पुरानी जीवनी परंपरा हज़रत उस्मान इब्न अफ़्फ़ान रज़ियल्लाहु अन्हु का जन्म क़ुरैश के प्रतिष्ठित बनू उमय्या घराने में आमुल-फ़ील के लगभग छह वर्ष बाद रखती है। यह काल-निर्धारण जीवनी परंपरा का अनुमान है।
उस्मान इब्न अफ़्फ़ान
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हज़रत उस्मान इब्न अफ़्फ़ान रज़ियल्लाहु अन्हु मदीना में ज़िलहिज्जा ३५ हिजरी के एक शुक्रवार को शहीद हुए। सबसे अधिक प्रचलित रिवायत महीने की अठारहवीं तारीख़ बताती है, हालाँकि कुछ रिवायतें अलग हैं। उनकी आयु के बारे में भी पुराने स्रोतों में मतभेद सुरक्षित हैं।
प्रारंभिक दफ़्न-विवरण कहते हैं कि थोड़े लोगों ने रात में उस्मान रज़ियल्लाहु अन्हु के पार्थिव शरीर को उठाया और उस समय बक़ीअ अल-ग़रक़द के प्रसिद्ध भाग में दफ़्न करने से रोके जाने के बाद हश्श क़ौकब में दफ़्न किया। जनाज़े की नमाज़ पढ़ाने वाले और उपस्थित लोगों की संख्या पर रिवायतें अलग हैं। समहूदी ने मदीना के पुराने भूगोल की वे रिवायतें सुरक्षित कीं जिनमें हश्श क़ौकब को बक़ीअ के पूर्वी भाग से लगा बाग़ बताया गया है; मुआविया रज़ियल्लाहु अन्हु के समय उमवियों ने बीच की सीमा हटाकर उसे क़ब्रिस्तान में मिला दिया। बाद के विस्तारों से यह स्थान आज के बक़ीअ के भीतर आ गया, जहाँ एक अपेक्षाकृत अलग और स्पष्ट क़ब्र उस्मान की दफ़्नगाह के रूप में प्रसिद्ध है और यात्रियों को दिखाई जाती है। दिए गए निर्देशांक इसी वर्तमान मान्य ज़ियारती स्थान को दर्ज करते हैं; यह पहचान हश्श क़ौकब की मज़बूत दफ़्न-परंपरा और निरंतर भौगोलिक पहचान पर आधारित है, किसी नए स्वतंत्र पुरातात्त्विक उत्खनन के दावे पर नहीं।
जीवनी और ऐतिहासिक परिचय
उनके पिता अफ़्फ़ान इब्न अबी अल-आस और माता अरवा बिन्त कुरैज़ थीं। अरवा की माता उम्म हकीम अल-बैदा बिन्त अब्दुल-मुत्तलिब, पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की फूफी थीं; इस प्रकार उस्मान का मातृ-दादी के माध्यम से बनू हाशिम से संबंध था। वे प्रतिष्ठित और संपन्न परिवार में पले तथा व्यापार में समृद्धि और अच्छे व्यवहार के लिए पहचाने गए। जीवनी-स्रोत उन्हें पढ़ना-लिखना जानने वाला और जाहिलीयत की अनेक निंदित आदतों से दूर बताते हैं। उन्होंने बहुत आरंभिक समय में अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु अन्हु के आह्वान पर इस्लाम स्वीकार किया और परिवार के दबाव के बावजूद अपने विश्वास पर दृढ़ रहे।
उस्मान ने पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और ख़दीजा रज़ियल्लाहु अन्हा की पुत्री रुक़य्या से विवाह किया। मुसलमानों पर अत्याचार बढ़ने पर दोनों हबशा गए और सीरत-ग्रंथ उन्हें उन लोगों में गिनते हैं जिन्होंने हबशा तथा मदीना, दोनों हिजरतें कीं। बद्र से ठीक पहले रुक़य्या बीमार हुईं, इसलिए पैग़म्बर ने उस्मान को मदीना में रहकर उनकी देखभाल करने का आदेश दिया; विजय का समाचार आने वाले दिन ही उनका निधन हो गया। युद्ध में उपस्थित न होने पर भी पैग़म्बर ने उस्मान के लिए बद्र का हिस्सा और योद्धा का प्रतिफल निर्धारित किया। बाद में उनका विवाह रुक़य्या की बहन उम्म कुलसूम से हुआ और इन्हीं क्रमिक विवाहों के कारण वे ज़ुन्नूरैन कहलाए।
सहीह अल-बुख़ारी में अब्दुल्लाह इब्न उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा द्वारा उन तीन घटनाओं का स्पष्टीकरण सुरक्षित है जिन्हें बाद के राजनीतिक विवाद में उस्मान के विरुद्ध उठाया गया। उहुद की अव्यवस्था में उनका पीछे हटना उन लोगों के लिए आए कुरआनी क्षमा-वचन के अंतर्गत था; बद्र से अनुपस्थिति रुक़य्या की सेवा के लिए पैग़म्बरी आदेश का पालन थी; और बैअत-ए-रिज़वान के समय वे इसलिए मौजूद नहीं थे कि मुसलमानों के प्रतिनिधि बनकर मक्का भेजे गए थे। उनकी शहादत की ख़बर पर पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपना एक हाथ दूसरे पर रखकर उसे उस्मान की ओर से बैअत कहा। इससे स्पष्ट होता है कि बाद में दोष कहे गए कुछ प्रसंग वास्तव में पैग़म्बरी दायित्व या स्पष्ट रूप से क्षमित घटना थे।
उनकी सबसे प्रसिद्ध आर्थिक सेवाएँ समूचे समुदाय की आवश्यकताओं से जुड़ी थीं। मुस्नद अहमद और जामिअ अल-तिर्मिज़ी की रिवायतें उन्हें बीर-ए-रूमा को मुसलमानों के उपयोग में देने, मस्जिद-ए-नबवी के विस्तार के लिए भूमि खरीदने और तबूक के जैश अल-उसरा को सुसज्जित करने से जोड़ती हैं। बाद की रिवायतों में ठीक संख्याओं पर मतभेद है, पर इन सेवाओं का मूल तथ्य स्थापित है। सहीह मुस्लिम ने पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का यह कथन सुरक्षित रखा है कि फ़रिश्ते भी उस्मान से हया करते हैं, और सहीह अल-बुख़ारी ने जन्नत की शुभ सूचना के साथ आने वाली कठिन परीक्षा का संकेत सुरक्षित रखा है.
उस्मान ने पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम, अबू बक्र और उमर रज़ियल्लाहु अन्हुम से हदीसें बयान कीं। उनके पुत्र अबान, सईद और अम्र, मुक्तदास हुमरान तथा कई सहाबा और ताबिईन ने उनसे रिवायत की। प्राचीन जीवनीकार उन्हें सावधानी से कुरआन पढ़ने, हया, उदारता और कोमल स्वभाव से जोड़ते हैं, हालांकि हर व्यक्तिगत इबादती कथा समान रूप से मज़बूत नहीं है। उनकी प्रसिद्ध पत्नियाँ रुक़य्या, उम्म कुलसूम, फ़ाख़िता बिन्त ग़ज़वान, उम्म अम्र बिन्त जुन्दुब, फ़ातिमा बिन्त वलीद, उम्म अल-बनीन बिन्त उयैना, रमला बिन्त शैबा और नाइला बिन्त फ़राफ़िसा थीं। वंशावली-स्रोत रुक़य्या से अब्दुल्लाह अल-अकबर; फ़ाख़िता से अब्दुल्लाह अल-असग़र; उम्म अम्र से अम्र, ख़ालिद, अबान, उमर और मरयम; फ़ातिमा से वलीद, सईद और उम्म सईद; उम्म अल-बनीन से अब्दुल-मलिक; तथा रमला से आयशा, उम्म अबान और उम्म अम्र का नाम लेते हैं। नाइला से मरयम या अनबसा और कुछ अन्य संतानों के संबंध में मतभेद है, इसलिए कुल संख्या को निर्विवाद नहीं कहा जा सकता.
पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के निधन के बाद उस्मान ने अबू बक्र और उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा की खिलाफ़तों में सार्वजनिक सेवा की। उमर के घातक रूप से घायल होने पर उन्होंने छह वरिष्ठ सहाबा की शूरा को उत्तराधिकारी चुनने का दायित्व दिया। आरंभिक इतिहासों के अनुसार अब्दुर्रहमान इब्न औफ़ रज़ियल्लाहु अन्हु ने मदीना के लोगों से परामर्श किया, अली और उस्मान से चर्चा की, और फिर अल्लाह की किताब, पैग़म्बर की सुन्नत तथा पहले दो खलीफ़ाओं की नीति पर चलने की शर्त के साथ उस्मान की बैअत की। उनकी खिलाफ़त तेईस हिजरी के अंत में आरंभ हुई और लगभग बारह वर्ष चली। उन्हें बढ़ती सेनाओं, छावनी-नगरों, धन और विविध प्रांतों वाला राज्य मिला, जिसकी जटिलता पहले दशक से बहुत अधिक थी।
उनके शासन में ईरान, आर्मीनिया, अज़रबैजान और सीमांत क्षेत्रों में अभियान जारी रहे तथा मुस्लिम सत्ता पश्चिम की ओर उत्तर अफ्रीका तक फैली। केंद्र की सावधान अनुमति से आरंभ हुई समुद्री कार्रवाइयाँ क़ुब्रुस पहुँचीं और अंततः ज़ातुस-सवारी के युद्ध में बीज़न्तीनी बेड़े से बड़ी मुठभेड़ हुई। विस्तार ने धन, व्यापारिक मार्ग और नए प्रशासनिक दायित्व दिए, पर मदीना और प्रांतीय राज्यपालों तथा सेनाओं के बीच दूरी भी बढ़ाई। इसलिए इस युग को केवल विजयों की श्रृंखला कहना अधूरा है; यह तीव्र परिवर्तन वाले विशाल भूभाग को नियंत्रित करने की प्रारंभिक संस्थाओं की क्षमता की परीक्षा भी था।
उनका सबसे स्थायी संस्थागत कार्य कुरआन के मानक मुसहफ़ तैयार कराकर प्रमुख प्रदेशों में भेजना था। सहीह अल-बुख़ारी के अनुसार आर्मीनिया और अज़रबैजान के अभियानों में शाम और इराक़ के सैनिकों के बीच क़िराअत-विवाद देखकर हुज़ैफ़ा इब्न अल-यमान रज़ियल्लाहु अन्हु ने उस्मान से उम्मत को किताब पर विभाजित होने से पहले संभालने की विनती की। उस्मान ने अबू बक्र के समय संकलित और हफ़्सा रज़ियल्लाहु अन्हा के पास सुरक्षित पन्ने मंगाए तथा ज़ैद इब्न साबित, अब्दुल्लाह इब्न ज़ुबैर, सईद इब्न अल-आस और अब्दुर्रहमान इब्न हारिस इब्न हिशाम को प्रतियाँ तैयार करने का दायित्व दिया। भाषाई मतभेद पर कुरैश की बोली अपनाने, मानक प्रतियाँ भेजने और विवाद बढ़ाने वाली असंगत निजी सामग्री हटाने का आदेश दिया गया; मूल पन्ने हफ़्सा को लौटा दिए गए।
उनकी खिलाफ़त के अंतिम वर्षों में राज्यपालों, सत्ता तक पहुँच, संसाधनों के वितरण और रिश्तेदारों तथा प्रांतीय अभिजात वर्ग के प्रभाव पर शिकायतें बढ़ीं। आरोप और बचाव की सभी रिवायतें समान स्तर की नहीं हैं; कुछ आरंभिक हैं, कुछ बहुत बाद की, और कई पर बाद के राजनीतिक संघर्षों की छाप है। मिस्र, कूफ़ा और बसरा से समूह मदीना आए, खलीफ़ा और प्रतिनिधियों के बीच बातचीत और वादे हुए, फिर तनाव उनके घर के घेराव में बदल गया। अनेक रिवायतें बताती हैं कि सहायता बुलाने की क्षमता होते हुए भी उस्मान ने मुसलमानों को अपनी रक्षा में मदीना के भीतर युद्ध शुरू करने से रोका और बढ़ते निजी खतरे के बावजूद सामूहिक रक्तपात से बचना चुना।
उस्मान रज़ियल्लाहु अन्हु मदीना में पैंतीस हिजरी के ज़िलहिज्जा महीने के एक शुक्रवार को शहीद हुए; सबसे प्रसिद्ध तारीख़ अठारह ज़िलहिज्जा है, हालांकि कुछ रिवायतें अलग हैं। उनकी आयु के अधिकतर कथन अस्सी के दशक में आते हैं, किंतु स्रोत कई संख्याएँ देते हैं। प्रसिद्ध विवरण के अनुसार घेराव करने वाले लोग घर में घुसे और कुरआन की तिलावत के समय उन्हें शहीद कर दिया; उनकी पत्नी नाइला उन्हें बचाते हुए घायल हुईं। मुख्य आक्रमणकारियों की पहचान पर गंभीर मतभेद है, इसलिए विवादित नामों को निश्चित नहीं कहा गया। उनकी शहादत अपेक्षाकृत स्थिर विस्तार के युग और प्रथम बड़े राजनीतिक संकट के आरंभ के बीच निर्णायक मोड़ बनी।
प्रारंभिक दफ़्न-विवरण कहते हैं कि थोड़े लोगों ने रात में उस्मान रज़ियल्लाहु अन्हु के पार्थिव शरीर को उठाया और उस समय बक़ीअ अल-ग़रक़द के प्रसिद्ध भाग में दफ़्न करने से रोके जाने के बाद हश्श क़ौकब में दफ़्न किया। जनाज़े की नमाज़ पढ़ाने वाले और उपस्थित लोगों की संख्या पर रिवायतें अलग हैं। समहूदी ने मदीना के पुराने भूगोल की वे रिवायतें सुरक्षित कीं जिनमें हश्श क़ौकब को बक़ीअ के पूर्वी भाग से लगा बाग़ बताया गया है; मुआविया रज़ियल्लाहु अन्हु के समय उमवियों ने बीच की सीमा हटाकर उसे क़ब्रिस्तान में मिला दिया। बाद के विस्तारों से यह स्थान आज के बक़ीअ के भीतर आ गया, जहाँ एक अपेक्षाकृत अलग और स्पष्ट क़ब्र उस्मान की दफ़्नगाह के रूप में प्रसिद्ध है और यात्रियों को दिखाई जाती है। दिए गए निर्देशांक इसी वर्तमान मान्य ज़ियारती स्थान को दर्ज करते हैं; यह पहचान हश्श क़ौकब की मज़बूत दफ़्न-परंपरा और निरंतर भौगोलिक पहचान पर आधारित है, किसी नए स्वतंत्र पुरातात्त्विक उत्खनन के दावे पर नहीं।
ऐतिहासिक महत्व और विरासत
उनकी सबसे बड़ी विद्वतापूर्ण और सभ्यतागत विरासत उस्मानी मुसहफ़ की योजना है। हफ़्सा रज़ियल्लाहु अन्हा के पास सुरक्षित पहले संकलन को आधार बनाकर, ज़ैद इब्न साबित सहित समिति नियुक्त करके और प्रमुख क्षेत्रों में सार्वजनिक मानक प्रतियाँ भेजकर उन्होंने विविध सेनाओं के बीच वास्तविक पाठ-विवाद का समाधान किया। इस कार्य ने प्रमुख प्रदेशों के लिए कुरआनी लिखित पाठ का एक साझा सार्वजनिक संदर्भ स्थापित किया। इसी कारण उनका नाम लिखित मानक की एकता, कुरआन की शिक्षा, पांडुलिपि-संस्कृति और अरबी लिपि के दृश्य इतिहास से स्थायी रूप से जुड़ा है। समिति की प्रक्रिया भी आरंभिक सामूहिक पद्धति का उदाहरण है: प्रमाणित अभिलेख मंगाना, योग्य लेखकों को नियुक्त करना, भाषाई मतभेद का नियम तय करना और नियंत्रित संदर्भ प्रतियाँ भेजना.
खलीफ़ा के रूप में उस्मान ने एक अपेक्षाकृत संकुचित विजयी राज्य से विशाल और विविध साम्राज्य की ओर संक्रमण का शासन संभाला। आर्मीनिया, अज़रबैजान, ईरान, उत्तर अफ्रीका और भूमध्यसागर के अभियान तथा मुस्लिम नौसेना का उभरना राज्य की रणनीतिक स्थिति बदल गए। उसी विस्तार ने राज्यपालों की नियुक्ति, संसाधन-वितरण और दूरस्थ शक्तियों पर केंद्रीय नियंत्रण के प्रश्न पैदा किए। उनकी खिलाफ़त इसलिए यह समझने के लिए महत्वपूर्ण है कि सैन्य सफलता स्वयं किस प्रकार ऐसे प्रशासनिक और सामाजिक दबाव उत्पन्न कर सकती है जिनके लिए आरंभिक संस्थाएँ पर्याप्त रूप से तैयार नहीं थीं। नौसैनिक शक्ति की ओर बढ़ना विशेष रूप से दूरगामी था, क्योंकि इससे मुस्लिम रणनीति स्थल-सीमाओं से आगे गई और नई कमान, रसद तथा प्रांतीय सहयोग की आवश्यकता बनी।
जिस संघर्ष ने उनकी खिलाफ़त समाप्त की, उसने वैध शासन, विद्रोह, सामुदायिक व्यवस्था और राजनीतिक मतभेद की नैतिकता पर बाद की मुस्लिम बहसों को आकार दिया। स्रोतों को कालक्रम और मत-पृष्ठभूमि की सावधानी से पढ़ना पड़ता है, क्योंकि बाद के पक्षों ने अपने अनुकूल रिवायतें चुनीं। फिर भी मदीना में खलीफ़ा का घेराव और शहादत प्रथम बड़े गृह-संघर्ष का द्वार बना, और युद्ध शुरू न करने का उनका निर्णय उनके ऐतिहासिक चरित्र का केंद्रीय तत्व रहा। घटना को न इतिहास-विहीन पवित्रीकरण में घटाना उचित है, न स्रोत-आलोचना के बिना आरोप में; इसे जटिल कारणों और दूरगामी परिणामों वाली राजनीतिक त्रासदी समझना चाहिए। यह प्रसंग इतिहासकारों के लिए स्थायी परीक्षा भी बना: नैतिक निर्णय स्रोत-समीक्षा का स्थान नहीं ले सकता, और स्रोत-समीक्षा राजनीतिक हिंसा की मानवीय तथा धार्मिक गंभीरता मिटा नहीं सकती।
दफ़्न-परंपरा उस्मान रज़ियल्लाहु अन्हु की स्मृति को स्पष्ट भूगोल देती है। हश्श क़ौकब पुराने बक़ीअ अल-ग़रक़द के पूर्वी भाग से लगा था और मुआविया रज़ियल्लाहु अन्हु के समय क़ब्रिस्तान में मिला दिया गया; इसलिए आज बक़ीअ के भीतर दिखाई जाने वाली अलग और स्पष्ट क़ब्र मज़बूत ऐतिहासिक दफ़्न-परंपरा और निरंतर स्थानीय पहचान के अनुकूल है। वर्तमान निर्देशांक यात्रियों को इसी प्रसिद्ध क़ब्र तक राहनुमाई करते हैं, जबकि विद्वत्तापूर्ण सावधानी निरंतर ऐतिहासिक और ज़ियारती पहचान को किसी नए स्वतंत्र पुरातात्त्विक उत्खनन के दावे से अलग रखती है। उनकी विरासत हया, उदार सार्वजनिक दान, कुरआन की रक्षा, विस्तृत शासन और आंतरिक संघर्ष की त्रासदी को जोड़ती है; उत्तरदायी स्मरण दृढ़ प्रमाण सुरक्षित रखता, मतभेद ईमानदारी से बताता और उपलब्धि तथा संकट दोनों से शिक्षा लेता है।
पारिवारिक संबंध
🌱 संतान
स्रोत
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Additional donor web reference (unpaired) | https://sunnah.com/bukhari/66/9
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