सअद इब्न मुआज़

PER-000401 सहाबी / सहाबिया संभावित साझा कब्रिस्तान बिंदु साझा ऐतिहासिक दायरा
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सअद इब्न मुआज़ रज़ियल्लाहु अन्हु बनू अब्द अल-अशहल के सरदार, औस के बड़े नेताओं में से एक और आरंभिक मुस्लिम मदीना के अत्यंत प्रभावशाली अंसारी नेतृत्वकर्ताओं में थे। शास्त्रीय सीरत उनके इस्लाम स्वीकार करने को हिजरत से पहले मुसअब इब्न उमैर रज़ियल्लाहु अन्हु की दावत से जोड़ती है; सअद के इस्लाम स्वीकार करने के बाद बनू अब्द अल-अशहल में इस्लाम तेज़ी से फैला। बाद में उन्होंने बद्र, उहुद और ख़ंदक में भाग लिया और अंसार के प्रमुख राजनीतिक तथा सैन्य नेताओं में शामिल हुए। ग़ज़वा-ए-ख़ंदक ने मदीना को बहुत कठोर दबाव में डाल दिया। क़ुरआन बताता है कि दुश्मन अलग-अलग दिशाओं से आ गए, निगाहें भय से फिर गईं, दिल गलों तक पहुँच गए और ईमान वालों को ज़ोर से झकझोर दिया गया। सहीह बुख़ारी खंदक खोदते समय ठंड, थकान और भूख का वर्णन करती है, और जाबिर रज़ियल्लाहु अन्हु की रिवायत में है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने तीन दिन से भोजन न मिलने के कारण पेट पर पत्थर बाँधा हुआ था। शास्त्रीय तफ़सीर बताती है कि संकट उस समय और गंभीर हो गया जब बनू क़ुरैज़ा ने, जिनका नबी से समझौता था, वह समझौता तोड़कर अहज़ाब का साथ दिया; इस तरह खंदक के सामने मौजूद विशाल दुश्मन सेना के साथ मदीना की दूसरी दिशा से भी खतरा पैदा हो गया। इसी युद्ध में सअद की बाँह की मध्य शिरा में तीर लगा और नबी ने उनकी देखभाल के लिए मस्जिद में तंबू लगवाया। अहज़ाब के लौट जाने के बाद बनू क़ुरैज़ा का घेराव हुआ और अंततः उन्होंने सअद इब्न मुआज़ रज़ियल्लाहु अन्हु की मध्यस्थता स्वीकार करके समर्पण किया। बनू क़ुरैज़ा का औस के साथ पुराना गठबंधन यह समझने में सहायता देता है कि औस के सरदार सअद को निर्णायक क्यों स्वीकार किया गया। सहीह बुख़ारी और सहीह मुस्लिम उनका निर्णय सीधे सुरक्षित रखती हैं: उनके युद्ध करने वाले लोगों को मारा जाए और उनकी महिलाओं तथा बच्चों को बंदी बनाया जाए; नबी ने इस निर्णय की पुष्टि की। इस निर्णय को उसी तत्काल सैन्य संदर्भ में समझना अधिक उचित है—मदीना का घेराव, संकट के समय समझौते का टूटना, समर्पण और स्वीकार की गई मध्यस्थता। बाद के अनावश्यक संख्यात्मक विवरण मूल घटना समझने के लिए आवश्यक नहीं हैं। बाद में खंदक का घाव फिर खुला और पाँच हिजरी में सअद की मृत्यु का कारण बना। सहीह बुख़ारी में यह प्रसिद्ध कथन भी सुरक्षित है कि सअद इब्न मुआज़ की मृत्यु पर अर-रहमान का अर्श हिल उठा।
जन्म

सअद इब्न मुआज़ की सटीक जन्म तिथि भरोसेमंद रूप से स्थापित नहीं है। शास्त्रीय जीवनी सामग्री बताती है कि ५ हिजरी में मृत्यु के समय उनकी आयु लगभग सैंतीस वर्ष थी। यह आयु केवल हिजरत से पहले की अनुमानित जन्म-गणना देती है और किसी सटीक ग्रेगोरियन जन्म तिथि को उचित नहीं ठहराती। इसलिए किसी विशेष दिन या महीने को निश्चित जन्म तिथि के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए।

निधन

सअद इब्न मुआज़ की मृत्यु ५ हिजरी में मदीना में उस घाव के कारण हुई जो उन्हें ख़ंदक की लड़ाई में लगा था। सहीह अल-बुख़ारी बाँह की मध्य शिरा की चोट और बाद के घातक रक्तस्राव को दर्ज करती है। शास्त्रीय कालक्रम उनकी मृत्यु को बनू क़ुरैज़ा की मध्यस्थता के कुछ समय बाद, लगभग ज़ुल-क़ादा के अंत या ज़ुल-हिज्जा ५ हिजरी की शुरुआत में रखता है। सामान्य जीवनी आयु लगभग सैंतीस वर्ष बताई जाती है, लेकिन मृत्यु का सटीक दिन भरोसेमंद रूप से स्थापित नहीं।

दफ़न या संबद्ध स्थान

स्थान का प्रकार: साझा क़ब्रिस्तान से प्रमाणित संबंध; व्यक्तिगत क़ब्र का सटीक बिंदु स्थापित नहीं। सअद इब्न मुआज़ को मदीना के जन्नत अल-बक़ी में दफ़न किया गया। इब्न सअद और अल-ज़हबी ऐसी रिवायतें सुरक्षित रखते हैं कि पैग़म्बर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उन पर नमाज़ पढ़ी और सहाबा वहाँ उनके दफ़न में शामिल हुए। क़ब्रिस्तान की पहचान मज़बूत है, लेकिन कोई भरोसेमंद आधुनिक प्रमाण जन्नत अल-बक़ी के भीतर सअद की व्यक्तिगत क़ब्र की सटीक स्थिति अलग से निर्धारित नहीं करता। इसलिए इस प्रोफ़ाइल में किसी भी संरचित नक़्शा संदर्भ को केवल जन्नत अल-बक़ी को साझा क़ब्रिस्तान स्थान के रूप में दिखाना चाहिए, सअद की सटीक क़ब्र के रूप में नहीं।

जीवनी और ऐतिहासिक परिचय

सअद इब्न मुआज़ रज़ियल्लाहु अन्हु औस के अंसारी नेता, विशेष रूप से बनू अब्द अल-अशहल के प्रमुख थे, और सामान्यतः सअद इब्न मुआज़ इब्न अल-नुमान तथा कुनियत अबू अम्र से पहचाने जाते हैं। मदीना में उनका स्थान इस्लाम से पहले भी था, और बाद के मुस्लिम स्रोत उन्हें औस के मुख्य सरदारों में याद करते हैं।

उनका निकट परिवार असाधारण रूप से अच्छी तरह दर्ज है। उनके पिता मुआज़ इब्न अल-नुमान, माता कबशा बिन्त राफ़िअ और इब्न सअद के अनुसार पत्नी हिन्द बिन्त सिमाक इब्न अतीक थीं। दो पुत्र, अम्र और अब्दुल्लाह, सुरक्षित रूप से नामित हैं। बेटियों की कोई पूर्ण सूची स्थापित नहीं हुई।

सअद का इस्लाम स्वीकार करना हिजरत से पहले यसरिब में मुसअब इब्न उमैर के निर्णायक मिशन से संबंधित है। शास्त्रीय सीरत में उसैद इब्न हुदैर और सअद द्वारा मुसअब की शिक्षा सुनने, इस्लाम स्वीकार करने और फिर सअद द्वारा अपने क़बीले से बात करने का वर्णन है। बताया गया है कि उनके इस्लाम के बाद बनू अब्द अल-अशहल ने व्यापक रूप से इस्लाम स्वीकार किया। सटीक भाषण सीरत की रिवायत का हिस्सा हैं, लेकिन इस्लाम स्वीकार करने का परिवेश और उसके बाद सअद की नेतृत्व भूमिका शास्त्रीय जीवनी में अच्छी तरह स्थापित है।

उनके इस्लाम स्वीकार करने ने पैग़म्बर की हिजरत से पहले मदीनी समाज के संतुलन को बदलने में मदद की। औस के बड़े नेता के रूप में सअद ने उभरते मुस्लिम गठबंधन को सामाजिक शक्ति दी और शहर के केंद्रीय अंसारी व्यक्तियों में से एक बन गए।

शास्त्रीय जीवनी स्रोत सअद को बद्र, उहुद और ख़ंदक में उपस्थित बताते हैं। इन अभियानों में उनकी भागीदारी अंसार के बीच उनके नेतृत्व और मदीनी समुदाय की सैन्य रक्षा में उनकी प्रत्यक्ष भूमिका दोनों को दर्शाती है।

ग़ज़वा-ए-ख़ंदक उनके जीवन के अंतिम दौर का सबसे कठिन संकट था। एक विशाल संयुक्त सेना मदीना के विरुद्ध इकट्ठी हुई, जबकि खंदक ने खुले भाग से घुड़सवार और पैदल सैनिकों का प्रवेश रोक दिया। क़ुरआन इस क्षण को अत्यंत प्रभावशाली शब्दों में बताता है: खतरे अलग-अलग दिशाओं से आए, निगाहें भय से फिर गईं, दिल गलों तक पहुँच गए और ईमान वालों को कठोर परीक्षा में डालकर ज़ोर से झकझोर दिया गया।

कठिनाई केवल मानसिक नहीं बल्कि शारीरिक भी थी। सहीह बुख़ारी बताती है कि मुहाजिर और अंसार ठंडी सुबह में खंदक खोद रहे थे और थकान तथा भूख का सामना कर रहे थे। दूसरी रिवायत में जाबिर रज़ियल्लाहु अन्हु बताते हैं कि खंदक खोदते समय नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने तीन दिन से भोजन न मिलने के कारण पेट पर पत्थर बाँधा हुआ था। इस प्रकार रक्षकों को ठंड, कठिन श्रम, भोजन की कमी और लगातार सैन्य चौकसी एक साथ सहनी पड़ रही थी।

शास्त्रीय तफ़सीर क़ुरआन के बताए भय के पीछे एक और गंभीर सैन्य खतरा स्पष्ट करती है। बनू क़ुरैज़ा का नबी के साथ समझौता था और उनके क़िले मदीना की दूसरी दिशा में थे। इब्न कसीर के अनुसार घेराव के दौरान उन्होंने समझौता तोड़कर अहज़ाब की सहायता की। जब मुख्य दुश्मन सेना पहले ही खंदक के सामने थी और महिलाएँ तथा बच्चे शहर के सुरक्षित क़िलाबंद भागों में थे, तब दूसरी दिशा से शत्रुता की संभावना संकट को बहुत अधिक गंभीर बनाती थी।

इसी ग़ज़वा-ए-ख़ंदक में सअद को तीर लगा जो उनकी बाँह की मध्य शिरा में लगा। सहीह बुख़ारी बताती है कि नबी ने मस्जिद में उनके लिए तंबू लगवाया ताकि पास रहकर उनकी देखभाल की जा सके। घाव गंभीर रहा और बाद में यही उनकी मृत्यु का सीधा कारण बना।

अहज़ाब की सेना के लौटने से मदीना का बाहरी घेराव समाप्त हुआ, लेकिन बनू क़ुरैज़ा का मामला शेष था। क़ुरआन सूरह अहज़ाब की आयत २६–२७ में अहले किताब के उस समूह के परिणाम का उल्लेख करता है जिसने अहज़ाब की सहायता की, हालाँकि सअद का नाम नहीं लेता। इसके बाद बनू क़ुरैज़ा का घेराव हुआ और अंततः उन्होंने समर्पण करके सअद इब्न मुआज़ रज़ियल्लाहु अन्हु के निर्णय को स्वीकार किया। शास्त्रीय स्रोत बताते हैं कि बनू क़ुरैज़ा इस्लाम से पहले औस के सहयोगी थे और सअद औस के सरदार थे, इसलिए उनका मामला सअद के सामने रखना उस समय के क़बीलाई संबंधों के अनुसार समझ में आने वाला चुनाव था।

सअद को उसी अवस्था में लाया गया जब वे खंदक के घाव से पीड़ित थे। सहीह बुख़ारी और सहीह मुस्लिम के अनुसार नबी ने अंसार से कहा कि अपने सरदार के लिए खड़े हो जाओ, फिर सअद को बताया कि बनू क़ुरैज़ा उनके निर्णय पर उतरे हैं। सअद ने निर्णय दिया कि उनके युद्ध करने वाले लोगों को मारा जाए और उनकी महिलाओं तथा बच्चों को बंदी बनाया जाए, और नबी ने इस निर्णय की पुष्टि की। इस निर्णय को उस पूरे क्रम के भीतर रखना अधिक स्पष्ट है जिसे स्रोत सुरक्षित रखते हैं: मदीना एक विशाल संयुक्त सेना के घेराव में था, रक्षक भय, भूख और थकान का सामना कर रहे थे, उसी सैन्य संकट में एक मौजूदा समझौता टूटा, फिर बाहरी सेना लौट गई, बनू क़ुरैज़ा ने समर्पण किया और उन्होंने स्वयं सअद की मध्यस्थता स्वीकार की। सबसे मज़बूत हदीसी शब्द युद्ध करने वालों के बारे में हैं; बाद की संख्यात्मक रिवायतें मूल घटना समझने के लिए आवश्यक नहीं हैं।

सअद का घाव स्थायी रूप से नहीं भरा। सहीह अल-बुख़ारी जारी रक्तस्राव का वर्णन करती है, और शास्त्रीय कालक्रम उनकी मृत्यु को बनू क़ुरैज़ा के निर्णय के कुछ समय बाद ५ हिजरी में रखता है। इसलिए ख़ंदक में लगा वही घाव उनकी मृत्यु का सीधा कारण बना।

उनकी मृत्यु से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध रिवायत सहीह अल-बुख़ारी में सुरक्षित है: पैग़म्बर ने कहा कि सअद इब्न मुआज़ की मृत्यु पर अर-रहमान का अर्श हिल उठा। तिर्मिज़ी अंतिम संस्कार के संदर्भ में समान रिवायत देते हैं और उसे हसन सहीह कहते हैं। यह रिवायत सअद के फ़ज़ाइल की प्रामाणिक परंपरा का हिस्सा है और इसे बाद की संत-कथा तक सीमित नहीं करना चाहिए।

शास्त्रीय जीवनी साहित्य मृत्यु के समय उनकी आयु लगभग सैंतीस वर्ष भी बताता है। इससे केवल हिजरत से पहले की अनुमानित जन्म-गणना संभव है; इसे किसी सटीक आधुनिक जन्म तिथि में नहीं बदला जाना चाहिए।

सअद का जनाज़ा सहाबा के बीच एक बड़ा सार्वजनिक अवसर माना गया। इब्न सअद और अल-ज़हबी ऐसी रिवायतें देते हैं कि पैग़म्बर ने उन पर नमाज़ पढ़ी और सहाबा उनकी तैयारी तथा क़ब्र में उतरने में शामिल हुए।

उनकी दफ़नगाह मदीना के जन्नत अल-बक़ी से मज़बूती से जुड़ी है। यह क़ब्रिस्तान-स्तरीय पहचान कई शास्त्रीय रिवायतों से समर्थित है और किसी बची हुई व्यक्तिगत चिन्हित क़ब्र के दावे से कहीं अधिक मज़बूत है।

समीक्षा किए गए स्रोतों से अल-बक़ी के भीतर सअद की क़ब्र का सटीक बिंदु भरोसेमंद रूप से पुनःस्थापित नहीं किया जा सकता। इसलिए ऐतिहासिक रूप से ज़िम्मेदार निष्कर्ष साफ़ है: सअद इब्न मुआज़ जन्नत अल-बक़ी में दफ़न हुए, पर उनकी व्यक्तिगत क़ब्र की ठीक जगह अज्ञात है।

ऐतिहासिक महत्व और विरासत

सअद इब्न मुआज़ की ऐतिहासिक महत्ता का एक कारण यह है कि उनके इस्लाम स्वीकार करने ने हिजरत से पहले यसरिब की धार्मिक और राजनीतिक संरचना बदलने में मदद की। औस के बड़े नेता और बनू अब्द अल-अशहल के प्रमुख के रूप में उनके इस्लाम ने प्रारंभिक मुस्लिम समुदाय को शक्तिशाली सामाजिक समर्थन दिया और उनकी क़ौम में इस्लाम के प्रसार को तेज़ किया।

बद्र, उहुद और खंदक में उनकी भागीदारी ने उन्हें मदीनी काल के बड़े सैन्य संघर्षों के केंद्र में रखा। विशेष रूप से खंदक उन्हें समझने के लिए निर्णायक है: क़ुरआन अत्यधिक भय की तस्वीर देता है, जबकि सहीह हदीसें रक्षकों की भूख, ठंड और थकान सुरक्षित रखती हैं। सअद का अपना गंभीर घाव भी उसी शहर-रक्षा के दौरान लगा, इसलिए उनके जीवन का अंतिम दौर सीधे मदीना के घेराव के संकट से जुड़ गया।

बनू क़ुरैज़ा की मध्यस्थता को इसी सैन्य संकट के बाद का चरण समझना चाहिए, किसी अलग-थलग न्यायिक घटना के रूप में नहीं। शास्त्रीय तफ़सीर उनके समझौते के टूटने को अहज़ाब के घेराव के भीतर रखती है, जबकि बुख़ारी और मुस्लिम उनके सअद के निर्णय पर समर्पण और युद्ध करने वालों तथा उनके आश्रितों के बारे में सअद के फ़ैसले को सीधे स्थापित करती हैं। इस क्रम में घटना पढ़ने से सअद की भूमिका और निर्णय की ऐतिहासिक गंभीरता कहीं अधिक स्पष्ट होती है।

उनकी मृत्यु पर अर-रहमान के अर्श के हिलने की रिवायत सअद को सहाबा के फ़ज़ाइल की प्रामाणिक साहित्यिक परंपरा में विशिष्ट स्थान देती है। क्योंकि शब्द सहीह अल-बुख़ारी में सुरक्षित और अन्य स्रोतों से समर्थित हैं, यह उनकी मरणोत्तर स्मृति की सबसे मज़बूत स्रोत-परत से संबंधित है।

अंततः, जन्नत अल-बक़ी में उनकी प्रमाणित दफ़नगाह उन्हें मदीना के सबसे प्रारंभिक पवित्र क़ब्रिस्तान से जोड़ती है। आज उनकी व्यक्तिगत क़ब्र का सटीक बिंदु न पहचाना जा सकना भी ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण है: किसी साझा क़ब्रिस्तान से संबंध सुरक्षित हो सकता है, भले उसके भीतर किसी व्यक्ति की क़ब्र की जगह समय के साथ खो जाए।

पारिवारिक संबंध

स्रोत

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Sahih/Rijal narrator dossier | Sunnah.com | Sa'd ibn Mu'adh narrator 17772 | https://sunnah.com/narrator/17772 | सटीक पहचान, माता, युद्ध, घातक घाव, बनू क़ुरैज़ा और प्रामाणिक रिवायतों का समेकित रिजाल प्रमाण
Project Miracle Master Person Map | Internal project registry | CAND-0098 / PER-000401 | internal project registry | परियोजना में सअद इब्न मुआज़ और उनकी मृत्यु पर अर्श हिलने की पैग़म्बरी रिवायत की सटीक पहचान-मिलान
Project Jannat al-Baqi cemetery anchor | PERSON-V4 geography standard | Jannat al-Baqi shared cemetery point | https://www.google.com/maps?q=24.467120610807285,39.61336728379692 | केवल जन्नत अल-बक़ी साझा क़ब्रिस्तान संदर्भ-बिंदु; किसी व्यक्तिगत क़ब्र का सटीक निर्देशांक नहीं
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Sahih al-Bukhari | Muhammad ibn Isma'il al-Bukhari | Hadith 4099, Book of Maghazi | https://sunnah.com/bukhari:4099 | cold, exhaustion and hunger while the Muhajirun and Ansar dug the trench
Sahih al-Bukhari | Muhammad ibn Isma'il al-Bukhari | Hadith 4101, Book of Maghazi | https://sunnah.com/bukhari:4101 | Jabir reports three days without food during the trench digging and the Prophet tying a stone to his stomach
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