इब्न अबी दुनिया ने एक रिवायत सुरक्षित की है कि हज्जाज ने मुवर्रिक़ अल-इजली को क़ैद कर दिया था और उनकी रिहाई की कोशिशें सफल नहीं हुईं। इसके बाद मुतर्रिफ़ बिन अब्दुल्लाह बिन अश-शिख्खीर रहिमहुल्लाह ने मौजूद लोगों को अल्लाह से दुआ करने के लिए कहा; मुतर्रिफ़ दुआ करते रहे और साथ वाले आमीन कहते रहे। रिवायत के अनुसार उसी शाम मुवर्रिक़ के पिता हज्जाज की सभा में पहुँचे और हज्जाज ने एक पहरेदार को उनके साथ जेल जाकर उनके बेटे को सौंपने का आदेश दिया। लालकाई और अबू नुऐम ने भी इसी घटना के बाद के रूप सुरक्षित किए हैं।
इब्न अबी दुनिया ने मुतर्रिफ़ बिन अब्दुल्लाह बिन अश-शिख्खीर रहिमहुल्लाह से जुड़ी एक रिवायत सुरक्षित की है जिसकी शुरुआत मुवर्रिक़ अल-इजली की क़ैद से होती है। बयान के अनुसार हज्जाज ने मुवर्रिक़ को जेल में डाल दिया था। उनके शुभचिंतकों ने रिहाई की कोशिश की, लेकिन वे प्रयास सफल नहीं हुए।
जब सामान्य कोशिशों से रास्ता न निकला तो मुतर्रिफ़ रहिमहुल्लाह ने मौजूद लोगों को दुआ की ओर बुलाया। उन्होंने कहा कि सब अल्लाह से राहत माँगें। रिवायत बताती है कि मुतर्रिफ़ दुआ करते रहे और बाकी लोग आमीन कहते रहे। उपलब्ध स्रोत में उस दुआ के ठीक शब्द सुरक्षित नहीं हैं, इसलिए सार्वजनिक कहानी में कोई विशेष दुआ गढ़कर नहीं जोड़ी गई।
इसके बाद रिवायत सीधे उसी शाम के अगले दृश्य पर पहुँचती है। मुवर्रिक़ के पिता हज्जाज की सभा में दाख़िल हुए। बयान के अनुसार हज्जाज ने एक पहरेदार को आदेश दिया कि वह पिता के साथ जेल जाए और मुवर्रिक़ को उन्हें सौंप दे। इस तरह कहानी के अपने क्रम में सामूहिक दुआ और रिहाई का आदेश उसी शाम एक के बाद एक आते हैं।
अबू नुऐम ने इसी घटना का थोड़ा विस्तृत रूप सुरक्षित किया है और उसमें एक यादगार बात जोड़ी है। उस रूप में कहा गया है कि रिहाई का आदेश आने से पहले किसी ने हज्जाज से मुवर्रिक़ के पक्ष में बात नहीं की थी। यह बात नतीजे के अचानक आने को और उभारती है, जबकि मूल क्रम वही रहता है: क़ैद, असफल कोशिशें, दुआ और फिर रिहाई।
लालकाई ने भी इसी मूल कहानी को सुरक्षित किया और इब्न असाकिर ने बाद में मुतर्रिफ़ रहिमहुल्लाह की जीवनी में इससे जुड़ी सामग्री रखी। इन पुरानी किताबों में ध्यान मुतर्रिफ़ की दुआ और उसी शाम आए रिहाई के आदेश पर रहता है; निर्णय कैसे बदला, इसकी कोई लंबी या कल्पित व्याख्या नहीं दी जाती।
सार्वजनिक कहानी में इसकी सबसे साफ़ सूरत सरल है। मुवर्रिक़ अल-इजली क़ैद थे, सामान्य कोशिशों से रिहाई न हुई, मुतर्रिफ़ बिन अब्दुल्लाह रहिमहुल्लाह ने दुआ की और मौजूद लोग आमीन कहते रहे, फिर उसी शाम मुवर्रिक़ को उनके पिता के हवाले करने का आदेश आ गया। यही क्रम इस मंसूब करामत की रिवायत का मुख्य भाग है।
जब सामान्य कोशिशों से रास्ता न निकला तो मुतर्रिफ़ रहिमहुल्लाह ने मौजूद लोगों को दुआ की ओर बुलाया। उन्होंने कहा कि सब अल्लाह से राहत माँगें। रिवायत बताती है कि मुतर्रिफ़ दुआ करते रहे और बाकी लोग आमीन कहते रहे। उपलब्ध स्रोत में उस दुआ के ठीक शब्द सुरक्षित नहीं हैं, इसलिए सार्वजनिक कहानी में कोई विशेष दुआ गढ़कर नहीं जोड़ी गई।
इसके बाद रिवायत सीधे उसी शाम के अगले दृश्य पर पहुँचती है। मुवर्रिक़ के पिता हज्जाज की सभा में दाख़िल हुए। बयान के अनुसार हज्जाज ने एक पहरेदार को आदेश दिया कि वह पिता के साथ जेल जाए और मुवर्रिक़ को उन्हें सौंप दे। इस तरह कहानी के अपने क्रम में सामूहिक दुआ और रिहाई का आदेश उसी शाम एक के बाद एक आते हैं।
अबू नुऐम ने इसी घटना का थोड़ा विस्तृत रूप सुरक्षित किया है और उसमें एक यादगार बात जोड़ी है। उस रूप में कहा गया है कि रिहाई का आदेश आने से पहले किसी ने हज्जाज से मुवर्रिक़ के पक्ष में बात नहीं की थी। यह बात नतीजे के अचानक आने को और उभारती है, जबकि मूल क्रम वही रहता है: क़ैद, असफल कोशिशें, दुआ और फिर रिहाई।
लालकाई ने भी इसी मूल कहानी को सुरक्षित किया और इब्न असाकिर ने बाद में मुतर्रिफ़ रहिमहुल्लाह की जीवनी में इससे जुड़ी सामग्री रखी। इन पुरानी किताबों में ध्यान मुतर्रिफ़ की दुआ और उसी शाम आए रिहाई के आदेश पर रहता है; निर्णय कैसे बदला, इसकी कोई लंबी या कल्पित व्याख्या नहीं दी जाती।
सार्वजनिक कहानी में इसकी सबसे साफ़ सूरत सरल है। मुवर्रिक़ अल-इजली क़ैद थे, सामान्य कोशिशों से रिहाई न हुई, मुतर्रिफ़ बिन अब्दुल्लाह रहिमहुल्लाह ने दुआ की और मौजूद लोग आमीन कहते रहे, फिर उसी शाम मुवर्रिक़ को उनके पिता के हवाले करने का आदेश आ गया। यही क्रम इस मंसूब करामत की रिवायत का मुख्य भाग है।
निष्कर्ष
रिवायत का अंत मुवर्रिक़ अल-इजली को उसी शाम उनके पिता के हवाले किए जाने पर होता है जिस शाम मुतर्रिफ़ बिन अब्दुल्लाह रहिमहुल्लाह ने मौजूद लोगों के साथ दुआ की थी।
स्रोत
Ibn Abi al-Dunya, Mujabu al-Da'wa, report 75 in HadithPortal numbering
Ibn Abi al-Dunya, Mujabu al-Da'wa: تعال ندع الله ... فدعا مطرف وأمنا
al-Lalaka'i, Sharh Usul I'tiqad Ahl al-Sunna, Karamat al-Awliya, report 174
Ibn Abi al-Dunya, Mujabu al-Da'wa, report 75
Abu Nu'aym, Hilyat al-Awliya, Mutarrif ibn Abd Allah, wonders from his karamat
Abu Nu'aym, Hilyat al-Awliya: من غير أن يكلمه فيه أحد من الناس
al-Lalaka'i route: Sulayman ibn Harb -> Hammad ibn Zayd -> Ghaylan ibn Jarir
Abu Nu'aym route: Khalid ibn Khidash -> Hammad ibn Zayd -> Ghaylan ibn Jarir
Ibn Asakir, Tarikh Dimashq, biography of Mutarrif ibn Abd Allah; preserves Ibn Abi al-Dunya and Abu Nu'aym routes side by side