हसन इब्न अली रज़ियल्लाहु अन्हु के ज़रिए सुलह की नबवी पेशीनगोई

वह्य की निशानी या पूर्वसूचनानबूवत की पुष्टि की निशानीऐतिहासिक परिणामसहीह हदीस
⚙️ प्रिंट, साझा और अन्य विकल्प
📱 व्हाट्सऐप 📧 ईमेल सहेजे गए पृष्ठ

क्यू आर संकेत

पृष्ठ का क्यू आर
पृष्ठ का क्यू आर

संबंधित व्यक्ति

सहीह बुख़ारी में नबी मुहम्मद ﷺ की यह पेशीनगोई सुरक्षित है कि हसन इब्न अली रज़ियल्लाहु अन्हु सय्यिद होंगे और अल्लाह उनके ज़रिए मुसलमानों के दो बड़े समूहों के बीच सुलह कराएगा। इसी बुख़ारी रिवायत में बाद के टकराव की स्थिति, सुलह की बातचीत और हसन रज़ियल्लाहु अन्हु द्वारा मुआविया के साथ सुलह करने का परिणाम भी दर्ज है। समान रिवायतें सुनन नसाई, सुनन अबी दाऊद और जामिअ तिर्मिज़ी में भी मिलती हैं, और तिर्मिज़ी ने अपनी रिवायत को हसन सहीह कहा है। बाद की ऐतिहासिक रिवायतों में इस सुलह को ४० हिजरी या ४१ हिजरी के आरंभ में रखने का मतभेद है, इसलिए इस तारीख़ी बहस को सहीह हदीस से प्रमाणित मूल पेशीनगोई और उसके पूरे होने से अलग रखना चाहिए।

नबी मुहम्मद ﷺ ने अपने नवासे हसन इब्न अली रज़ियल्लाहु अन्हु के बारे में एक विशेष वर्णन किया और उसे भविष्य की एक घटना से जोड़ दिया। सहीह बुख़ारी की रिवायत में आपने हसन रज़ियल्लाहु अन्हु को सय्यिद, अर्थात सम्मानित और नेतृत्व करने वाली हस्ती, कहा और यह पेशीनगोई की कि अल्लाह उनके ज़रिए मुसलमानों के दो बड़े समूहों के बीच सुलह कराएगा। इस कथन का महत्व यह है कि यह केवल हसन रज़ियल्लाहु अन्हु की व्यक्तिगत फ़ज़ीलत नहीं बताता, बल्कि आने वाले एक संघर्ष की ओर संकेत करता है, सुलह के लिए हसन को केंद्रीय व्यक्ति बताता है और आमने-सामने खड़े दोनों समूहों को स्पष्ट रूप से मुसलमान कहता है।

सहीह बुख़ारी उस बाद की ऐतिहासिक स्थिति को भी सुरक्षित रखती है जिसमें इस पेशीनगोई का परिणाम सामने आया। हसन रज़ियल्लाहु अन्हु बड़े सैन्य दस्तों के साथ मुआविया की ओर बढ़े, जिससे दोनों पक्ष गंभीर टकराव की स्थिति में आ गए। इसके बाद मुआविया ने अब्दुर्रहमान इब्न समुरा और अब्दुल्लाह इब्न आमिर इब्न कुरैज़ को हसन रज़ियल्लाहु अन्हु के पास सुलह की बातचीत के लिए भेजा। रिवायत का निर्णायक परिणाम यह है कि हसन ने मुआविया के साथ सुलह कर ली। इस तरह उसी हदीसी विवरण में पहले की नबवी पेशीनगोई और बाद की सुलह, भविष्यवाणी और उसके पूरे होने के रूप में साथ दिखाई देती हैं।

यह मूल पेशीनगोई हदीस के साहित्य में केवल एक जगह तक सीमित नहीं है। बुख़ारी ने इसे दूसरे अध्यायों में भी रिवायत किया है, जिनमें हसन रज़ियल्लाहु अन्हु की फ़ज़ीलत से संबंधित एक संक्षिप्त रिवायत और किताबुल फ़ितन की एक रिवायत शामिल है। इसके समान रिवायतें सुनन नसाई, सुनन अबी दाऊद और जामिअ तिर्मिज़ी में भी हैं। तिर्मिज़ी ने अपनी रिवायत को हसन सहीह कहा है। बुख़ारी इसी रिवायत की सनद के संबंध में यह भी बताती है कि इससे हसन बसरी का अबू बकरा से सुनना सिद्ध होता है। यह टिप्पणी इसी रिवायत की सनद तक सीमित है।

बाद के शास्त्रीय इतिहासकार इस सुलह को उस समय से जोड़ते हैं जो बाद में आमुल जमाअत, अर्थात एकता के वर्ष, के नाम से प्रसिद्ध हुआ। लेकिन इन ऐतिहासिक विवरणों में सुलह की ठीक तारीख़ एक समान नहीं है। इब्न कसीर ने ऐसी रिवायतें भी दर्ज की हैं जो इसे ४० हिजरी में रखती हैं और ऐसी भी जो ४१ हिजरी के आरंभ को अधिक उपयुक्त बताती हैं; एक अन्य स्थान पर वे सुलह को रबीउल अव्वल ४१ हिजरी में रखते हैं। यह बाद की तारीख़ी चर्चा सहीह हदीस में प्रमाणित मूल पेशीनगोई से अलग रहनी चाहिए।

इसलिए घटना का सबसे मज़बूत सार्वजनिक निष्कर्ष सीमित और स्पष्ट है: नबी ﷺ ने हसन रज़ियल्लाहु अन्हु के ज़रिए मुसलमानों के दो बड़े समूहों में सुलह की पेशीनगोई की, और सहीह बुख़ारी बाद की वह रिवायत सुरक्षित रखती है जिसमें हसन ने वास्तव में सुलह कर ली। प्रमाणित साक्ष्य इस पेशीनगोई और उसके पूरे होने के संबंध को समर्थित करते हैं, लेकिन अप्रमाणित समझौता-शर्तें या बाद की हर राजनीतिक बहस पर पक्षपाती निर्णय इस प्रमाण का हिस्सा नहीं हैं।

निष्कर्ष

प्रमाणित रिवायत नबी ﷺ की यह पेशीनगोई भी सुरक्षित रखती है कि अल्लाह हसन रज़ियल्लाहु अन्हु के ज़रिए मुसलमानों के दो बड़े समूहों में सुलह कराएगा, और बाद में हसन द्वारा की गई सुलह भी। पेशीनगोई से उसके पूरे होने तक का यही दस्तावेज़ी क्रम इस घटना का सबसे मज़बूत सिद्ध परिणाम है।

स्रोत

Sahih al-Bukhari 3746, Book 62, Hadith 91
Sahih al-Bukhari 2704, Book 53, Hadith 14
Sahih al-Bukhari 2704, Book 53, Hadith 14
Sunan an-Nasa'i 1410, Book 14, Hadith 47
Sunan Abi Dawud 4662, Book 42, Hadith 67
Sahih al-Bukhari 2704
Sahih al-Bukhari 2704
Sahih al-Bukhari 2704
Sahih al-Bukhari 2704
Sahih al-Bukhari 2704, concluding chain note
Sahih al-Bukhari 3746
Sahih al-Bukhari 7109, Book 92, Hadith 56
Jami' at-Tirmidhi 3773
Sunan an-Nasa'i 1410
Sunan Abi Dawud 4662
Ibn Kathir, al-Bidaya wa al-Nihaya, Khilafat al-Hasan ibn Ali; discussion of 40/41 AH
Ibn Kathir, al-Bidaya wa al-Nihaya, events of 41 AH
CAND-0101 Task 1 evidence synthesis