सबसे मज़बूत विवरण के अनुसार उनका जन्म मदीना के निकट सुरय्या में १६ ज़ुलहिज्जा २१२ हिजरी, अर्थात ७ मार्च ८२८, को हुआ, जबकि बाद के स्रोतों में अन्य तिथियाँ भी मिलती हैं।
इमाम अली हादी
PER-000023
इमाम
पुष्ट
विशिष्ट स्थान ज्ञात
साझा ऐतिहासिक दायरा
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इमाम अली इब्न मुहम्मद अल-हादी अलैहिस्सलाम इसना-अशरी इमामी विश्वास के अनुसार दसवें इमाम और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की संतति से पैग़म्बर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सम्मानित वंशज थे। तीसरी हिजरी शताब्दी के आरंभ में मदीना के निकट जन्मे, उन्होंने कड़ी अब्बासी राजनीतिक निगरानी के बीच जीवन बिताया, सामर्रा बुलाए गए और ज्ञान, इबादत, गरिमा तथा विश्वसनीय प्रतिनिधियों के माध्यम से दूर-दूर फैले समुदाय के संगठन के लिए प्रसिद्ध हुए। साझा ऐतिहासिक स्रोत उनके उच्च वंश, सामर्रा स्थानांतरण, वहीं निधन और अपने घर में दफ़न की पुष्टि करते हैं, जबकि इमामत, करामात और उनसे मंसूब ज़ियारती ग्रंथों की शिक्षाओं को स्पष्ट रूप से इमामी परंपरा के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
उनका निधन सामर्रा में २५४ हिजरी, अर्थात ८६८, में हुआ। एक मज़बूत रिवायत २६ जुमादा अल-सानी २५४ हिजरी, अर्थात २१ जून ८६८, बताती है, जबकि दूसरी रिवायतें रजब का उल्लेख करती हैं। बाद की इमामी परंपरा ज़हर दिए जाने की बात करती है, पर सही कारण ऐतिहासिक रूप से निश्चित नहीं है।
अबू अहमद अल-मुवफ़्फ़क़ द्वारा सार्वजनिक जनाज़ा पढ़ाए जाने के बाद उन्हें सामर्रा में अपने घर में दफ़न किया गया। यह घरेलू दफ़न ऐतिहासिक रूप से मज़बूत है और बाद में अल-अस्करी मज़ार परिसर का भाग बना। दिए गए निर्देशांक आधुनिक मज़ार की जगह बताते हैं, लेकिन केंद्रीय प्रकाशित मज़ार अभिलेख से जोड़ने की आवश्यकता समाप्त नहीं करते।
जीवनी और ऐतिहासिक परिचय
अली इब्न मुहम्मद इब्न अली इब्न मूसा, जो अल-हादी और अल-नक़ी की उपाधियों तथा अबू अल-हसन अल-सालिस की कुनियत से प्रसिद्ध हैं, पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के परिवार की हुसैनी शाखा से थे। सबसे मज़बूत जन्म-विवरण के अनुसार उनका जन्म मदीना के निकट सुरय्या में १६ ज़ुलहिज्जा २१२ हिजरी, अर्थात ७ मार्च ८२८, को हुआ, हालांकि बाद के स्रोतों में दूसरी तिथियाँ भी मिलती हैं। उनकी माता का नाम समाना बताया गया है और कुछ रिवायतों में सूसन भी आता है; आधुनिक जीवनी शोध उन्हें संभवतः मग़रिबी मूल का मानता है। उनका बचपन मदीना के ऐसे घर में बीता जो ज्ञान, इबादत और पैग़म्बर से वंश-संबंध के कारण पहले से प्रसिद्ध था।
उनके पिता इमाम मुहम्मद अल-जवाद अलैहिस्सलाम का निधन २२० हिजरी, अर्थात ८३५, में हुआ, तब अली अलैहिस्सलाम कम आयु के थे। उनके पिता के अधिकांश अनुयायियों ने उन्हें उत्तराधिकारी माना, जबकि एक छोटा समूह कुछ समय के लिए उनके भाई मूसा की ओर गया और फिर लौट आया। इसना-अशरी इमामी स्रोत इस उत्तराधिकार को नियुक्त इमामत मानते हैं और कहते हैं कि आध्यात्मिक नेतृत्व आयु से सीमित नहीं होता। साझा इतिहास इतना विश्वासपूर्वक कह सकता है कि वे कम आयु में अपने पिता के समुदाय के केंद्रीय व्यक्तित्व बने, जबकि इस उत्तराधिकार का धार्मिक अर्थ इमामी विश्वास से संबंधित है।
उनके सार्वजनिक जीवन का आरंभिक भाग मदीना में बीता। स्रोत उन्हें गरिमामय, ज्ञानी, इबादतगुज़ार और लोगों के मामलों में सावधान बताते हैं। वे धार्मिक प्रश्नों के उत्तर देते, पारिवारिक और विद्वत संबंध बनाए रखते और धीरे-धीरे हिजाज़ से बहुत दूर रहने वाले अनुयायियों के लिए संदर्भ-बिंदु बन गए। उपलब्ध प्रमाण किसी विशाल औपचारिक शिक्षण संस्था की कल्पना की अनुमति नहीं देते, लेकिन पत्राचार करने वालों, रावियों और प्रतिनिधियों का ऐसा घेरा अवश्य दिखाते हैं जिनके माध्यम से प्रश्न, धार्मिक धन और सामुदायिक समस्याएँ उन तक पहुँचती थीं।
अब्बासी ख़लीफ़ा अल-मुतवक्किल को मदीना में इमाम के प्रभाव पर संदेह होने लगा। विवरणों में राज्यपाल की शिकायतों और इमाम के सम्मानपूर्ण पत्र का उल्लेख है जिसमें उन्होंने राजनीतिक दुराचार से इनकार किया। फिर भी उन्हें मदीना छोड़कर अब्बासी सैनिक राजधानी सामर्रा जाने का आदेश दिया गया। इस बुलावे को पैग़म्बर के परिवार के प्रभावशाली सदस्यों पर अब्बासी निगरानी की व्यापक नीति के संदर्भ में समझना चाहिए। यह सामान्य विद्वत यात्रा नहीं, बल्कि राजनीतिक नियंत्रण के अधीन स्थानांतरण था।
वे रमज़ान २३३ हिजरी, अर्थात ८४८, में सामर्रा पहुँचे। रिवायतें यात्रा और बग़दाद में सम्मानपूर्ण स्वागत का वर्णन करती हैं, लेकिन सामर्रा में उनका निवास लगातार निगरानी में रहा। क्योंकि नगर को अल-अस्कर भी कहा जाता था, वे और बाद में उनके पुत्र हसन अल-अस्करी की उपाधि से प्रसिद्ध हुए। उन्होंने वहाँ लगभग दो दशक बिताए, कभी तलाशी, बुलावे और प्रतिबंधों का सामना किया, फिर भी ऐसा अनुशासित और गरिमापूर्ण आचरण बनाए रखा जिसे असहमत इतिहासकारों ने भी इबादत और प्रतिष्ठा से जोड़ा।
उनके नेतृत्व की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषताओं में विश्वसनीय प्रतिनिधियों का उपयोग था। पत्रों और बाद के इमामी अभिलेखों से पता चलता है कि विभिन्न क्षेत्रों में वकील प्रश्नों, पत्राचार और धार्मिक धन का प्रबंध करते थे। सीधे संपर्क के सीमित होने पर इस जाल ने अनुयायियों को इमाम से जुड़ा रखा। इसने समुदाय को ऐसे नेतृत्व के लिए भी तैयार किया जो निरंतर शारीरिक उपस्थिति से कम और सत्यापित संदेशवाहकों, लिखित मार्गदर्शन तथा सामुदायिक अमानत की सावधान रक्षा पर अधिक निर्भर था।
इमामी हदीस संग्रह उनसे व्यापक बौद्धिक विरासत मंसूब करते हैं। उनके पत्र इमामों के बारे में अतिवादी दावों को अस्वीकार करते, क़ुरआन के सृजित होने या न होने पर विभाजनकारी बहस से रोकते, ईश्वर को शारीरिक कल्पना से परे बताते और बाध्यता तथा पूर्ण स्वतंत्र प्रत्यायोजन के बीच मानव उत्तरदायित्व समझाते हैं। प्रसिद्ध ज़ियारत अल-जामिआ अल-कबीरा भी इमामी ज़ियारती साहित्य में उनसे रिवायत की गई है। यह सामग्री इसना-अशरी धर्मशास्त्र को समझने में महत्त्वपूर्ण है, पर इसे सभी परंपराओं की सर्वमान्य ऐतिहासिक दस्तावेज़ी सामग्री के बजाय इमामी रिवायत के रूप में प्रस्तुत करना चाहिए।
एक प्रसिद्ध घटना, जो बाद की सुन्नी ऐतिहासिक संकलन और इमामी रिवायतों दोनों में सुरक्षित है, बताती है कि अधिकारियों ने उनके घर की तलाशी ली और उन्हें अल-मुतवक्किल के सामने दरबारी सभा में लाया। रिवायत है कि इमाम ने ऐसे पद पढ़े जिनमें शासकों को याद दिलाया गया कि महल, पहरेदार और सांसारिक शक्ति मृत्यु तथा हिसाब से नहीं बचा सकते। यह विवरण सत्ता के सामने संयम की नैतिक छवि बन गया। क्योंकि इसके रूप अलग-अलग हैं, इसे मंसूब रिवायत के रूप में रखना चाहिए और स्रोतों से बाहर दृश्य, संवाद या भावनात्मक विवरण नहीं जोड़ना चाहिए।
उनके परिवार ने इमामी इतिहास के अगले चरण को भी आकार दिया। उनके पुत्र मुहम्मद का निधन उनसे पहले हुआ और बाद में बलद के निकट एक सम्मानित मज़ार से उनका संबंध जुड़ा। अली अल-हादी अलैहिस्सलाम के निधन के बाद उनके अधिकांश इमामी अनुयायियों ने उनके पुत्र हसन अल-अस्करी अलैहिस्सलाम को उत्तराधिकारी माना; एक अन्य पुत्र जाफ़र भी जीवित रहे और बाद के उत्तराधिकार विवादों में उनका नाम आया। ये घटनाएँ समझाती हैं कि सामर्रा का घराना बाद की इसना-अशरी स्मृति में केंद्रीय क्यों बना, लेकिन इन्हें परिवार के बारे में हर बाद के दावे को निर्विवाद इतिहास बनाने के लिए उपयोग नहीं करना चाहिए।
उनका निधन सामर्रा में २५४ हिजरी, अर्थात ८६८, में हुआ। तबरी और कुलैनी से २६ जुमादा अल-सानी २५४ हिजरी, अर्थात २१ जून ८६८, की तारीख़ मंसूब है, जबकि दूसरी रिवायतें रजब का महीना बताती हैं। बाद की इमामी परंपरा सामान्यतः अब्बासी शासन में ज़हर दिए जाने का उल्लेख करती है, लेकिन सबसे मज़बूत साझा प्रमाण से सही कारण निश्चित नहीं होता, इसलिए इसे मंसूब रिवायत के रूप में रखा गया है। अबू अहमद अल-मुवफ़्फ़क़ ने सार्वजनिक जनाज़ा पढ़ाया और इमाम को सामर्रा में उनके अपने घर में दफ़न किया गया। यही ऐतिहासिक रूप से मज़बूत घरेलू दफ़न बाद में अल-अस्करी मज़ार परिसर का केंद्र बना, जहाँ इमाम हसन अल-अस्करी अलैहिस्सलाम भी दफ़न हुए। उनकी स्थायी विरासत निगरानी में धैर्यपूर्ण नेतृत्व, अनुशासित ज्ञान, अतिवाद से रक्षा और ऐसा नैतिक अधिकार है जो राजनीतिक पद पर निर्भर नहीं था।
उनके पिता इमाम मुहम्मद अल-जवाद अलैहिस्सलाम का निधन २२० हिजरी, अर्थात ८३५, में हुआ, तब अली अलैहिस्सलाम कम आयु के थे। उनके पिता के अधिकांश अनुयायियों ने उन्हें उत्तराधिकारी माना, जबकि एक छोटा समूह कुछ समय के लिए उनके भाई मूसा की ओर गया और फिर लौट आया। इसना-अशरी इमामी स्रोत इस उत्तराधिकार को नियुक्त इमामत मानते हैं और कहते हैं कि आध्यात्मिक नेतृत्व आयु से सीमित नहीं होता। साझा इतिहास इतना विश्वासपूर्वक कह सकता है कि वे कम आयु में अपने पिता के समुदाय के केंद्रीय व्यक्तित्व बने, जबकि इस उत्तराधिकार का धार्मिक अर्थ इमामी विश्वास से संबंधित है।
उनके सार्वजनिक जीवन का आरंभिक भाग मदीना में बीता। स्रोत उन्हें गरिमामय, ज्ञानी, इबादतगुज़ार और लोगों के मामलों में सावधान बताते हैं। वे धार्मिक प्रश्नों के उत्तर देते, पारिवारिक और विद्वत संबंध बनाए रखते और धीरे-धीरे हिजाज़ से बहुत दूर रहने वाले अनुयायियों के लिए संदर्भ-बिंदु बन गए। उपलब्ध प्रमाण किसी विशाल औपचारिक शिक्षण संस्था की कल्पना की अनुमति नहीं देते, लेकिन पत्राचार करने वालों, रावियों और प्रतिनिधियों का ऐसा घेरा अवश्य दिखाते हैं जिनके माध्यम से प्रश्न, धार्मिक धन और सामुदायिक समस्याएँ उन तक पहुँचती थीं।
अब्बासी ख़लीफ़ा अल-मुतवक्किल को मदीना में इमाम के प्रभाव पर संदेह होने लगा। विवरणों में राज्यपाल की शिकायतों और इमाम के सम्मानपूर्ण पत्र का उल्लेख है जिसमें उन्होंने राजनीतिक दुराचार से इनकार किया। फिर भी उन्हें मदीना छोड़कर अब्बासी सैनिक राजधानी सामर्रा जाने का आदेश दिया गया। इस बुलावे को पैग़म्बर के परिवार के प्रभावशाली सदस्यों पर अब्बासी निगरानी की व्यापक नीति के संदर्भ में समझना चाहिए। यह सामान्य विद्वत यात्रा नहीं, बल्कि राजनीतिक नियंत्रण के अधीन स्थानांतरण था।
वे रमज़ान २३३ हिजरी, अर्थात ८४८, में सामर्रा पहुँचे। रिवायतें यात्रा और बग़दाद में सम्मानपूर्ण स्वागत का वर्णन करती हैं, लेकिन सामर्रा में उनका निवास लगातार निगरानी में रहा। क्योंकि नगर को अल-अस्कर भी कहा जाता था, वे और बाद में उनके पुत्र हसन अल-अस्करी की उपाधि से प्रसिद्ध हुए। उन्होंने वहाँ लगभग दो दशक बिताए, कभी तलाशी, बुलावे और प्रतिबंधों का सामना किया, फिर भी ऐसा अनुशासित और गरिमापूर्ण आचरण बनाए रखा जिसे असहमत इतिहासकारों ने भी इबादत और प्रतिष्ठा से जोड़ा।
उनके नेतृत्व की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषताओं में विश्वसनीय प्रतिनिधियों का उपयोग था। पत्रों और बाद के इमामी अभिलेखों से पता चलता है कि विभिन्न क्षेत्रों में वकील प्रश्नों, पत्राचार और धार्मिक धन का प्रबंध करते थे। सीधे संपर्क के सीमित होने पर इस जाल ने अनुयायियों को इमाम से जुड़ा रखा। इसने समुदाय को ऐसे नेतृत्व के लिए भी तैयार किया जो निरंतर शारीरिक उपस्थिति से कम और सत्यापित संदेशवाहकों, लिखित मार्गदर्शन तथा सामुदायिक अमानत की सावधान रक्षा पर अधिक निर्भर था।
इमामी हदीस संग्रह उनसे व्यापक बौद्धिक विरासत मंसूब करते हैं। उनके पत्र इमामों के बारे में अतिवादी दावों को अस्वीकार करते, क़ुरआन के सृजित होने या न होने पर विभाजनकारी बहस से रोकते, ईश्वर को शारीरिक कल्पना से परे बताते और बाध्यता तथा पूर्ण स्वतंत्र प्रत्यायोजन के बीच मानव उत्तरदायित्व समझाते हैं। प्रसिद्ध ज़ियारत अल-जामिआ अल-कबीरा भी इमामी ज़ियारती साहित्य में उनसे रिवायत की गई है। यह सामग्री इसना-अशरी धर्मशास्त्र को समझने में महत्त्वपूर्ण है, पर इसे सभी परंपराओं की सर्वमान्य ऐतिहासिक दस्तावेज़ी सामग्री के बजाय इमामी रिवायत के रूप में प्रस्तुत करना चाहिए।
एक प्रसिद्ध घटना, जो बाद की सुन्नी ऐतिहासिक संकलन और इमामी रिवायतों दोनों में सुरक्षित है, बताती है कि अधिकारियों ने उनके घर की तलाशी ली और उन्हें अल-मुतवक्किल के सामने दरबारी सभा में लाया। रिवायत है कि इमाम ने ऐसे पद पढ़े जिनमें शासकों को याद दिलाया गया कि महल, पहरेदार और सांसारिक शक्ति मृत्यु तथा हिसाब से नहीं बचा सकते। यह विवरण सत्ता के सामने संयम की नैतिक छवि बन गया। क्योंकि इसके रूप अलग-अलग हैं, इसे मंसूब रिवायत के रूप में रखना चाहिए और स्रोतों से बाहर दृश्य, संवाद या भावनात्मक विवरण नहीं जोड़ना चाहिए।
उनके परिवार ने इमामी इतिहास के अगले चरण को भी आकार दिया। उनके पुत्र मुहम्मद का निधन उनसे पहले हुआ और बाद में बलद के निकट एक सम्मानित मज़ार से उनका संबंध जुड़ा। अली अल-हादी अलैहिस्सलाम के निधन के बाद उनके अधिकांश इमामी अनुयायियों ने उनके पुत्र हसन अल-अस्करी अलैहिस्सलाम को उत्तराधिकारी माना; एक अन्य पुत्र जाफ़र भी जीवित रहे और बाद के उत्तराधिकार विवादों में उनका नाम आया। ये घटनाएँ समझाती हैं कि सामर्रा का घराना बाद की इसना-अशरी स्मृति में केंद्रीय क्यों बना, लेकिन इन्हें परिवार के बारे में हर बाद के दावे को निर्विवाद इतिहास बनाने के लिए उपयोग नहीं करना चाहिए।
उनका निधन सामर्रा में २५४ हिजरी, अर्थात ८६८, में हुआ। तबरी और कुलैनी से २६ जुमादा अल-सानी २५४ हिजरी, अर्थात २१ जून ८६८, की तारीख़ मंसूब है, जबकि दूसरी रिवायतें रजब का महीना बताती हैं। बाद की इमामी परंपरा सामान्यतः अब्बासी शासन में ज़हर दिए जाने का उल्लेख करती है, लेकिन सबसे मज़बूत साझा प्रमाण से सही कारण निश्चित नहीं होता, इसलिए इसे मंसूब रिवायत के रूप में रखा गया है। अबू अहमद अल-मुवफ़्फ़क़ ने सार्वजनिक जनाज़ा पढ़ाया और इमाम को सामर्रा में उनके अपने घर में दफ़न किया गया। यही ऐतिहासिक रूप से मज़बूत घरेलू दफ़न बाद में अल-अस्करी मज़ार परिसर का केंद्र बना, जहाँ इमाम हसन अल-अस्करी अलैहिस्सलाम भी दफ़न हुए। उनकी स्थायी विरासत निगरानी में धैर्यपूर्ण नेतृत्व, अनुशासित ज्ञान, अतिवाद से रक्षा और ऐसा नैतिक अधिकार है जो राजनीतिक पद पर निर्भर नहीं था।
ऐतिहासिक महत्व और विरासत
इमाम अली अल-हादी अलैहिस्सलाम अब्बासी और इमामी इतिहास के एक निर्णायक संक्रमण पर खड़े हैं। मदीना से सामर्रा उनका स्थानांतरण दिखाता है कि ख़िलाफ़त पैग़म्बर के प्रमुख वंशजों पर कितनी निकट निगरानी रखती थी, जबकि उनका आचरण बताता है कि राजनीतिक शक्ति के बिना भी धार्मिक अधिकार जीवित रह सकता है। उनकी जीवनी मदीना के विद्वत वातावरण को सामर्रा की सैनिक राजधानी से जोड़ती और साम्राज्यिक निगरानी में अहल अल-बैत पर पड़े दबाव को स्पष्ट करती है।
उनका प्रतिनिधि-जाल ऐतिहासिक रूप से महत्त्वपूर्ण था क्योंकि उसने विश्वसनीय वकीलों, पत्रों और नियमित आर्थिक ज़िम्मेदारियों के माध्यम से दूरस्थ समुदायों को जोड़े रखा। जब सीधा संपर्क कठिन या जोखिमपूर्ण था, इस व्यवस्था ने सामुदायिक निरंतरता बनाए रखी। बाद का इसना-अशरी संगठन ऐसे वातावरण में विकसित हुआ जिसमें सत्यापन, प्रतिनिधिक संपर्क और गोपनीय संबंधों की रक्षा पहले ही महत्त्वपूर्ण बन चुकी थी।
उनका बौद्धिक महत्त्व इमामी रिवायतों में ईश्वर की निराकार महानता, नैतिक उत्तरदायित्व, अतिवाद के विरोध और विनाशकारी धर्मशास्त्रीय विवाद से संयम की शिक्षाओं में स्पष्ट है। ज़ियारत अल-जामिआ अल-कबीरा उनके नाम से जुड़ी सबसे प्रभावशाली इसना-अशरी ज़ियारती रचनाओं में बनी। इन शिक्षाओं को उनके इमामी स्रोत-क्षेत्र में समझना चाहिए, जबकि उनका वंश, सामर्रा निवास, निधन और घर में दफ़न व्यापक ऐतिहासिक अभिलेख का भाग हैं।
अपने घर में दफ़न होने से सामर्रा को मुस्लिम संसार के धार्मिक भूगोल में स्थायी स्थान मिला। बाद का अल-अस्करी मज़ार ज़ियारत और स्मृति का बड़ा केंद्र बना, किंतु आधुनिक भौतिक स्थान के निर्देशांकों को जीवनी के ऐतिहासिक प्रमाण से अलग रखना आवश्यक है। उपयोगकर्ता द्वारा दिए गए निर्देशांक आधुनिक स्थल की पहचान करते हैं, पर इस व्यक्ति-प्रोफ़ाइल को आयात योग्य बनाने से पहले केंद्रीय प्रकाशित मज़ार कोड और सत्यापित मज़ार अभिलेख अभी भी आवश्यक हैं। उनका जीवन दबाव में धैर्य, बौद्धिक अनुशासन, उत्तरदायी संपर्क और सांसारिक सत्ता के सामने गरिमा की शिक्षा देता है।
उनका प्रतिनिधि-जाल ऐतिहासिक रूप से महत्त्वपूर्ण था क्योंकि उसने विश्वसनीय वकीलों, पत्रों और नियमित आर्थिक ज़िम्मेदारियों के माध्यम से दूरस्थ समुदायों को जोड़े रखा। जब सीधा संपर्क कठिन या जोखिमपूर्ण था, इस व्यवस्था ने सामुदायिक निरंतरता बनाए रखी। बाद का इसना-अशरी संगठन ऐसे वातावरण में विकसित हुआ जिसमें सत्यापन, प्रतिनिधिक संपर्क और गोपनीय संबंधों की रक्षा पहले ही महत्त्वपूर्ण बन चुकी थी।
उनका बौद्धिक महत्त्व इमामी रिवायतों में ईश्वर की निराकार महानता, नैतिक उत्तरदायित्व, अतिवाद के विरोध और विनाशकारी धर्मशास्त्रीय विवाद से संयम की शिक्षाओं में स्पष्ट है। ज़ियारत अल-जामिआ अल-कबीरा उनके नाम से जुड़ी सबसे प्रभावशाली इसना-अशरी ज़ियारती रचनाओं में बनी। इन शिक्षाओं को उनके इमामी स्रोत-क्षेत्र में समझना चाहिए, जबकि उनका वंश, सामर्रा निवास, निधन और घर में दफ़न व्यापक ऐतिहासिक अभिलेख का भाग हैं।
अपने घर में दफ़न होने से सामर्रा को मुस्लिम संसार के धार्मिक भूगोल में स्थायी स्थान मिला। बाद का अल-अस्करी मज़ार ज़ियारत और स्मृति का बड़ा केंद्र बना, किंतु आधुनिक भौतिक स्थान के निर्देशांकों को जीवनी के ऐतिहासिक प्रमाण से अलग रखना आवश्यक है। उपयोगकर्ता द्वारा दिए गए निर्देशांक आधुनिक स्थल की पहचान करते हैं, पर इस व्यक्ति-प्रोफ़ाइल को आयात योग्य बनाने से पहले केंद्रीय प्रकाशित मज़ार कोड और सत्यापित मज़ार अभिलेख अभी भी आवश्यक हैं। उनका जीवन दबाव में धैर्य, बौद्धिक अनुशासन, उत्तरदायी संपर्क और सांसारिक सत्ता के सामने गरिमा की शिक्षा देता है।
पारिवारिक संबंध
👪 माता-पिता
पिता
इमाम मुहम्मद जवाद
पुष्ट
माता
समाना मग़रिबिया
पुष्ट
🤝 जीवनसाथी और वैवाहिक संबंध
हुदैस
संभावित
🌱 संतान
स्रोत
ʿALI AL-HADI | Wilferd Madelung, Encyclopaedia Iranica | Volume 1, Fascicle 8, pages 861-862 | https://www.iranicaonline.org/articles/ali-al-hadi-abul-hasan-b/ | identity, titles, birth variants, mother, succession, transfer to Samarra, representative network, death, funeral, burial and childrenKitab al-Irshad | Shaykh al-Mufid, translated by I. K. A. Howard | English edition, pages 465-475; PDF pages 494-504 | https://alkarbala.org/team/uploads/Kit%C3%A3b%20al-Irsh%C3%A3d.pdf | Imami account of succession, birth, transfer, reported signs, death, burial context and children
al-Bidaya wa al-Nihaya | Ibn Kathir | Year 254 AH obituary entry; pagination varies by edition | https://www.islamweb.net/ar/library/content/59/1371/%D9%85%D9%86-%D8%AA%D9%88%D9%81%D9%8A-%D9%81%D9%8A%D9%87%D8%A7-%D9%85%D9%86-%D8%A7%D9%84%D8%A3%D8%B9%D9%8A%D8%A7%D9%86 | Sunni historical account of al-Hadi's ascetic worship, transfer to Samarra and the reported palace-poem episode
Imam Al-Hadi | Jafar Anwari, Ahlul Bayt World Assembly | PDF pages 3-10 | https://al-islam.org/printpdf/book/export/html/45081 | Imami overview of the Abbasid era, representative network, anti-extremism letters, theological teaching and Ziyara al-Jami'a
The Life of Imam Ali al-Hadi, Study and Analysis | Baqir Sharif al-Qurashi | Samarra chapter; pagination varies by online edition | https://al-islam.org/life-imam-ali-al-hadi-study-and-analysis-baqir-shareef-al-qurashi/imam-al-hadi-samarra | later Imami reports on summons, searches, surveillance, residence and palace encounters
The Creation of the Qur'an and Prohibition on Debating about It | Thaqalayn, transmitting al-Saduq reports | chapter 5.12, report 1/1573 | https://thaqalayn.net/chapter/9/5/12 | Imami transmission of al-Hadi's letter discouraging divisive theological disputation
Negation of any Possibility of Seeing or Imagining God | Thaqalayn, transmitting Imami hadith collections | chapter 4.3, hadith 2/231 | https://thaqalayn.net/chapter/9/4/3 | Imami theological responses attributed to al-Hadi on divine transcendence
Kitab al-Ghayba | Shaykh al-Tusi, Thaqalayn edition | book 1, chapter 41, hadith 26 | https://thaqalayn.net/hadith/27/1/41/26 | appointment of a representative and evidence for the delegated network
Al-Ziyara al-Jami'a al-Kabira | Thaqalayn devotional text | transmitted visitation text; pagination not applicable | https://thaqalayn.net/duas/ziyarat-jamia-kabira | Imami devotional and theological legacy attributed to al-Hadi
चित्र दीर्घा
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