, दृढ़ता के साथ आत्म-समीक्षा और वह्य के सामने झुकने को दिखाती हैं। दूसरी रिवायतें मक़ाम-ए-इब्राहीम, पर्दे, दीन की शक्ति, अंतर्दृष्टि और शैतान के उनके रास्ते से हटने का उल्लेख करती हैं।

नबी के निधन पर हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु गहरे सदमे में थे, फिर हज़रत अबू बक्र रज़ियल्लाहु अन्हु ने सूरह आल-इमरान की आयत १४४ पढ़ी और उन्होंने मृत्यु की वास्तविकता स्वीकार की। इसके बाद सक़ीफ़ा में हज़रत अबू बक्र की बैअत के समर्थन में उनका बड़ा योगदान रहा और वे वरिष्ठ सलाहकार बने। यमामा के बाद सहीह रिवायत क़ुरआन की अलग-अलग लिखित सामग्री को एक जगह एकत्र करने का प्रस्ताव हज़रत उमर से जोड़ती है। १३ हिजरी में ख़िलाफ़त संभालने के बाद तेज़ क्षेत्रीय विस्तार के साथ प्रशासनिक ढाँचा विकसित हुआ। शाम, इराक़, मिस्र और फ़ारस के बड़े हिस्से मुस्लिम शासन में आए। उनके शासन से हिजरी कैलेंडर, वज़ीफ़ों के दफ़्तर, सार्वजनिक ख़ज़ाना, न्यायिक नियुक्तियाँ, प्रांतीय पत्राचार और कृषि भूमि की वित्तीय नीति से जुड़ी महत्वपूर्ण रिवायतें मिलती हैं। आमुर-रमादा में राहत-व्यवस्था और अमवास की महामारी के समय सरग़ में मशवरे के बाद प्रभावित क्षेत्र में प्रवेश न करने का निर्णय उनके प्रशासन के सामाजिक और सावधान पक्ष को दिखाता है।

वंशावली स्रोत अनेक पत्नियों और बच्चों के नाम सुरक्षित रखते हैं। ज़ैनब बिन्त मज़ऊन को अब्दुल्लाह, हफ़्सा और अब्दुर्रहमान अल-अकबर की माता बताया जाता है, जबकि जमीला बिन्त साबित को आसिम से जोड़ा जाता है; दूसरी शादियों और मातृ-नसब में मतभेद हैं। सुन्नी वंशावली पुस्तकों में उम्म कुलसूम बिन्त अली से निकाह की रिवायत भी मिलती है, जबकि इमामी परंपरा में उसके कुछ पहलुओं पर आपत्ति है; इसलिए इसे विवादित वंशावली रिवायत के रूप में रखना उचित है। ज़िलहिज्जा २३ हिजरी के अंतिम दिनों में अबू लुलुआ ने फ़ज्र की नमाज़ के दौरान हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु को घायल किया। सहीह अल-बुख़ारी उनके क़र्ज़, समुदाय के अधिकार, छह-सदस्यीय शूरा और उत्तराधिकार संबंधी निर्देश सुरक्षित रखती है। अंतिम बीमारी में उन्होंने हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा से नबी और हज़रत अबू बक्र रज़ियल्लाहु अन्हु के पास दफ़्न होने की अनुमति माँगी और मृत्यु के बाद दोबारा अनुमति मिलने पर उन्हें हुजरा-ए-मुबारक के भीतर दफ़्न किया गया।

ऐतिहासिक महत्व और विरासत

नबवी दौर में हज़रत उमर इब्न अल-ख़त्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु का महत्त्व प्रारंभिक विरोध के अनुशासित सेवा, मशवरे और समुदाय की रक्षा में बदलने से दिखाई देता है। बड़े अभियानों में उनकी उपस्थिति, बद्र और हुदैबिया में सलाह, हज़रत हफ़्सा रज़ियल्लाहु अन्हा के माध्यम से नबी से पारिवारिक संबंध और ईमान तथा अंतर्दृष्टि पर मज़बूत रिवायतें उन्हें शुरुआती मुस्लिम समुदाय की केंद्रीय हस्तियों में रखती हैं।

नबी के निधन के बाद सत्ता-परिवर्तन में उनका योगदान और यमामा के बाद क़ुरआन की लिखित सामग्री को एक जगह एकत्र करने का प्रस्ताव दूरगामी सिद्ध हुआ। ख़िलाफ़त में मशवरा, वित्त, नियुक्ति, न्याय, प्रांतीय प्रशासन, हिजरी कैलेंडर, दफ़्तर और सार्वजनिक ख़ज़ाने से जुड़ी व्यवस्थाएँ बाद की मुस्लिम राजनीतिक और क़ानूनी चर्चा में महत्वपूर्ण संदर्भ बनीं।

उनके शासन की विजयों ने शाम, इराक़, मिस्र और फ़ारस की राजनीतिक भूगोल को बदला, लेकिन महत्त्व केवल क्षेत्रीय विस्तार में नहीं है। कृषि भूमि, कर, वज़ीफ़े, सेनापतियों की निगरानी, नए नगरों और संकट-प्रबंधन से जुड़ी नीतियाँ बड़े और विविध राज्य के व्यावहारिक प्रश्नों को दिखाती हैं।

उनकी शहादत, छह-सदस्यीय उत्तराधिकार शूरा और हुजरा-ए-मुबारक के भीतर दफ़न ने उनकी स्मृति को ख़िलाफ़त और नबवी संगति दोनों से गहराई से जोड़ दिया। मूल दफ़न-स्थान मज़बूत ऐतिहासिक आधार रखता है, लेकिन हुजरा बंद और संरक्षित आंतरिक स्थान है; इसलिए क़ब्रों की सटीक भीतरी व्यवस्था या किसी व्यक्तिगत नक्शा-बिंदु को प्रत्यक्ष रूप से देखी हुई ऐतिहासिक सच्चाई नहीं कहा जाना चाहिए।

पारिवारिक संबंध

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