इस प्रविष्टि में अब वसीले की क़ुरआनी आयत, अंधे व्यक्ति की हदीस की अरबी दुआ और हिंदी अर्थ, तथा शैख़ अब्द अल-क़ादिर अल-जीलानी रहिमहुल्लाह से मंसूब पूरी क़ादिरी तवस्सुल की इबारत और उसका अर्थ शामिल है। ख़ुलासत अल-मफ़ाख़िर इसी इबारत से पहले एक करामत की कथा भी देती है: शैख़ के एक साथी के चीनी से लदे चार बोझ खो गए, उसने कठिनाई में शैख़ को पुकारा और फिर वे बोझ मिल गए। यह बाद की क़ादिरी मनाक़िबी रिवायत है और जरूरत पूरी होने को अल्लाह की इजाज़त से जोड़ा गया है।
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اتَّقُوا اللَّهَ وَابْتَغُوا إِلَيْهِ الْوَسِيلَةَ وَجَاهِدُوا فِي سَبِيلِهِ لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَ
हिंदी अर्थ: “ऐ ईमान वालो, अल्लाह से डरो और उसकी ओर वसीला तलाश करो।”
उस्मान इब्न हुनैफ़ रज़ियल्लाहु अन्हु की रिवायत में अंधे व्यक्ति को नबी ﷺ ने यह दुआ सिखाई, और तिर्मिज़ी ने इसे हसन सहीह ग़रीब कहा:
اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ وَأَتَوَجَّهُ إِلَيْكَ بِنَبِيِّكَ مُحَمَّدٍ نَبِيِّ الرَّحْمَةِ، إِنِّي تَوَجَّهْتُ بِكَ إِلَى رَبِّي فِي حَاجَتِي هَذِهِ لِتُقْضَى لِي، اللَّهُمَّ فَشَفِّعْهُ فِيَّ
हिंदी अर्थ: “ऐ अल्लाह, मैं तुझसे माँगता हूँ और तेरे नबी मुहम्मद, नबी-ए-रहमत के वसीले से तेरी ओर मुड़ता हूँ। मैं अपनी इस जरूरत में उनके वसीले से अपने रब की ओर आया हूँ ताकि मेरी जरूरत पूरी हो। ऐ अल्लाह, मेरे बारे में उनकी शफ़ाअत स्वीकार कर।”
क़ादिरी स्रोत में पूरी मंसूब इबारत इस तरह है:
مَنْ اسْتَغَاثَ بِي فِي كُرْبَةٍ كُشِفَتْ عَنْهُ، وَمَنْ نَادَانِي بِاسْمِي فِي شِدَّةٍ فُرِّجَتْ عَنْهُ، وَمَنْ تَوَسَّلَ بِي إِلَى اللَّهِ عَزَّ وَجَلَّ فِي حَاجَةٍ قُضِيَتْ لَهُ، وَمَنْ صَلَّى رَكْعَتَيْنِ يَقْرَأُ فِي كُلِّ رَكْعَةٍ بَعْدَ الْفَاتِحَةِ سُورَةَ الْإِخْلَاصِ إِحْدَى عَشْرَةَ مَرَّةً، وَيُصَلِّي عَلَى رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ بَعْدَ السَّلَامِ وَيَذْكُرُهُ، ثُمَّ يَخْطُو إِلَى الْعِرَاقِ إِحْدَى عَشْرَةَ خُطْوَةً، وَيَذْكُرُ اسْمِي وَيَذْكُرُ حَاجَتَهُ، فَإِنَّهَا تُقْضَى بِإِذْنِ اللَّهِ تَعَالَى.
हिंदी अर्थ: “जो मुसीबत में मुझसे फ़रियाद करे उसकी मुसीबत दूर की जाए, जो कठिनाई में मेरा नाम पुकारे उसे राहत मिले, और जो किसी जरूरत में मुझे अल्लाह अज़्ज़ व जल्ल की ओर वसीला बनाए उसकी जरूरत पूरी की जाए। जो दो रकअत नमाज़ पढ़े, हर रकअत में फ़ातिहा के बाद सूरह इख़लास ग्यारह बार पढ़े, नमाज़ के बाद रसूलुल्लाह ﷺ पर दुरूद भेजे, फिर इराक़ की ओर ग्यारह कदम चले, मेरा नाम ले और अपनी जरूरत बताए, उसकी जरूरत अल्लाह तआला की इजाज़त से पूरी की जाए।”
उसी किताब में इस इबारत से ठीक पहले एक करामत की कथा है। शैख़ के एक साथी ने बताया कि निशापुर या ख़्वारज़्म की ओर एक ख़तरनाक रास्ते में चीनी से लदे उसके चार ऊँटों के बोझ खो गए और काफ़िला आगे निकल गया। फ़ज्र के समय उसे शैख़ से मंसूब वह बात याद आई कि कठिनाई में उन्हें पुकारा जाए। उसने कहा: “ऐ शैख़ अब्द अल-क़ादिर, मेरे ऊँट!” इसके बाद उसने एक आदमी को टीले पर इशारा करते देखा। जब वह ऊपर पहुँचा तो वहाँ कोई नहीं था, लेकिन नीचे उसे अपने चारों खोए हुए बोझ मिल गए और वह उन्हें लेकर काफ़िले से जा मिला।
यह घटना बाद की क़ादिरी मनाक़िबी करामत के रूप में सुरक्षित है, शुरुआती हदीसी सनद के रूप में नहीं। इसलिए इसे केवल अक़ीदे की व्याख्या नहीं, बल्कि स्रोत में मौजूद करामत की कथा के साथ पेश किया गया है। यहाँ जरूरत अल्लाह से है, बुज़ुर्ग वसीला हैं और नतीजा अल्लाह की इजाज़त से है।
निष्कर्ष
अब यह प्रविष्टि केवल अक़ीदे की व्याख्या नहीं रही, बल्कि एक मंसूब करामत की घटना भी प्रस्तुत करती है: क़ादिरी इबारत, उसका अल्लाह-केंद्रित अर्थ, अंधे व्यक्ति की हदीस की दुआ और उसी स्रोत की खोए हुए बोझ मिलने वाली कथा साथ रखी गई हैं।
स्रोत
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