विवाद में मुतर्रिफ़ बिन अब्दुल्लाह रहिमहुल्लाह की शर्त वाली दुआ

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लालकाई ने मुतर्रिफ़ बिन अब्दुल्लाह बिन अश-शिख्खीर रहिमहुल्लाह के बारे में एक रिवायत सुरक्षित की है जिसमें उनकी क़ौम के एक व्यक्ति ने विवाद के दौरान उनके बारे में झूठ कहा। मुतर्रिफ़ ने शर्त वाली दुआ की कि यदि वह व्यक्ति झूठा है तो अल्लाह उसकी मृत्यु जल्दी कर दे, और रिवायत कहती है कि वह वहीं मर गया। जब उसके परिवार ने ज़ियाद के पास शिकायत की तो उन्होंने स्वयं माना कि मुतर्रिफ़ ने न उसे मारा था और न छुआ था। इसके बाद ज़ियाद से यह बात वर्णित है कि यह एक नेक व्यक्ति की दुआ थी जो दैवी निर्णय के साथ घटित हुई।

लालकाई ने मुतर्रिफ़ बिन अब्दुल्लाह बिन अश-शिख्खीर रहिमहुल्लाह के बारे में एक उल्लेखनीय रिवायत सुरक्षित की है। घटना की शुरुआत मुतर्रिफ़ और उनकी क़ौम के एक व्यक्ति के बीच हुए विवाद से होती है। रिवायत के अनुसार उस व्यक्ति ने उसी विवाद में मुतर्रिफ़ के बारे में झूठ कहा।

मुतर्रिफ़ रहिमहुल्लाह ने इस बात का उत्तर शारीरिक बल से नहीं दिया। उन्होंने ऐसी शर्त वाली दुआ की जो सीधे उस कथन के सच या झूठ होने से जुड़ी थी। दुआ का अर्थ यह था कि यदि वह व्यक्ति झूठा है तो अल्लाह उसकी मृत्यु जल्दी कर दे। यह शर्त घटना का मुख्य हिस्सा है, इसलिए इसे बिना शर्त मृत्यु की इच्छा के रूप में पेश करना ठीक नहीं होगा।

इसके बाद रिवायत तुरंत एक असाधारण परिणाम बताती है। उस व्यक्ति के बारे में कहा गया है कि वह वहीं मर गया। उस समय मुतर्रिफ़ की ओर से मारपीट, संघर्ष या किसी शारीरिक हमले का कोई वर्णन नहीं मिलता।

इसके बाद उस व्यक्ति का परिवार ज़ियाद के पास शिकायत लेकर गया। शिकायत के दौरान उन्होंने स्वयं एक महत्वपूर्ण बात मान ली कि मुतर्रिफ़ रहिमहुल्लाह ने न उस व्यक्ति को मारा था और न उसे छुआ था। इस तरह रिवायत घटना को किसी शारीरिक कार्रवाई के बजाय मंसूब दुआ से जोड़ती है।

फिर ज़ियाद से यह बात वर्णित है कि उन्होंने इसे एक नेक व्यक्ति की दुआ का दैवी निर्णय के साथ घटित होना बताया। यह वाक्य कहानी की सुरक्षित सूरत का हिस्सा बन गया और यही कारण है कि बाद की किताबों में इस घटना को मुतर्रिफ़ रहिमहुल्लाह की करामात से जुड़े वर्णनों में रखा गया।

बाद की पुरानी किताबों ने भी इसी मुख्य घटना को सुरक्षित रखा। इब्न हजर ने लिखा कि इब्न अबी दुनिया ने इसे स्वीकार हुई दुआओं से जुड़ी अपनी किताब में लिखा, और अबू नुऐम ने भी मुतर्रिफ़ की जीवनी में घटना का मूल रूप सुरक्षित किया। सार्वजनिक कहानी में इसे इसी एक क्रम तक सीमित रखा गया है: विवाद, झूठा कथन, शर्त वाली दुआ, अचानक मृत्यु, परिवार की शिकायत और यह स्वीकार कि मुतर्रिफ़ ने उस व्यक्ति को शारीरिक रूप से हानि नहीं पहुँचाई थी।

निष्कर्ष

रिवायत का अंत ज़ियाद के इस कथन पर होता है कि यह एक नेक व्यक्ति की दुआ थी जो दैवी निर्णय के साथ घटित हुई, जबकि परिवार मान चुका था कि मुतर्रिफ़ रहिमहुल्लाह ने न मारा था और न छुआ था।

स्रोत

al-Lalaka'i, Sharh Usul I'tiqad Ahl al-Sunna, reports 171-172
al-Lalaka'i, reports 171-172
al-Lalaka'i, reports 171-172
al-Lalaka'i, reports 171-172
al-Lalaka'i reports 171-172: two upper routes converge on Yazid ibn Harun -> Jarir ibn Hazim -> Humayd ibn Hilal
Humayd ibn Hilal al-Adawi narrator dossier
Ibn Hajar, al-Isaba fi Tamyiz al-Sahaba, Mutarrif ibn Abd Allah entry
Ibn Hajar encyclopedia extract, Mutarrif report 637
al-Lalaka'i, report 173
CAND-0164 Task 1 evidence synthesis
al-Lalaka'i, reports 171-172
al-Lalaka'i, reports 171-172; Abu Nu'aym, Hilyat al-Awliya 2/202
Ibn Hajar, al-Isaba, Mutarrif ibn Abd Allah entry; al-Lalaka'i reports 171-172