शैख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी रहिमहुल्लाह और तीन अनकहे विचार

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ज़हबी ने शैख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी रहिमहुल्लाह की जीवनी में तीन अलग रिवायतें सुरक्षित की हैं जिनमें आने वाले लोग ऐसे उत्तर का ज़िक्र करते हैं जो उनके अनकहे विचार या इरादे से जुड़ा था। अबू बक्र अल-इमाद एक अक़ीदे से जुड़े संदेह के साथ मजलिस में आए, अबू अल-बक़ा अल-नहवी के मन में क़िराअत के बारे में आपत्ति थी, और शिहाबुद्दीन सुहरवर्दी ने इल्मे कलाम या उसूलुद्दीन पढ़ने का इरादा किया। हर रिवायत में बयान है कि बात कहे जाने से पहले अब्दुल क़ादिर ने उसी विषय को संबोधित किया। ज़हबी ने सुहरवर्दी के वाक़िआ की एक विस्तृत रूपरेखा इब्न अल-नज्जार से भी सुरक्षित की है।

ज़हबी ने शैख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी रहिमहुल्लाह की जीवनी में कई याद रहने वाली रिवायतें सुरक्षित की हैं। उनमें से तीन का सामान्य ढाँचा मिलता-जुलता है, लेकिन वे अलग-अलग घटनाएँ हैं और हर घटना का बयान अलग व्यक्ति से आता है। हर रिवायत में आने वाला व्यक्ति अपने भीतर किसी विचार, संदेह या इरादे का ज़िक्र करता है और फिर बताता है कि उसके बोलने से पहले शैख़ की बात उसी अंदरूनी मामले से जुड़ गई।

पहली रिवायत अबू बक्र अल-इमाद से है। वे कहते हैं कि अक़ीदे की बहस और अध्ययन से उनके मन में परेशान करने वाला संदेह पैदा हुआ। वे शैख़ अब्दुल क़ादिर की मजलिस में इसलिए गए कि उन्होंने सुना था कि शैख़ कभी आदमी के दिल की बात के अनुसार बोलते हैं। मजलिस में अब्दुल क़ादिर ने कहा कि उनका अक़ीदा नेक सलफ़ और सहाबा का अक़ीदा है। अबू बक्र ने मन ही मन पहली बात को संयोग माना। वही बात फिर दोहराई गई और इसके बाद शैख़ ने उन्हें नाम लेकर पुकारा, जबकि उन्होंने अपना विचार ज़बान से नहीं कहा था। उसी रिवायत में आगे है कि शैख़ ने उनके ग़ैरहाज़िर पिता के आने की ख़बर दी; बाहर निकलने पर अबू बक्र ने अपने पिता को लौटा हुआ पाया।

दूसरी रिवायत अबू अल-बक़ा अल-नहवी से है। वे कहते हैं कि उनके मन में सवाल उठा कि शैख़ अब्दुल क़ादिर एक विशेष सुर वाली क़िराअत पर आपत्ति क्यों नहीं करते। इसके बाद शैख़ की बात उसी आपत्ति के उत्तर की ओर आई और उन्होंने स्पष्ट किया कि संबोधन अबू अल-बक़ा से है। अबू अल-बक़ा कहते हैं कि उन्होंने भीतर उस आपत्ति से तौबा की, जिसके बाद शैख़ ने बताया कि अल्लाह ने उनकी तौबा क़ुबूल कर ली है।

तीसरी रिवायत शिहाबुद्दीन सुहरवर्दी से जुड़ी है। उन्होंने मन में उसूलुद्दीन या इल्मे कलाम पढ़ने का इरादा किया और सोचा कि शैख़ से मशवरा करेंगे। अभी उन्होंने सवाल नहीं किया था कि शैख़ ने उन्हें नाम लेकर संबोधित किया और चेताया कि यह क़ब्र के लिए ज़ादे राह नहीं है। ज़हबी ने इब्न अल-नज्जार से इसी वाक़िआ की एक लंबी रूपरेखा भी सुरक्षित की है, जिसमें सुहरवर्दी चुपचाप इल्मे कलाम पढ़ने का इरादा करते हैं और शैख़ उन्हें उस इरादे से तौबा करने को कहते हैं।

इन तीनों रिवायतों को अलग-अलग पढ़ने से हर घटना साफ़ रहती है। अबू बक्र की रिवायत में संदेह, अक़ीदे की बात का दोहराया जाना, नाम लेकर संबोधन और पिता के आने की ख़बर प्रमुख है। अबू अल-बक़ा की रिवायत में भीतर की आपत्ति और फिर तौबा है। सुहरवर्दी की रिवायत में अनकहा शैक्षिक इरादा और सवाल से पहले मिली चेतावनी मुख्य है।

इस तरह ज़हबी द्वारा सुरक्षित ये तीन घटनाएँ एक साझा रूप दिखाती हैं: लोग शैख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी रहिमहुल्लाह के पास ऐसे सवाल, संदेह या इरादे लेकर आए जिन्हें उन्होंने अभी ज़बान नहीं दी थी, और हर बयान में उसी भीतर के मामले से जुड़ा उत्तर मिलने का ज़िक्र है.

निष्कर्ष

तीनों रिवायतों का साझा और यादगार पहलू यही है: आने वाले व्यक्ति के मन में कोई अनकहा विचार या इरादा था और रिवायत में शैख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी रहिमहुल्लाह को उसके बोलने से पहले उसी विषय पर बात करते हुए बयान किया गया है।

स्रोत

al-Dhahabi, Siyar A'lam al-Nubala', biography of al-Shaykh Abd al-Qadir: report of Abu Bakr al-Imad
al-Dhahabi, Siyar A'lam al-Nubala', Abu Bakr al-Imad report: اعتقادنا اعتقاد السلف الصالح والصحابة
al-Dhahabi, Siyar A'lam al-Nubala', Abu Bakr al-Imad report: قم قد جاء أبوك
al-Dhahabi, Siyar A'lam al-Nubala', report of Abu al-Baqa al-Nahwi
al-Dhahabi, Siyar A'lam al-Nubala', Abu al-Baqa report: قد قبل الله توبتك
al-Dhahabi, Siyar A'lam al-Nubala', report of Shihab al-Din al-Suhrawardi
al-Dhahabi quoting Ibn al-Najjar, longer Suhrawardi variant
al-Dhahabi quoting Izz al-Din ibn Abd al-Salam on broad transmission of Abd al-Qadir's karamat
al-Dhahabi's source-critical conclusion on reports attributed to Abd al-Qadir