अल-लालकाई एक पुरानी रिवायत सुरक्षित रखते हैं जिसमें एक अज्ञात व्यक्ति झूठा दावा करता है कि हबीब अजमी पर उसके तीन सौ दिरहम बाकी हैं। हबीब ने बात को सार्वजनिक झगड़े में नहीं बदला; उसे अगले दिन आने को कहा, वुज़ू करके नमाज़ पढ़ी और सच तथा झूठ का फैसला अल्लाह पर छोड़ते हुए शर्त वाली दुआ की। रिवायत के अनुसार वह व्यक्ति बाद में शरीर के एक हिस्से में लकवे की हालत में लाया गया, उसने माना कि कर्ज़ की बात बनाई हुई थी ताकि हबीब लोगों के सामने संकोच करके पैसे दे दें, फिर उसने दोबारा ऐसा न करने का वादा किया और हबीब की दुआ के बाद स्वस्थ होकर खड़ा हो गया।
एक व्यक्ति हबीब अबू मुहम्मद के पास आया और बोला कि आपके ऊपर मेरे तीन सौ दिरहम बाकी हैं। हबीब ने पूछा कि यह कर्ज़ कैसे बना? उस व्यक्ति ने कोई सौदा, उधार या कारण नहीं बताया; उसने बस अपना दावा दोहरा दिया। हबीब ने लोगों के सामने उससे बहस नहीं की। उन्होंने केवल कहा कि अगले दिन वापस आना।
रिवायत के अनुसार हबीब ने वुज़ू किया, नमाज़ पढ़ी और फिर एक शर्त वाली दुआ की। दुआ का अर्थ यह था कि यदि वह व्यक्ति सच्चा है तो उसका अधिकार उसे मिल जाए, और यदि वह झूठा है तो उसके झूठ की वास्तविकता प्रकट हो जाए। इस दुआ में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि हबीब ने स्वयं उसके दिल का हाल जानने का दावा नहीं किया; उन्होंने सच और झूठ का फैसला अल्लाह पर छोड़ा।
अगले दिन कहानी अचानक बदलती है। वही व्यक्ति शरीर के एक हिस्से में लकवे की हालत में उठाकर हबीब के पास लाया गया। हबीब ने पूछा कि क्या हुआ। अब उस व्यक्ति ने सच स्वीकार कर लिया। उसने बताया कि हबीब पर उसका कोई पैसा नहीं था। उसने यह दावा केवल इसलिए बनाया था कि लोगों के सामने हबीब संकोच करेंगे और विवाद से बचने के लिए उसे तीन सौ दिरहम दे देंगे।
यहीं कहानी का सबसे सुंदर भाग सामने आता है। हबीब ने उसकी हालत पर खुशी नहीं दिखाई और न उसे और अपमानित किया। उन्होंने सिर्फ पूछा: क्या तुम फिर ऐसा करोगे? उसने कहा: नहीं। उसके स्वीकार और लौटने के बाद हबीब ने दोबारा दुआ की, लेकिन इस बार उसी व्यक्ति की सलामती और स्वास्थ्य के लिए।
अल-लालकाई की रिवायत का अंत यह बताता है कि वह व्यक्ति ज़मीन पर खड़ा हुआ और ऐसे चलने-दौड़ने लगा जैसे उसे कुछ हुआ ही न था। इस तरह कहानी केवल सज़ा की कथा नहीं रहती। यह झूठे लाभ की कोशिश से शुरू होकर सच के प्रकट होने, स्वीकारोक्ति, तौबा, क्षमा और अंत में उसी व्यक्ति के लिए भलाई की दुआ तक पहुँचती है।
निष्कर्ष
इस रिवायत का सबसे सुंदर पहलू हबीब अजमी की अंतिम प्रतिक्रिया है: जब झूठा दावेदार अपना अपराध मानकर दोबारा ऐसा न करने का वादा करता है, तो हबीब उसके स्वास्थ्य के लिए दुआ करते हैं। इस प्रकार शास्त्रीय कहानी दुआ की स्वीकृति के साथ तौबा, क्षमा और दया का चित्र भी प्रस्तुत करती है।