हज़रत अब्दुर्रहमान इब्न औफ़ रज़ियल्लाहु अन्हु

Abd al-Rahman's lineage is Abd al-Rahman ibn Awf ibn Abd Awf ibn Abd ibn al-Harith ibn Zuhra ibn Kilab ibn Murra ibn Ka'b ibn Lu'ayy ibn Ghalib al-Qurashi al-Zuhri. His kunyah was Abu Muhammad. Classical sources clearly preserve his father as Awf ibn Abd Awf. His mother is most commonly identified as al-Shifa bint Awf ibn Abd ibn al-Harith ibn Zuhra, although Safiyya bint Abd Manaf ibn Zuhra is also transmitted; the maternal name is therefore retained with cautious confidence.

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हज़रत अब्दुर्रहमान इब्न औफ़ रज़ियल्लाहु अन्हु का पूरा परिचय अबू मुहम्मद अब्दुर्रहमान इब्न औफ़ इब्न अब्द औफ़ अल-क़ुरैशी अल-ज़ुहरी है। वे क़ुरैश के बनू ज़ुहरा से थे और प्रमुख सहाबा में गिने जाते हैं। इब्न अब्दुलबर लिखते हैं कि इस्लाम से पहले उनका नाम अब्द अम्र था, जबकि अब्द अल-काबा भी रिवायत हुआ है; फिर नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उनका नाम अब्दुर्रहमान रखा। उनकी माता अश-शिफ़ा बिन्त औफ़ उसी ज़ुहरी वंश से थीं। पुराने जीवनीकार उनका जन्म आमुल-फ़ील के लगभग दस वर्ष बाद बताते हैं, इसलिए पैग़ंबरी मिशन के आरंभ में वे मक्का के एक वयस्क व्यक्ति थे।
जन्म

पुराने जीवनीकार हज़रत अब्दुर्रहमान इब्न औफ़ रज़ियल्लाहु अन्हु का जन्म मक्का में आमुल-फ़ील के लगभग दस वर्ष बाद बताते हैं। कोई निश्चित सौर या हिजरी तारीख़ विश्वसनीय रूप से सुरक्षित नहीं है, इसलिए इसे अनुमानित ऐतिहासिक समय के रूप में रखा गया है।

निधन

प्रसिद्ध मत के अनुसार हज़रत अब्दुर्रहमान इब्न औफ़ रज़ियल्लाहु अन्हु का निधन मदीना मुनव्वरा में ३२ हिजरी में हुआ, जबकि ३१ हिजरी भी मन्क़ूल है। उनकी आयु के बारे में भी अलग-अलग रिवायतें हैं, इसलिए ३२ हिजरी को प्रसिद्ध मत और दूसरे वर्ष को ऐतिहासिक मतभेद के रूप में सुरक्षित रखा गया है।

दफ़न या संबद्ध स्थान

पुराने जीवनी स्रोत हज़रत अब्दुर्रहमान इब्न औफ़ रज़ियल्लाहु अन्हु की दफ़्नगाह मदीना मुनव्वरा के बक़ी अल-ग़रक़द में बताते हैं। आज का जन्नतुल बक़ी उनके दफ़्न का विश्वसनीय क़ब्रिस्तान-स्तरीय स्थान है, लेकिन उनकी व्यक्तिगत क़ब्र को अब विश्वसनीय सटीकता से पहचानना संभव नहीं है। इसलिए इस अभिलेख का नक्शा केवल पूरे क़ब्रिस्तान के साझा स्थान को दिखाता है, किसी एक निश्चित क़ब्र को नहीं।

जीवनी और ऐतिहासिक परिचय

हज़रत अब्दुर्रहमान इब्न औफ़ रज़ियल्लाहु अन्हु का पूरा परिचय अबू मुहम्मद अब्दुर्रहमान इब्न औफ़ इब्न अब्द औफ़ अल-क़ुरैशी अल-ज़ुहरी है। वे क़ुरैश के बनू ज़ुहरा से थे और प्रमुख सहाबा में गिने जाते हैं। इब्न अब्दुलबर लिखते हैं कि इस्लाम से पहले उनका नाम अब्द अम्र था, जबकि अब्द अल-काबा भी रिवायत हुआ है; फिर नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उनका नाम अब्दुर्रहमान रखा। उनकी माता अश-शिफ़ा बिन्त औफ़ उसी ज़ुहरी वंश से थीं। पुराने जीवनीकार उनका जन्म आमुल-फ़ील के लगभग दस वर्ष बाद बताते हैं, इसलिए पैग़ंबरी मिशन के आरंभ में वे मक्का के एक वयस्क व्यक्ति थे।

उन्होंने मुसलमानों के दारुल-अरक़म में इकट्ठा होने से पहले इस्लाम स्वीकार किया और मक्का के शुरुआती ईमान वालों में शामिल हुए। जीवनी-स्रोत उन्हें उस कमज़ोर आरंभिक समुदाय में रखते हैं जिसने विरोध सहा और दोनों हिजरतें कीं: पहले हबशा और फिर मदीना। इन दो हिजरतों को उनकी धार्मिक अग्रता की विशेष निशानी माना गया। इस प्रकार उनका सार्वजनिक जीवन आरंभिक इस्लाम के तीन वातावरणों से गुज़रा: मक्का की परीक्षा, लाल सागर के पार शरण, और मदीना में नए समुदाय का निर्माण।

मदीना पहुँचने पर नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उनके और हज़रत सअद इब्न अर-रबीअ अल-अंसारी रज़ियल्लाहु अन्हु के बीच भाईचारा स्थापित किया। सहीह बुख़ारी की प्रसिद्ध रिवायत में सअद ने बड़ी आर्थिक सहायता की पेशकश की, लेकिन अब्दुर्रहमान ने उनके परिवार और माल के लिए बरकत की दुआ की और बाज़ार का रास्ता पूछा। उन्होंने व्यापार किया, अपनी मेहनत से कमाया और बाद में अपने विवाह की सूचना नबी को दी; नबी ने कहा कि एक बकरी से ही सही, वलीमा करो। यह घटना व्यापार-कौशल के साथ आत्मसम्मान, कृतज्ञता और दूसरे की संपत्ति पर निर्भर न रहने का स्वभाव दिखाती है।

इब्न अब्दुलबर के अनुसार हज़रत अब्दुर्रहमान रज़ियल्लाहु अन्हु बद्र और नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ प्रमुख अभियानों में उपस्थित रहे। उहुद में वे डटे रहे और उन्हें अनेक घाव लगे; पुराने वर्णनों में पैर की ऐसी चोट का उल्लेख है जिसके कारण वे जीवन भर लंगड़ाकर चलते थे। उनका सैन्य जीवन केवल युद्धों के नामों की सूची नहीं था, बल्कि उहुद के संकट में वास्तविक शारीरिक बलिदान शामिल था, जब मुस्लिम पंक्तियाँ बिखर गईं और नबी की सुरक्षा खतरे में थी। बद्र के सहभागी होने की उनकी पहचान बाद में धार्मिक और सामाजिक रूप से बहुत प्रभावशाली बनी।

हिजरत के छठे वर्ष के शाबान में नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उन्हें दूमतुल-जंदल के अभियान का नेतृत्व दिया। इब्न सैय्यिद अन-नास ने इब्न सअद से उद्धृत किया है कि नबी ने उन्हें सामने बिठाया, अपने हाथ से पगड़ी बाँधी और धोखा, ग़बन तथा बच्चों की हत्या से मना किया। अब्दुर्रहमान ने तीन दिन बनू कल्ब के नेताओं को दावत दी; अल-असबग़ इब्न अम्र और कई लोग मुसलमान हुए, जबकि दूसरे संधि पर रहे। उन्होंने तुमादिर बिन्त अल-असबग़ से विवाह किया और उनका पुत्र अबू सलमा बाद में मदीना का प्रसिद्ध फ़क़ीह और रावी बना।

तबूक की यात्रा में एक और घटना ने उन पर किए गए भरोसे को दिखाया। सहीह मुस्लिम के अनुसार फ़ज्र का समय निकलने के डर से लोगों ने अब्दुर्रहमान को इमाम बनाया। नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम नमाज़ शुरू होने के बाद पहुँचे, संकेत किया कि अब्दुर्रहमान अपनी जगह रहें, और एक रकअत उनके पीछे पढ़ी, फिर छूटा भाग पूरा किया। बाद में नबी ने समय पर नमाज़ पढ़ने के लिए लोगों की प्रशंसा की। इस घटना में सामूहिक अनुशासन और यह असाधारण तथ्य दोनों सुरक्षित हैं कि नबी ने अपने एक सहाबी के पीछे नमाज़ पढ़ी।

उनकी फ़ज़ीलत उन रिवायतों में भी आती है जिनमें दस सहाबा को जन्नत की खुशख़बरी दी गई। जामिअ तिर्मिज़ी में उनका नाम इस समूह में है और इमाम तिर्मिज़ी ने सईद इब्न ज़ैद वाली सनद को उस दूसरी रिवायत से अधिक मज़बूत बताया जो सीधे अब्दुर्रहमान से उद्धृत हुई। इसलिए यहाँ इस फ़ज़ीलत को हदीसी रिवायत के रूप में और संग्रह की अपनी सनदी टिप्पणी के साथ प्रस्तुत किया गया है। जीवनीकार उन्हें उन छह लोगों में भी गिनते हैं जिन्हें हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु ने ख़िलाफ़त की शूरा के लिए चुना था।

हज़रत अब्दुर्रहमान रज़ियल्लाहु अन्हु ने नबवी रिवायतें बयान कीं और धार्मिक तथा सार्वजनिक प्रश्नों में उनसे सलाह ली जाती थी। उनके रावियों में पुत्र इब्राहीम, हुमैद और अबू सलमा के साथ कई सहाबा और ताबिई शामिल थे। इमाम ज़हबी उल्लेख करते हैं कि वे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम, अबू बक्र और उमर के समय अपनी सुनी हुई बातों के आधार पर फ़तवा देते थे। उनका परिवार मदीना के विद्वान घरानों में बना; अबू सलमा इब्न अब्दुर्रहमान अगली पीढ़ी के प्रसिद्ध फ़क़ीह और मुहद्दिस बने, इसलिए प्रभाव सार्वजनिक सेवा और ज्ञान-परंपरा दोनों में चला।

व्यापार की सफलता ने उन्हें बड़ी संपत्ति दी, लेकिन स्रोत लगातार इस संपत्ति को ख़र्च और दान से जोड़ते हैं। ज़हबी ने अज़-ज़ुहरी की रिवायत उद्धृत की है कि अब्दुर्रहमान ने नबी के जीवनकाल में अपनी आधी संपत्ति दी, बाद में बड़ी रकमें दीं और सार्वजनिक आवश्यकता के लिए घोड़े तथा सवारियाँ उपलब्ध कराईं; उसी रिवायत में अधिकतर संपत्ति व्यापार से आने की बात है। ये संख्याएँ पुरानी जीवनी-रिवायतों का हिस्सा हैं, कोई एक आधुनिक लेखा-पुस्तक नहीं, इसलिए इन्हें आज की निश्चित मुद्रा में नहीं बदला जाना चाहिए। स्थायी अर्थ यह है कि उन्होंने व्यापारिक सफलता को सदक़ा, रक्षा और सामुदायिक कल्याण का साधन बनाया।

वंशावली की पुस्तकें उनके बड़े और जटिल परिवार का वर्णन करती हैं और सूचियों में कुछ अंतर है। अच्छी तरह दर्ज पत्नियों में उम्म कुल्सूम बिन्त उक़बा, तुमादिर बिन्त अल-असबग़ और क़ुरैश, अंसार तथा सहयोगी कबीलों की अन्य महिलाएँ हैं। बच्चों में इब्राहीम, हुमैद, इस्माईल, अबू सलमा, मुहम्मद, सालिम और कई बेटियों के नाम आते हैं, और स्रोत अलग बच्चों को अलग माताओं से जोड़ते हैं। लंबी तथा संस्करण-भिन्न सूचियों के कारण यहाँ कोई एक अंतिम कुल संख्या तय नहीं की गई। ऐतिहासिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण संबंध तुमादिर के पुत्र अबू सलमा का है, जिनकी विद्वत्ता ने परिवार को मदीना की बाद की फ़िक़्ह परंपरा से जोड़ा।

नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के इंतिक़ाल के बाद हज़रत अब्दुर्रहमान रज़ियल्लाहु अन्हु सार्वजनिक मामलों के केंद्र में रहे, लेकिन उन्होंने अपने लिए वंशानुगत पद नहीं बनाया। रिवायतें उम्महातुल-मोमिनीन की देखभाल में उनकी भूमिका बताती हैं, और हज़रत उमर के दौर में वे हज़रत उस्मान रज़ियल्लाहु अन्हु के साथ उनके हज में गए ताकि परदा और सुरक्षा बनी रहे। उमर ने उन्हें छह-सदस्यीय शूरा में रखा। उन्होंने अपनी उम्मीदवारी छोड़ दी, परामर्श का भार लिया, उम्मीदवारों और लोगों से बात की और अंत में उस्मान की बैअत का ऐलान किया। सहीह बुख़ारी इस प्रक्रिया और बैअत से पहले की रातों का मूल वृत्तांत सुरक्षित रखती है।

प्रसिद्ध रिवायत के अनुसार हज़रत अब्दुर्रहमान इब्न औफ़ रज़ियल्लाहु अन्हु का निधन मदीना में ३२ हिजरी में हुआ, हालांकि ३१ हिजरी भी वर्णित है। आयु के बारे में बहत्तर, पचहत्तर और अठहत्तर वर्ष की अलग रिवायतें हैं। इब्न अब्दुलबर लिखते हैं कि उनकी इच्छा के अनुसार हज़रत उस्मान रज़ियल्लाहु अन्हु ने जनाज़े की नमाज़ पढ़ाई और उन्हें बक़ी में दफ़्न किया गया। इसलिए ऐतिहासिक और जीवनी-स्रोत जन्नतुल बक़ी क़ब्रिस्तान में दफ़्न की पुष्टि करते हैं, लेकिन आज उनकी अलग क़ब्र की भरोसेमंद पहचान मौजूद नहीं है। इस रिकॉर्ड का मानचित्र केवल पूरे क़ब्रिस्तान के अधिकृत साझा स्थान को दिखाता है, किसी व्यक्तिगत क़ब्र, मज़ार, घेरे या मूल निशान को नहीं।

ऐतिहासिक महत्व और विरासत

हज़रत अब्दुर्रहमान इब्न औफ़ रज़ियल्लाहु अन्हु की ऐतिहासिक महत्ता इसलिए है कि उनका जीवन पूरी संस्थापक पीढ़ी को समेटता है: मक्का में शुरुआती इस्लाम, हबशा की हिजरत, मदीना की हिजरत, बद्र, उहुद और बाद के अभियान। उनकी जीवनी दिखाती है कि धार्मिक अग्रता किसी एक प्रसिद्ध क्षण से नहीं, बल्कि बार-बार किए गए बलिदान से बनी। उहुद की स्थायी चोट और बद्र के सहभागी होने ने बाद के सम्मान को ठोस ऐतिहासिक आधार दिया।

उनकी व्यापारिक कहानी शुरुआती मदीना में आर्थिक आत्मनिर्भरता का स्थायी उदाहरण बनी। बुख़ारी का वृत्तांत केवल संपत्ति की प्रशंसा नहीं करता; वह एक मुहाजिर को दिखाता है जो अंसारी भाई की उदारता का अनुचित लाभ नहीं लेता, बाज़ार में जाता है और मेहनत से आजीविका फिर बनाता है। बाद की जीवनी-रिवायतें बड़े दान को सदक़ा, सवारी और सामुदायिक ज़रूरतों से जोड़ती हैं। इस मेल ने उन्हें कृतज्ञ धनवान मोमिन का उदाहरण बनाया, न केवल गरीबी या संचय का प्रतीक।

दूमतुल-जंदल की कमान और तबूक की नमाज़ सार्वजनिक भरोसे के दो रूप दिखाती हैं। पहले प्रसंग में उन्हें सैन्य और कूटनीतिक जिम्मेदारी के साथ हिंसा की स्पष्ट सीमाएँ दी गईं; दूसरे में समुदाय ने नमाज़ का समय बचाने के लिए उन पर भरोसा किया और नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने निर्णय की पुष्टि की। ये घटनाएँ बताती हैं कि वे केवल व्यापारी नहीं, बल्कि नेतृत्व, संधि, इबादत की इमामत और दबाव में जिम्मेदार फ़ैसले के योग्य थे।

हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु के बाद शूरा में उनकी भूमिका राजनीतिक महत्ता की सबसे स्पष्ट मिसालों में है। प्रतियोगिता से हटकर और परामर्श की जिम्मेदारी लेकर वे कठिन सत्ता-हस्तांतरण के व्यावहारिक मध्यस्थ बने। सहीह बुख़ारी की रिवायत सार्वजनिक सलाह, उम्मीदवारों से बातचीत और अंतिम बैअत को प्रक्रिया के केंद्र में रखती है। शुरुआती ख़िलाफ़त पर बाद की बहसों के बावजूद, इस घटना में उनका आचरण व्यवस्थित सत्ता-हस्तांतरण के प्रयास को समझने का मुख्य प्रमाण है।

जन्नतुल बक़ी में उनका बताया गया दफ़्न उनकी जीवनी को मदीना के मुख्य ऐतिहासिक क़ब्रिस्तान से जोड़ता है, लेकिन स्थान को सही रूप में दिखाना आवश्यक है। इब्न अब्दुलबर व्यक्तिगत दफ़्न की ऐतिहासिक रिवायत देते हैं, जबकि आज का बक़ी अनेक पीढ़ियों का विशाल सामूहिक क़ब्रिस्तान है। यहाँ दिए साझा निर्देशांक केवल पूरे क़ब्रिस्तान की पहचान हैं। यह भेद इतिहास और सार्वजनिक मानचित्र दोनों की सच्चाई बचाता है: पाठक स्रोतों में बताई जगह समझता है, पर किसी आधुनिक बिंदु को उनकी निश्चित व्यक्तिगत क़ब्र नहीं मानता।

पारिवारिक संबंध

स्रोत

अल-इस्तीआब फ़ी मारिफ़त अल-असहाब, इब्न अब्दुलबर, खंड २, पृष्ठ ८४५-८५० | पहचान, दोनों हिजरतें, बद्र, निधन और बक़ी में दफ़्न
तहज़ीब अल-कमाल फ़ी अस्मा अर-रिजाल, मिज़्ज़ी, खंड १७, पृष्ठ ३२४-३२७, जीवनी ३९२३ | वंश, माता-पिता, शुरुआती इस्लाम और शारीरिक विवरण | https://www.islamweb.net/ar/library/content/1001/4279/
सियर आलाम अन-नुबला, ज़हबी, खंड १, पृष्ठ ६८-९२ | विस्तृत जीवनी, दान और सार्वजनिक व फ़िक़्ही भूमिका
सहीह बुख़ारी, हदीस २०४९ | मदीना में व्यापार और सअद इब्न अर-रबी के साथ भाईचारा | https://sunnah.com/bukhari:2049
सहीह बुख़ारी, हदीस ७२०७ | शूरा और हज़रत उस्मान रज़ियल्लाहु अन्हु का चयन | https://sunnah.com/bukhari:7207
जामे तिर्मिज़ी, हदीस ३७४८ | जन्नत की खुशख़बरी पाने वाले दस सहाबा में उल्लेख | https://sunnah.com/tirmidhi:3748
सऊदीपीडिया, जन्नतुल बक़ी | वर्तमान सरकारी पहचान और मदीना में स्थान | https://saudipedia.com/en/al-baqi-cemetery
सऊदी हज और उमरा मंत्रालय, मदीना मार्गदर्शक | मस्जिद-ए-नबवी के दक्षिण-पूर्व में बक़ी | https://haj.gov.sa/-/media/Project/HAJJ/PDF-and-FILES/umrah-hero-guide/EN-Umrah-Guide.pdf

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