लालकाई ने हज़रत अली इब्न अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु की करामात के प्रसंग में एक रिवायत सुरक्षित की है जिसमें एक व्यक्ति ने उनके सामने किसी हदीस या कथन पर विवाद किया। हज़रत अली ने कहा कि उन्हें लगता है कि उस व्यक्ति ने झूठ कहा है और पूछा कि यदि वह झूठा हो तो क्या वे उसके विरुद्ध अल्लाह से दुआ करें। उस व्यक्ति ने दुआ करने को कहा, हज़रत अली ने दुआ की, और रिवायत कहती है कि सभा से जाने से पहले उसकी दृष्टि चली गई। इब्न अबी दुनिया, तबरानी और अहमद की फ़ज़ाइल अस्सहाबा में भी इसी मूल घटना के रूप सुरक्षित हैं।
लालकाई ने हज़रत अली इब्न अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु की करामात से संबंधित रिवायतों में एक प्रभावशाली घटना सुरक्षित की है। प्रसंग एक ऐसे व्यक्ति से शुरू होता है जो हज़रत अली के सामने किसी हदीस या कथन को बयान करता है या उस पर विवाद करता है। बातचीत तब गंभीर हो जाती है जब हज़रत अली उससे कहते हैं कि उन्हें ऐसा प्रतीत होता है कि उसने सत्य नहीं कहा। वह व्यक्ति अपनी बात से पीछे नहीं हटता और रिवायत दुआ से जुड़ी एक चुनौती की ओर बढ़ती है।
हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु उस व्यक्ति से पूछते हैं कि यदि उसने झूठ कहा है तो क्या वे उसके विरुद्ध अल्लाह से दुआ करें। रिवायत के अनुसार वह व्यक्ति इस बात को स्वीकार करता है और उनसे दुआ करने को कहता है। मूल वर्णन में दुआ के कोई निश्चित शब्द सुरक्षित नहीं हैं, इसलिए कहानी में अपनी ओर से कोई विशेष दुआ नहीं जोड़ी जाती। इसके बाद हज़रत अली उस व्यक्ति के दावे की सच्चाई के संबंध में अल्लाह से दुआ करते हैं।
दुआ के तुरंत बाद रिवायत का असाधारण भाग सामने आता है। वर्णन में कहा गया है कि वह व्यक्ति सभा से निकल भी नहीं पाया था कि उसकी दृष्टि चली गई। पुराने स्रोतों में घटना की कड़ी सीधी है: विवादित कथन, हज़रत अली का यह कहना कि उसने झूठ कहा है, उस व्यक्ति का दुआ की चुनौती स्वीकार करना, हज़रत अली की दुआ, और फिर उसके जाने से पहले अंधा हो जाने का उल्लेख।
इब्न अबी दुनिया ने मजाबुद्दावा में इसी मूल घटना को सुरक्षित किया है। तबरानी ने इसे अलमुअजम अलऔसत में बयान किया, और इमाम अहमद की फ़ज़ाइल अस्सहाबा में भी इससे संबंधित एक रूप मिलता है जिसमें रहबा का उल्लेख आता है। इन वर्णनों के कुछ शब्द और विवरण अलग हैं, लेकिन मुख्य घटना एक ही रहती है: विवाद या इनकार, दुआ की चुनौती स्वीकार करना, और उसके बाद दृष्टि चले जाने की रिवायत।
लालकाई का वर्णन संक्षिप्त है। उसमें दुआ के कोई लंबे निश्चित शब्द, दृष्टि चले जाने की प्रक्रिया या उस व्यक्ति के बाद के जीवन का विवरण नहीं दिया गया। रिवायत सभा की बातचीत, व्यक्ति के कथन की सच्चाई से जुड़ी दुआ की चुनौती, हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु की दुआ और उसके तुरंत बाद बताए गए परिणाम तक रहती है। इसी सीमा में घटना उसी रूप में रहती है जैसा स्रोत ने उसे सुरक्षित किया है।
कहानी इसी परिणाम पर समाप्त होती है। एक व्यक्ति हज़रत अली इब्न अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु के सामने अपने विवादित कथन पर कायम रहा; हज़रत अली ने कहा कि यदि उसने झूठ कहा है तो वे उसके विरुद्ध दुआ करें; उसने स्वीकार किया; हज़रत अली ने अल्लाह से दुआ की; और रिवायत के अनुसार सभा से जाने से पहले उसकी दृष्टि चली गई। यही स्पष्ट क्रम पुराने स्रोतों में इस करामत के रूप में याद रखा गया है।
हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु उस व्यक्ति से पूछते हैं कि यदि उसने झूठ कहा है तो क्या वे उसके विरुद्ध अल्लाह से दुआ करें। रिवायत के अनुसार वह व्यक्ति इस बात को स्वीकार करता है और उनसे दुआ करने को कहता है। मूल वर्णन में दुआ के कोई निश्चित शब्द सुरक्षित नहीं हैं, इसलिए कहानी में अपनी ओर से कोई विशेष दुआ नहीं जोड़ी जाती। इसके बाद हज़रत अली उस व्यक्ति के दावे की सच्चाई के संबंध में अल्लाह से दुआ करते हैं।
दुआ के तुरंत बाद रिवायत का असाधारण भाग सामने आता है। वर्णन में कहा गया है कि वह व्यक्ति सभा से निकल भी नहीं पाया था कि उसकी दृष्टि चली गई। पुराने स्रोतों में घटना की कड़ी सीधी है: विवादित कथन, हज़रत अली का यह कहना कि उसने झूठ कहा है, उस व्यक्ति का दुआ की चुनौती स्वीकार करना, हज़रत अली की दुआ, और फिर उसके जाने से पहले अंधा हो जाने का उल्लेख।
इब्न अबी दुनिया ने मजाबुद्दावा में इसी मूल घटना को सुरक्षित किया है। तबरानी ने इसे अलमुअजम अलऔसत में बयान किया, और इमाम अहमद की फ़ज़ाइल अस्सहाबा में भी इससे संबंधित एक रूप मिलता है जिसमें रहबा का उल्लेख आता है। इन वर्णनों के कुछ शब्द और विवरण अलग हैं, लेकिन मुख्य घटना एक ही रहती है: विवाद या इनकार, दुआ की चुनौती स्वीकार करना, और उसके बाद दृष्टि चले जाने की रिवायत।
लालकाई का वर्णन संक्षिप्त है। उसमें दुआ के कोई लंबे निश्चित शब्द, दृष्टि चले जाने की प्रक्रिया या उस व्यक्ति के बाद के जीवन का विवरण नहीं दिया गया। रिवायत सभा की बातचीत, व्यक्ति के कथन की सच्चाई से जुड़ी दुआ की चुनौती, हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु की दुआ और उसके तुरंत बाद बताए गए परिणाम तक रहती है। इसी सीमा में घटना उसी रूप में रहती है जैसा स्रोत ने उसे सुरक्षित किया है।
कहानी इसी परिणाम पर समाप्त होती है। एक व्यक्ति हज़रत अली इब्न अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु के सामने अपने विवादित कथन पर कायम रहा; हज़रत अली ने कहा कि यदि उसने झूठ कहा है तो वे उसके विरुद्ध दुआ करें; उसने स्वीकार किया; हज़रत अली ने अल्लाह से दुआ की; और रिवायत के अनुसार सभा से जाने से पहले उसकी दृष्टि चली गई। यही स्पष्ट क्रम पुराने स्रोतों में इस करामत के रूप में याद रखा गया है।
निष्कर्ष
रिवायत एक स्पष्ट क्रम पर समाप्त होती है: विवादित कथन, हज़रत अली इब्न अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु की दुआ, और सभा से जाने से पहले उस व्यक्ति की दृष्टि चले जाने का वर्णन।
स्रोत
Ibn Abi al-Dunya, Mujabu al-Da'wa, report 26
al-Lalaka'i, Sharh Usul I'tiqad Ahl al-Sunna wa al-Jama'a, vol. 9 p. 134, report 73
al-Tabarani, al-Mu'jam al-Awsat, vol. 2 p. 219, report 1791
Ahmad ibn Hanbal, Fada'il al-Sahaba, report 869
al-Haythami, Majma' al-Zawa'id, vol. 9 p. 119, on al-Tabarani al-Awsat 1791