अब्दुल्लाह इब्न अल-ज़ुबैर

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अब्दुल्लाह इब्न अल-ज़ुबैर, अल-ज़ुबैर इब्न अल-अव्वाम और अस्मा बिन्त अबी बक्र के पुत्र तथा हिजरत के बाद मुहाजिरों में जन्मे पहले बालक थे। वह दूसरे गृह-संघर्ष के प्रमुख धार्मिक और राजनीतिक नेता बने, यज़ीद इब्न मुआविया की मृत्यु के बाद व्यापक क्षेत्रों में ख़लीफ़ा माने गए और मक्का से शासन किया, जब तक ७३ हिजरी / ६९२ ईस्वी में हज्जाज इब्न यूसुफ़ की घेराबंदी के दौरान मक्का में शहीद हुए। उनकी वीरता, उपासना और अंतिम प्रतिरोध मज़बूती से सुरक्षित हैं, जबकि सुन्नी, इमामी और आधुनिक ऐतिहासिक परंपराएँ उनके राजनीतिक निर्णयों का अलग मूल्यांकन करती हैं।
जन्म

उनका जन्म मदीना के पास क़ुबा में हुआ। रिवायतें शव्वाल १ हिजरी और हिजरत के लगभग बीस महीने बाद शव्वाल २ हिजरी के बीच अलग हैं, जो लगभग ६२३ या ६२४ ईस्वी के अनुरूप हैं। सहीह मुस्लिम उन्हें हिजरत के बाद मुहाजिरों में जन्मा पहला बालक बताती है।

निधन

हज्जाज की मक्का घेराबंदी के दौरान ७३ हिजरी, अर्थात ६९२ ईस्वी, में मक्का में शहीद हुए। ठीक दिन पर मतभेद है और सामान्यतः जमादी अल-अव्वल या जमादी अल-सानी में रखा जाता है।

दफ़न या संबद्ध स्थान

प्राचीन मक्की ऐतिहासिक रिवायतें बताती हैं कि शरीर नीचे उतारकर परिवार को दिए जाने के बाद अस्मा बिन्त अबी बक्र रज़ियल्लाहु अन्हा ने अपने पुत्र को ग़ुस्ल दिया और सुगंध तथा कफ़न की तैयारी की। इब्न अल-असीर और इब्न कसीर की प्रसिद्ध रिवायत दफ़न को अल-हजून में रखती है, जो आज जन्नत अल-मुअल्ला या मुअल्ला क़ब्रिस्तान कहलाने वाला प्राचीन मक्की क़ब्रिस्तान है। चूँकि पुरानी व्यक्तिगत क़ब्रों की पहचान-चिन्ह पूरे क़ब्रिस्तान में अब विश्वसनीय रूप से अलग नहीं किए जा सकते, दर्ज मानचित्र-बिंदु वर्तमान प्रसिद्ध ऐतिहासिक दफ़न क्षेत्र को दिखाता है, किसी अलग आधुनिक क़ब्र-चिन्ह को निश्चित सिद्ध नहीं करता।

जीवनी और ऐतिहासिक परिचय

अब्दुल्लाह इब्न अल-ज़ुबैर का जन्म मदीना के पास क़ुबा में हुआ। कालक्रम संबंधी रिवायतें अलग हैं: कुछ स्रोत जन्म को शव्वाल १ हिजरी में रखते हैं, जबकि एक पुरानी रिवायत इसे हिजरत के बीस महीने बाद शव्वाल २ हिजरी बताती है; ये लगभग ६२३ या ६२४ ईस्वी के अनुरूप हैं। उनके पिता अल-ज़ुबैर इब्न अल-अव्वाम, प्रमुख क़ुरैशी सहाबी, और माता अस्मा बिन्त अबी बक्र थीं। सहीह मुस्लिम बताती है कि अस्मा ने हिजरत के बाद उन्हें जन्म दिया, पैग़म्बर के पास लाईं, और पैग़म्बर ने तहनीक करके दुआ दी। वह हिजरत के बाद मुहाजिरों में जन्मे पहले बालक माने गए।

वह प्रारंभिक मुस्लिम समुदाय से निकट संबंध वाले परिवार में बड़े हुए। बचपन में पैग़म्बर से सीमित रिवायतें सुनीं और बाद में अपने पिता, माता तथा मौसी आयशा सहित बड़े सहाबा से हदीस बयान की। शास्त्रीय जीवनीकार उन्हें नमाज़, रोज़े और तिलावत में अत्यंत समर्पित और साथ ही साहसी तथा दृढ़ व्यक्तित्व वाला बताते हैं। उन्होंने उस्मान के शासन की विजयों में भाग लिया और फिर पहली इस्लामी शताब्दी के राजनीतिक संघर्षों में प्रमुख हुए।

पहले गृह-संघर्ष में वह अपने पिता अल-ज़ुबैर इब्न अल-अव्वाम रज़ियल्लाहु अन्हु और आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा के साथ उस पक्ष में थे जिसने जंग-ए-जमल में इमाम अली इब्न अबी तालिब अलैहिस्सलाम का सामना किया। यह राजनीतिक और सैन्य मतभेद दृढ़ ऐतिहासिक तथ्य है, लेकिन इसे दामाद और ससुर का आपसी संघर्ष कहना कालक्रम की दृष्टि से सही नहीं है। प्राचीन सुन्नी वंशावली ग्रंथ «अल-मुहब्बर» के लेखक मुहम्मद इब्न हबीब अल-बग़दादी, अध्याय «अली इब्न अबी तालिब के दामाद», पृष्ठ 56, स्पष्ट लिखते हैं कि उम्मे हसन बिन्त अली पहले जअदा इब्न हुबैरा के निकाह में थीं, फिर जाफ़र इब्न अक़ील के, और उसके बाद अब्दुल्लाह इब्न अल-ज़ुबैर के; यही क्रम पृष्ठ 437 पर भी सुरक्षित है। क्योंकि उसी स्थान पर जाफ़र इब्न अक़ील की इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के साथ शहादत भी दर्ज है, इसलिए इस रिवायत का कालक्रम इब्न अल-ज़ुबैर का उम्मे हसन बिन्त अली से निकाह कर्बला 61 हिजरी के बाद रखता है—अर्थात जंग-ए-जमल 36 हिजरी और इमाम अली की शहादत 40 हिजरी से बहुत बाद। इमामी स्रोत इस चर्चा में एक महत्त्वपूर्ण पूरक परत जोड़ते हैं। शैख़ मुफ़ीद «अल-इरशाद», खंड 1, पृष्ठ 354–355 में उम्मे हसन को इमाम अली की पुत्रियों में गिनते हैं और उनकी माता उम्मे सईद बिन्त उरवा अल-सक़फ़िय्या बताते हैं, हालाँकि वहाँ उनके पतियों का विवरण नहीं देते। दूसरी ओर प्रमुख अलवी और इमामी वंशावली ग्रंथ «अल-मजदी फ़ी अंसाब अल-तालिबिय्यीन», खंड 1, पृष्ठ 20, स्पष्ट कहता है कि उम्मे हसन बिन्त अल-हसन, यानी इमाम हसन की पुत्री, का निकाह अब्दुल्लाह इब्न अल-ज़ुबैर से हुआ; इब्न इनबा भी «उमदत अल-तालिब», खंड 1, पृष्ठ 68 में «अल-मजदी» के लेखक से यही संबंध उद्धृत करते हैं। इसलिए यदि उम्मे हसन बिन्त अली वाली सुन्नी वंशावली रिवायत पर कोई बहस करे, तब भी महत्त्वपूर्ण इमामी वंशावली परंपरा स्वतंत्र रूप से इब्न अल-ज़ुबैर और इमाम हसन की पुत्री—अर्थात इमाम अली की पोती—के बीच निकट वैवाहिक संबंध सुरक्षित करती है। यह वैवाहिक संबंध वास्तविक राजनीतिक मतभेदों को मिटाता नहीं, लेकिन यह एक मजबूत ऐतिहासिक संकेत है कि उन मतभेदों को अपने-आप स्थायी धार्मिक या पारिवारिक दुश्मनी कहना स्रोतों से अधिक बड़ा दावा होगा। इसी कारण इब्न तैमिय्या «मजमूअ अल-फ़तावा», खंड 4, पृष्ठ 431–434 में सहाबा के आपसी संघर्षों के बारे में जो सामान्य सुन्नी सिद्धांत देते हैं—असिद्ध आरोपों से सावधानी और सिद्ध घटनाओं को न्याय, फ़ज़ीलत तथा इज्तिहाद के साथ पढ़ना—वह यहाँ उचित पद्धतिगत सावधानी देता है; यह इब्न अल-ज़ुबैर पर विशेष फ़ैसला नहीं है।

मुआविया रज़ियल्लाहु अन्हु की ६० हिजरी में मृत्यु और यज़ीद के उत्तराधिकार के बाद इब्न अल-ज़ुबैर ने बैअत से इनकार किया और मक्का को केंद्र बनाया। यज़ीद की ६४ हिजरी में मृत्यु के बाद हिजाज़, इराक़, मिस्र, यमन और पूर्वी क्षेत्रों के हिस्सों में उनकी ख़िलाफ़त मानी गई, जबकि शाम की उमय्यद शक्ति मरवान और अब्द अल-मलिक के अधीन फिर मज़बूत हुई। इसी दौर में अब्दुल्लाह इब्न अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु और मुहम्मद इब्न अल-हनफ़िय्या रहिमहुल्लाह के साथ बैअत के प्रश्न पर गंभीर राजनीतिक तनाव हुआ। ज़हबी, ख़लीफ़ा इब्न ख़य्यात से उद्धृत करते हैं कि मुहम्मद इब्न अल-हनफ़िय्या ने बैअत से इनकार किया तो इब्न अल-ज़ुबैर ने उन्हें शिअब बनू हाशिम में सीमित किया और दबाव डाला; एक दूसरी सुरक्षित रिवायत इब्न अब्बास को भी उसी संकट में उनके साथ दिखाती है। इसके बावजूद ज़हबी ही इब्न अब्बास से इब्न अल-ज़ुबैर की यह प्रशंसा उद्धृत करते हैं कि वह अल्लाह की किताब के क़ारी और इस्लाम में पाकदामन थे। इससे साफ होता है कि राजनीतिक विवाद को अपने-आप व्यक्तिगत या धार्मिक दुश्मनी नहीं समझना चाहिए। कुछ बाद के ऐतिहासिक ग्रंथ यह भी बताते हैं कि उन्होंने एक अवधि तक ख़ुत्बे में पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर दुरूद का उल्लेख नहीं किया। यह सहीह बुख़ारी या सहीह मुस्लिम की रिवायत नहीं है और यहाँ किसी सही हदीसी सनद से सामान्य आदत के रूप में सिद्ध नहीं हुई; इसलिए इसे नमाज़ और दुआ में दुरूद छोड़ देने या पैग़म्बर के परिवार से धार्मिक दुश्मनी का निश्चित प्रमाण नहीं माना गया।

प्राचीन वंशावली स्रोत उनकी कई पत्नियाँ और संतानें सुरक्षित करते हैं, और केवल समान कुनियत «उम्मे हसन» के कारण दो अलग महिलाओं को एक नहीं मानना चाहिए। सुन्नी «अल-मुहब्बर» और «अंसाब अल-अशराफ़» उम्मे हसन बिन्त अली को जअदा इब्न हुबैरा और जाफ़र इब्न अक़ील के बाद अब्दुल्लाह इब्न अल-ज़ुबैर के निकाह में रखते हैं। अलग रूप से «अल-मुहब्बर» उम्मे हसन बिन्त अल-हसन को भी उनकी पत्नी बताता है। यह दूसरा संबंध विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है क्योंकि अलवी और इमामी वंशावली परंपरा भी इसे स्वतंत्र रूप से सुरक्षित करती है: «अल-मजदी फ़ी अंसाब अल-तालिबिय्यीन», खंड 1, पृष्ठ 20, स्पष्ट रूप से इमाम हसन की पुत्री उम्मे हसन का अब्दुल्लाह इब्न अल-ज़ुबैर से निकाह लिखता है, और «उमदत अल-तालिब», खंड 1, पृष्ठ 68, «अल-मजदी» के लेखक से यही कथन उद्धृत करता है। शैख़ मुफ़ीद «अल-इरशाद», खंड 1, पृष्ठ 354–355 में उम्मे हसन बिन्त अली का वंश स्पष्ट करते हैं, लेकिन उसी स्थान पर उनके पतियों की सूची नहीं देते। इसलिए दोनों उम्मे हसन को अलग पहचान के रूप में रखना और प्रत्येक निकाह को उसके अपने स्रोतों की शक्ति तथा सीमा के अनुसार प्रस्तुत करना अधिक सही है।

७२–७३ हिजरी में अब्द अल-मलिक ने हज्जाज इब्न यूसुफ़ को मक्का की घेराबंदी के लिए भेजा। लड़ाई और पत्थरबारी से हरम को क्षति हुई और बहुत से समर्थक इब्न अल-ज़ुबैर को छोड़ गए। उन्होंने अपनी वृद्ध माता अस्मा बिन्त अबी बक्र रज़ियल्लाहु अन्हा से सलाह की और अपमानजनक शर्तों पर आत्मसमर्पण की जगह प्रतिरोध जारी रखा। वह ७३ हिजरी, अर्थात ६९२ ईस्वी, में मक्का में शहीद हुए। सहीह मुस्लिम के अनुसार अब्दुल्लाह इब्न उमर रज़ियल्लाहु अन्हु उनके लटके हुए शरीर के पास रुके, तीन बार “अस्सलामु अलैक या अबा ख़ुबैब” कहा और गवाही दी कि जहाँ तक वह उन्हें जानते थे, वह बहुत रोज़ा रखने वाले, रात में क़ियाम करने वाले और रिश्तेदारी निभाने वाले थे; फिर उन्होंने ऐसे शब्द कहे जिनका अर्थ इब्न अल-ज़ुबैर के नैतिक स्थान की स्पष्ट प्रशंसा था। सहीह मुस्लिम बाद में अस्मा और हज्जाज की भेंट भी सुरक्षित करती है। प्राचीन रिवायतें बताती हैं कि शरीर नीचे उतारकर परिवार को दिए जाने के बाद अस्मा ने अपने पुत्र को ग़ुस्ल दिया और सुगंध तथा कफ़न की तैयारी की; इब्न अल-असीर और इब्न कसीर द्वारा सुरक्षित प्रसिद्ध मक्की रिवायत दफ़न को अल-हजून में रखती है। यही प्राचीन क़ब्रिस्तान आज जन्नत अल-मुअल्ला या मुअल्ला क़ब्रिस्तान के नाम से जाना जाता है। चूँकि पुरानी व्यक्तिगत क़ब्रों की पहचान-चिन्ह अब पूरे क़ब्रिस्तान में विश्वसनीय रूप से सुरक्षित नहीं हैं, इस परिचय का मानचित्र-बिंदु वर्तमान प्रसिद्ध ऐतिहासिक दफ़न क्षेत्र को दिखाता है, किसी अलग आधुनिक क़ब्र-चिन्ह को निश्चित सिद्ध नहीं करता।

ऐतिहासिक महत्व और विरासत

इब्न अल-ज़ुबैर दूसरे गृह-संघर्ष के केंद्रीय नेताओं और उमय्यद वंशानुगत शासन के सबसे गंभीर मक्की प्रतिद्वंद्वी थे। उनकी ख़िलाफ़त ने कुछ समय के लिए राजनीतिक केंद्र हिजाज़ की ओर खींचा और इस्लामी दुनिया के बड़े हिस्से में मान्यता पाई; उनकी हार अब्द अल-मलिक के अधीन राज्य के पुनः एकीकरण का निर्णायक चरण बनी।

सुन्नी और इमामी वंशावली सामग्री को साथ पढ़ने से अधिक संतुलित तस्वीर सामने आती है। सहीह मुस्लिम में इब्न उमर उनके रोज़े, रात के क़ियाम और रिश्तेदारी निभाने की गवाही देते हैं, जबकि ज़हबी इब्न अब्बास से उनकी कुरआन-पाठ और इस्लामी पाकदामनी की प्रशंसा उद्धृत करते हैं। दूसरी ओर जंग-ए-जमल में इमाम अली के सामने वाले पक्ष में उनकी भागीदारी और बाद में इब्न अब्बास तथा मुहम्मद इब्न अल-हनफ़िय्या के साथ बैअत के गंभीर विवाद भी सुरक्षित हैं। लेकिन पारिवारिक स्तर पर कहानी केवल संघर्ष की नहीं है: सुन्नी «अल-मुहब्बर» (पृष्ठ 56 और 437) उम्मे हसन बिन्त अली से उनके निकाह को बताता है, जबकि महत्त्वपूर्ण इमामी «अल-मजदी» (खंड 1, पृष्ठ 20) और उसके बाद «उमदत अल-तालिब» (खंड 1, पृष्ठ 68) इमाम हसन की पुत्री उम्मे हसन से उनके निकाह को सुरक्षित करते हैं। इस तरह अलग धार्मिक परंपराओं के स्रोत वास्तविक राजनीतिक मतभेद और निकट अलवी तथा हसनी वैवाहिक संबंध—दोनों—संरक्षित करते हैं। इससे हर राजनीतिक निर्णय सही सिद्ध नहीं हो जाता, लेकिन उन मतभेदों को स्थायी धार्मिक या पारिवारिक दुश्मनी का व्यापक दावा बनाने से पहले गंभीर ऐतिहासिक सावधानी आवश्यक हो जाती है। इब्न तैमिय्या का सामान्य सुन्नी तरीका भी असिद्ध आरोपों से बचने और सिद्ध मतभेदों को न्याय, फ़ज़ीलत तथा इज्तिहाद के साथ पढ़ने पर बल देता है। इसी प्रकार ख़ुत्बे में कुछ समय दुरूद का उल्लेख न करने वाली बाद की रिवायत को सहीहैन की हदीस या उनकी पूरी इबादत में दुरूद छोड़ देने का प्रमाण नहीं माना गया।

उनका पारिवारिक अभिलेख सटीक वंश-नियंत्रण का महत्त्व भी दिखाता है। उम्मे हसन बिन्त अली और उम्मे हसन बिन्त हसन दो अलग महिलाएँ थीं और प्राचीन स्रोत दोनों से उनके विवाह की अलग-अलग पुष्टि करते हैं। पूरा पैतृक वंश सुरक्षित रखने से समान कुनियत के कारण गलत विलय या किसी सही संबंध को अनावश्यक हटाने से बचा जा सकता है।

पारिवारिक संबंध

🌱 संतान

ख़ुबैब इब्न अब्दुल्लाह इब्न अल-ज़ुबैर हमज़ा इब्न अब्दुल्लाह इब्न अल-ज़ुबैर अब्बाद इब्न अब्दुल्लाह इब्न अल-ज़ुबैर साबित इब्न अब्दुल्लाह इब्न अल-ज़ुबैर हाशिम इब्न अब्दुल्लाह इब्न अल-ज़ुबैर क़ैस इब्न अब्दुल्लाह इब्न अल-ज़ुबैर उरवा इब्न अब्दुल्लाह इब्न अल-ज़ुबैर अल-ज़ुबैर इब्न अब्दुल्लाह इब्न अल-ज़ुबैर आमिर इब्न अब्दुल्लाह इब्न अल-ज़ुबैर मूसा इब्न अब्दुल्लाह इब्न अल-ज़ुबैर उम्म हकीम बिन्त अब्दुल्लाह इब्न अल-ज़ुबैर फ़ातिमा बिन्त अब्दुल्लाह इब्न अल-ज़ुबैर फ़ाख़िता बिन्त अब्दुल्लाह इब्न अल-ज़ुबैर अबू बक्र इब्न अब्दुल्लाह इब्न अल-ज़ुबैर बक्र इब्न अब्दुल्लाह इब्न अल-ज़ुबैर रुक़य्या बिन्त अब्दुल्लाह इब्न अल-ज़ुबैर अब्दुल्लाह इब्न अब्दुल्लाह इब्न अल-ज़ुबैर बक्र अल-आख़र इब्न अब्दुल्लाह इब्न अल-ज़ुबैर

स्रोत

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al-Muhabbar | Muhammad ibn Habib al-Baghdadi | Women who married three or more husbands, p. 437 | https://shamela.ws/book/12205/437 | Repeats the same sequence and states that Jafar ibn Aqil was martyred with Imam Husayn, supporting the post-Karbala chronology of Ibn al-Zubayr's marriage
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al-Irshad | Shaykh al-Mufid | Vol. 1, pp. 354-355, children of Imam Ali | https://almojib.com/ar/search?tags=7287 | Lists Umm al-Hasan and Ramla among Imam Ali's daughters and identifies their mother as Umm Sa'id bint Urwa al-Thaqafiyya; this passage does not list Umm al-Hasan's husbands
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Umdat al-Talib fi Ansab Al Abi Talib | Ibn Inaba | Vol. 1, p. 68 | https://lib.eshia.ir/10392/1/68 | Transmits from al-Umari/al-Majdi that Umm al-Hasan bint al-Hasan married Abd Allah ibn al-Zubayr
al-Majdi fi Ansab al-Talibiyyin | Ali ibn Muhammad al-Umari | Vol. 1, p. 18 | https://lib.eshia.ir/15100/1/18/ | Records Umm al-Hasan bint Ali as married to Ja'da ibn Hubayra; useful for distinguishing her from Umm al-Hasan bint al-Hasan

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