क़ुरआन पैग़म्बर नूह अलैहिस्सलाम के तूफ़ान को लगातार इनकार करने वालों पर ईश्वरीय दंड और नूह तथा उनके साथ ईमान लाने वालों के लिए ईश्वरीय नजात, दोनों रूपों में प्रस्तुत करता है। नूह को ईश्वर की निगरानी और वही के अनुसार कश्ती बनाने, जिन लोगों को चढ़ाने का आदेश था उन्हें सवार करने और फिर उस तूफ़ान का सामना करने का आदेश दिया गया जिसमें आकाश से पानी बरसा और धरती से सोते फूट निकले। ईमान वाले बचा लिए गए, नूह का वह बेटा जिसने सवार होने से इनकार किया था पानी में डूब गया, और पानी उतरने के बाद कश्ती अल-जूदी पर ठहर गई। बाद की रिवायतें कश्ती के निश्चित आकार, यात्रियों की संख्या और सफ़र की अवधि जैसी बातें जोड़ती हैं, लेकिन ये सीधे क़ुरआनी तथ्य नहीं हैं।
क़ुरआन तूफ़ान की शुरुआत को शक्तिशाली लेकिन संतुलित शब्दों में बयान करता है। आकाश के द्वार मूसलाधार पानी के साथ खुले, धरती से सोते फूट पड़े, और दोनों जल पहले से निर्धारित आदेश के अनुसार मिल गए। नूह की कश्ती को तख़्तों और दुसुर से बनी बताया गया है; दुसुर को पारंपरिक व्याख्या में जोड़ने वाले साधन या कीलें समझा गया है। कश्ती आगे बढ़ी तो लहरों को पहाड़ों जैसा बताया गया।
इस संकट में नूह ने अपने एक बेटे को पुकारा जिसने कश्ती पर चढ़ने से इनकार किया था। बेटे ने कहा कि वह किसी पहाड़ की शरण लेगा, लेकिन नूह ने बताया कि उस दिन ईश्वर के आदेश से कोई बचाने वाला नहीं, सिवाय उसके जिस पर ईश्वर दया करे। फिर एक लहर दोनों के बीच आ गई और बेटा डूबने वालों में शामिल हो गया। फिर एक लहर दोनों के बीच आ गई और बेटा डूबने वालों में शामिल हो गया।
इसके बाद घटना विनाश से नजात की ओर बढ़ती है। ईश्वर ने नूह और उनके साथ वालों को भरी हुई कश्ती में बचा लिया और बाकी इनकार करने वालों को डुबो दिया। धरती को अपना पानी निगलने और आकाश को रुकने का आदेश हुआ। पानी घट गया, फ़ैसला पूरा हुआ और कश्ती अल-जूदी पर ठहर गई। क़ुरआन इस नजात को एक निशानी बताता है और यह भी कहता है कि नूह की संतान बाकी रहने वालों में रही।
क़ुरआनी आयतें तूफ़ान के भौगोलिक विस्तार को आधुनिक भू-भौतिकी की भाषा में निर्धारित नहीं करतीं। बाद की तफ़सीरी रिवायतें कश्ती के निश्चित आकार, ठीक अस्सी यात्रियों, छह महीने के सफ़र और आशूरा से संबंध का वर्णन करती हैं; ये सीधे क़ुरआनी बयान के बजाय बाद की आश्रित परत से आती हैं। आधुनिक काला सागर तूफ़ान प्रतिरूप वैज्ञानिक रूप से विवादित हैं और क़ुरआनी तूफ़ान की पहचान सिद्ध नहीं करते। इस शोध में कश्ती के बचे अवशेषों की कोई निर्णायक, समकक्ष-समीक्षित पहचान भी स्थापित नहीं हुई।
इसलिए मुख्य परिणाम स्पष्ट है: चेतावनी और इनकार के बाद तूफ़ान के रूप में ईश्वरीय दंड आया, जबकि नूह और उनके साथ ईमान लाने वाले उस कश्ती से बचा लिए गए जिसे बनाने का ईश्वर ने आदेश दिया था। क़ुरआन स्वयं इस नजात और कश्ती को बाद के लोगों के लिए निशानी के रूप में प्रस्तुत करता है।
निष्कर्ष
क़ुरआनी बयान तूफ़ान को दंड और नजात दोनों के रूप में प्रस्तुत करता है: नूह अलैहिस्सलाम और उनके साथ ईमान लाने वालों को ईश्वर के आदेश से बनाई गई कश्ती के माध्यम से बचा लिया गया, जबकि इनकार करने वाली क़ौम डूब गई। क़ुरआन इस नजात और कश्ती को स्पष्ट रूप से एक निशानी बताता है।