कुरआन की सूरह आले इमरान ३:३७ बताती है कि जब भी ज़करिया अलैहिस्सलाम मरयम अलैहस्सलाम के पास मेहराब में जाते, उन्हें उनके पास रिज़्क़ मिलता। जब उन्होंने पूछा कि यह कहाँ से आया, तो मरयम अलैहस्सलाम ने कहा कि यह अल्लाह की ओर से है, और आयत बताती है कि अल्लाह जिसे चाहता है बेहिसाब रिज़्क़ देता है। सुन्नी परंपरा की शास्त्रीय तफ़सीरों में इस रिज़्क़ को अक्सर ऐसे फलों से समझाया गया है जो अपने सामान्य मौसम के बाहर मिलते थे, जबकि कुरआन स्वयं भोजन की किस्म, मौसम, मात्रा या पहुँचने के तरीके को तय नहीं करता। अगली आयत में ज़करिया अलैहिस्सलाम की नेक संतान के लिए दुआ आती है, जिसे मफ़स्सिर उस दृश्य से पैदा हुई उम्मीद से जोड़ते हैं।
ज़करिया अलैहिस्सलाम ने उनसे पूछा कि यह रिज़्क़ कहाँ से आया है। मरयम अलैहस्सलाम ने उत्तर दिया कि यह अल्लाह की ओर से है। फिर वही कुरआनी संदर्भ इस घटना के पीछे का मूल सिद्धांत बताता है कि अल्लाह जिसे चाहता है बेहिसाब रिज़्क़ देता है। इसलिए इस विवरण की सबसे मज़बूत बुनियाद स्वयं कुरआन है। रिज़्क़ का बार बार मिलना, ज़करिया अलैहिस्सलाम का प्रश्न, मरयम अलैहस्सलाम का उत्तर और उस रिज़्क़ को अल्लाह से जोड़ना आयत में साफ़ रूप से मौजूद है।
शास्त्रीय सुन्नी तफ़सीर इस कुरआनी मूल के साथ एक प्रसिद्ध व्याख्यात्मक परत भी जोड़ती है। तबरी ने इब्न अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा, मुजाहिद, क़तादा, ज़ह्हाक़, रबीअ और दूसरे आरंभिक विद्वानों से कई रिवायतें नकल की हैं जिनमें मरयम अलैहस्सलाम के पास ऐसे फल मिलने का वर्णन है जो सामान्य मौसम से बाहर होते थे। इब्न कसीर भी यह प्रसिद्ध व्याख्या नकल करते हैं कि गर्मी के फल सर्दी में और सर्दी के फल गर्मी में मिलते थे, और वे इस आयत को औलिया की करामात के प्रमाणों में रखते हैं। क़ुर्तुबी और बग़वी भी इसी सामान्य अर्थ को आगे की आयत से जोड़ते हैं।
उसके तुरंत बाद सूरह आले इमरान ३:३८ में ज़करिया अलैहिस्सलाम अपने रब से नेक संतान की दुआ करते हैं। शास्त्रीय मफ़स्सिर समझाते हैं कि मरयम अलैहस्सलाम के लिए अल्लाह की असाधारण रोज़ी देखकर उनकी उम्मीद मज़बूत हुई कि अल्लाह उनकी वृद्धावस्था के बावजूद उन्हें संतान दे सकता है। यह दुआ इस घटना का बहुत निकट संदर्भ है, लेकिन यह मरयम अलैहस्सलाम के रिज़्क़ वाले दृश्य के बाद का चरण है; इसे उसी घटना के भीतर दूसरी करामत बनाकर नहीं मिलाना चाहिए।
सार्वजनिक विवरण में वह सीमा स्पष्ट रहनी चाहिए जो वही के निश्चित कथन और बाद की तफ़सीरी व्याख्या के बीच है। सूरह आले इमरान ३:३७ यह नहीं बताती कि वह रिज़्क़ कौन सा भोजन था, उसकी कितनी मात्रा थी, कौन सा मौसम था, वह किस माध्यम से पहुँचा, या कोई इंसानी वाहक था। इसलिए गर्मी के फल सर्दी में और सर्दी के फल गर्मी में मिलने का विवरण शास्त्रीय तफ़सीर है, कुरआन की शाब्दिक भाषा नहीं।
सबसे मज़बूत निष्कर्ष यह है कि कुरआन मेहराब में मरयम अलैहस्सलाम के पास ऐसे रिज़्क़ का स्पष्ट उल्लेख करता है जिसने ज़करिया अलैहिस्सलाम को उसके स्रोत के बारे में पूछने पर प्रेरित किया, और मरयम अलैहस्सलाम ने उसे सीधे अल्लाह की ओर से बताया। शास्त्रीय सुन्नी तफ़सीर ने इस घटना को मरयम अलैहस्सलाम की असाधारण करामत माना और आम तौर पर रिज़्क़ को मौसम से बाहर मिलने वाले फलों से समझाया, जबकि यह मौसमी विवरण तफ़सीरी स्तर पर ही रहता है।
निष्कर्ष
सूरह आले इमरान ३:३७ स्पष्ट करती है कि ज़करिया अलैहिस्सलाम बार बार मरयम अलैहस्सलाम के पास मेहराब में रिज़्क़ पाते थे और वह उसे अल्लाह की ओर से बताती थीं, जो जिसे चाहता है बेहिसाब रिज़्क़ देता है। शास्त्रीय सुन्नी तफ़सीर ने इसे मरयम अलैहस्सलाम की करामत समझा और सामान्यतः इसे मौसम से बाहर मिलने वाले फलों से जोड़ा, लेकिन यह मौसमी विवरण तफ़सीरी व्याख्या है, कुरआन का शाब्दिक कथन नहीं।