उनकी सही जन्म तिथि सुरक्षित नहीं है। वे पैग़म्बरी मिशन से पहले मक्का में क़ुरैश के उमय्यद परिवार में अबू सुफ़यान सख़्र इब्न हर्ब और सफ़िय्या बिन्त अबी अल-आस के घर जन्मीं।
उम्मे हबीबा रमला बिन्त अबू सुफ़यान
PER-000170
अहल अल-बैत
पुष्ट
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उम्मे हबीबा रमला बिन्त अबू सुफ़यान रज़ियल्लाहु अन्हा प्रारंभिक मुसलमान, हबशा की मुहाजिरा, पैग़म्बर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की पत्नी और हदीस की राविया थीं। मान्य जीवनी स्रोत उनके पिता को अबू सुफ़यान सख़्र इब्न हर्ब, माता को सफ़िय्या बिन्त अबी अल-आस और पूर्व पति को उबैदुल्लाह इब्न जहश बताते हैं। ये संबंध सुरक्षित पंजीकरण खानों में नहीं हैं, इसलिए ऐतिहासिक लेख पूरा है, लेकिन केंद्रीय पंजीकरण सुधरने तक फ़ाइल समीक्षा के अधीन रहेगी।
अधिकांश जीवनी स्रोत मदीना में उनकी मृत्यु चवालीस हिजरी में रखते हैं; इब्न हिब्बान बयालीस हिजरी की अलग रिपोर्ट भी देते हैं।
ऐतिहासिक स्रोत उम्मे हबीबा की दफ़नगाह मदीना के जन्नत अल-बक़ी क़ब्रिस्तान में रखते हैं। वहाँ उनकी व्यक्तिगत क़ब्र की अलग और विश्वसनीय पहचान न होने के कारण इस परिचय में किसी विशेष क़ब्र के निर्देशांक नहीं दिए गए। दमिश्क के बाब अल-सग़ीर में उनसे संबद्ध स्थान उनकी दफ़नगाह नहीं है; ज़हबी के अनुसार वहाँ की क़ब्र सहाबिया अस्मा बिन्त यज़ीद अंसारिया की है, जो उम्मे आमिर और उम्मे सलमा की कुनियतों से प्रसिद्ध थीं और उम्मुल मोमिनीन उम्मे सलमा से अलग व्यक्ति थीं।
जीवनी और ऐतिहासिक परिचय
उम्मे हबीबा का मूल नाम रमला बिन्त अबू सुफ़यान सख़्र इब्न हर्ब था, हालाँकि कुछ प्रारंभिक जीवनी रिपोर्टों में हिन्द नाम भी मिलता है। इब्न अब्दुल बर्र के अनुसार रमला वंश और सीरत के विद्वानों में प्रसिद्ध और स्वीकृत नाम है। उनकी माता सफ़िय्या बिन्त अबी अल-आस थीं, जो उस्मान इब्न अफ़्फ़ान की फूफी थीं। इस शक्तिशाली क़ुरैशी पृष्ठभूमि के बावजूद उन्होंने इस्लाम के कठिन प्रारंभिक काल में ईमान स्वीकार किया।
उन्होंने अपने पति उबैदुल्लाह इब्न जहश के साथ हबशा की ओर हिजरत की। अल-मुस्तद्रक और अन्य जीवनी स्रोत बताते हैं कि उनकी बेटी हबीबा थी, जिससे उनकी कुनियत उम्मे हबीबा हुई। हबशा की हिजरत मक्का के दबाव से प्रारंभिक मुसलमानों की सुरक्षा के लिए थी। इसने उन्हें क़बीलाई संरक्षण से दूर किया और परदेस में धैर्य को उनकी जीवनी का मुख्य तत्व बना दिया।
प्रारंभिक जीवनी परंपरा के अनुसार उबैदुल्लाह इब्न जहश ने हबशा में ईसाई धर्म अपना लिया और वहीं मृत्यु हुई, जबकि उम्मे हबीबा इस्लाम पर बनी रहीं। विस्तृत सपनों और लंबे संवादों की कथाएँ अधिकतर बाद की रचनाओं में हैं, इसलिए उन्हें निश्चित ऐतिहासिक दृश्य नहीं बनाया गया। मज़बूत साझा बात यह है कि वे परदेस में पूर्व पति से अलग हुईं और ईमान पर स्थिर रहीं।
पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हबशा में उन्हें विवाह का संदेश भेजा। नजाशी ने विवाह और महर की व्यवस्था की, जबकि प्रतिनिधि के नाम में ख़ालिद इब्न सईद, उस्मान इब्न अफ़्फ़ान और अन्य विवरण मिलते हैं। महर सामान्यतः चार सौ दीनार बताया गया है, लेकिन अभिव्यक्तियाँ अलग हैं। विवाह प्रायः छह या सात हिजरी के आसपास रखा जाता है और शुरहबील इब्न हसना के साथ उनके मदीना आने की रिपोर्ट मिलती है।
मदीना में वे उम्महात अल-मोमिनीन में शामिल हुईं। बाद की सीरत पुस्तकों में प्रसिद्ध रिपोर्ट है कि उन्होंने अपने पिता अबू सुफ़यान को पैग़म्बर के बिस्तर पर बैठने नहीं दिया। यह कथा धार्मिक निष्ठा को पारिवारिक और राजनीतिक दबाव पर प्राथमिकता देने का प्रतीक बनी, लेकिन इसे उसके बाद के स्रोत-स्तर के साथ पढ़ना चाहिए।
उम्मे हबीबा ने पैग़म्बर से हदीसें बयान कीं। सहीह मुस्लिम और सुनन संग्रहों में दिन और रात की बारह नफ़्ल रकअतों की फ़ज़ीलत वाली उनकी रिवायत सुरक्षित है, और उन्होंने कहा कि सुनने के बाद इस अमल को नहीं छोड़ा। नमाज़, हज और पारिवारिक नियमों से संबंधित अन्य रिवायतें भी उनसे मिलती हैं। इससे वे पैग़म्बरी ज्ञान को आगे पहुँचाने वाली सहाबिया बनती हैं।
अधिकांश जीवनी स्रोत उनकी मृत्यु मदीना में ४४ हिजरी में रखते हैं, जबकि इब्न हिब्बान ने ४२ हिजरी की दूसरी रिवायत भी दर्ज की है। उनकी ऐतिहासिक दफ़नगाह जन्नत अल-बक़ी है; किंतु वहाँ उनकी व्यक्तिगत क़ब्र की अलग और विश्वसनीय पहचान आज उपलब्ध नहीं है, इसलिए इस परिचय में किसी विशिष्ट क़ब्र के निर्देशांक नहीं दिए गए। दमिश्क के बाब अल-सग़ीर में उम्मे हबीबा से संबद्ध स्थान उनकी दफ़नगाह नहीं है; ज़हबी लिखते हैं कि वहाँ की क़ब्र वास्तव में सहाबिया अस्मा बिन्त यज़ीद अंसारिया की है, जो उम्मे आमिर और उम्मे सलमा की कुनियतों से प्रसिद्ध थीं और उम्मुल मोमिनीन उम्मे सलमा से अलग व्यक्ति थीं। उनका जीवन ईमान में दृढ़ता, हिजरत के बलिदान, पारिवारिक दबाव के सामने धार्मिक निष्ठा और नबवी शिक्षा के विश्वसनीय संचार का उज्ज्वल उदाहरण है।
उन्होंने अपने पति उबैदुल्लाह इब्न जहश के साथ हबशा की ओर हिजरत की। अल-मुस्तद्रक और अन्य जीवनी स्रोत बताते हैं कि उनकी बेटी हबीबा थी, जिससे उनकी कुनियत उम्मे हबीबा हुई। हबशा की हिजरत मक्का के दबाव से प्रारंभिक मुसलमानों की सुरक्षा के लिए थी। इसने उन्हें क़बीलाई संरक्षण से दूर किया और परदेस में धैर्य को उनकी जीवनी का मुख्य तत्व बना दिया।
प्रारंभिक जीवनी परंपरा के अनुसार उबैदुल्लाह इब्न जहश ने हबशा में ईसाई धर्म अपना लिया और वहीं मृत्यु हुई, जबकि उम्मे हबीबा इस्लाम पर बनी रहीं। विस्तृत सपनों और लंबे संवादों की कथाएँ अधिकतर बाद की रचनाओं में हैं, इसलिए उन्हें निश्चित ऐतिहासिक दृश्य नहीं बनाया गया। मज़बूत साझा बात यह है कि वे परदेस में पूर्व पति से अलग हुईं और ईमान पर स्थिर रहीं।
पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हबशा में उन्हें विवाह का संदेश भेजा। नजाशी ने विवाह और महर की व्यवस्था की, जबकि प्रतिनिधि के नाम में ख़ालिद इब्न सईद, उस्मान इब्न अफ़्फ़ान और अन्य विवरण मिलते हैं। महर सामान्यतः चार सौ दीनार बताया गया है, लेकिन अभिव्यक्तियाँ अलग हैं। विवाह प्रायः छह या सात हिजरी के आसपास रखा जाता है और शुरहबील इब्न हसना के साथ उनके मदीना आने की रिपोर्ट मिलती है।
मदीना में वे उम्महात अल-मोमिनीन में शामिल हुईं। बाद की सीरत पुस्तकों में प्रसिद्ध रिपोर्ट है कि उन्होंने अपने पिता अबू सुफ़यान को पैग़म्बर के बिस्तर पर बैठने नहीं दिया। यह कथा धार्मिक निष्ठा को पारिवारिक और राजनीतिक दबाव पर प्राथमिकता देने का प्रतीक बनी, लेकिन इसे उसके बाद के स्रोत-स्तर के साथ पढ़ना चाहिए।
उम्मे हबीबा ने पैग़म्बर से हदीसें बयान कीं। सहीह मुस्लिम और सुनन संग्रहों में दिन और रात की बारह नफ़्ल रकअतों की फ़ज़ीलत वाली उनकी रिवायत सुरक्षित है, और उन्होंने कहा कि सुनने के बाद इस अमल को नहीं छोड़ा। नमाज़, हज और पारिवारिक नियमों से संबंधित अन्य रिवायतें भी उनसे मिलती हैं। इससे वे पैग़म्बरी ज्ञान को आगे पहुँचाने वाली सहाबिया बनती हैं।
अधिकांश जीवनी स्रोत उनकी मृत्यु मदीना में ४४ हिजरी में रखते हैं, जबकि इब्न हिब्बान ने ४२ हिजरी की दूसरी रिवायत भी दर्ज की है। उनकी ऐतिहासिक दफ़नगाह जन्नत अल-बक़ी है; किंतु वहाँ उनकी व्यक्तिगत क़ब्र की अलग और विश्वसनीय पहचान आज उपलब्ध नहीं है, इसलिए इस परिचय में किसी विशिष्ट क़ब्र के निर्देशांक नहीं दिए गए। दमिश्क के बाब अल-सग़ीर में उम्मे हबीबा से संबद्ध स्थान उनकी दफ़नगाह नहीं है; ज़हबी लिखते हैं कि वहाँ की क़ब्र वास्तव में सहाबिया अस्मा बिन्त यज़ीद अंसारिया की है, जो उम्मे आमिर और उम्मे सलमा की कुनियतों से प्रसिद्ध थीं और उम्मुल मोमिनीन उम्मे सलमा से अलग व्यक्ति थीं। उनका जीवन ईमान में दृढ़ता, हिजरत के बलिदान, पारिवारिक दबाव के सामने धार्मिक निष्ठा और नबवी शिक्षा के विश्वसनीय संचार का उज्ज्वल उदाहरण है।
ऐतिहासिक महत्व और विरासत
उम्मे हबीबा की जीवनी मक्का, हबशा और मदीना को जोड़ती है। वे ऐसे क़ुरैशी परिवार से थीं जो प्रारंभिक राजनीतिक विरोध में प्रमुख था, फिर भी उन्होंने ईमान और हिजरत चुनी।
हबशा में उनका विवाह प्रारंभिक इस्लामी इतिहास के राजनयिक और अंतरक्षेत्रीय स्वरूप को दिखाता है, क्योंकि नजाशी ने विवाह और महर की व्यवस्था में भूमिका निभाई।
बारह नफ़्ल रकअतों की हदीस उनकी विद्वत विरासत का स्थायी भाग है। पिता, माता और पूर्व पति के सुरक्षित संबंधों को पंजीकरण में पूरा करना भी आवश्यक है।
हबशा में उनका विवाह प्रारंभिक इस्लामी इतिहास के राजनयिक और अंतरक्षेत्रीय स्वरूप को दिखाता है, क्योंकि नजाशी ने विवाह और महर की व्यवस्था में भूमिका निभाई।
बारह नफ़्ल रकअतों की हदीस उनकी विद्वत विरासत का स्थायी भाग है। पिता, माता और पूर्व पति के सुरक्षित संबंधों को पंजीकरण में पूरा करना भी आवश्यक है।
पारिवारिक संबंध
👪 माता-पिता
पिता
अबू सुफ़यान इब्न हर्ब
पुष्ट
🤝 जीवनसाथी और वैवाहिक संबंध
हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ
पुष्ट
🌱 संतान
स्रोत
अल-इस्तीआब फ़ी मारिफ़त अल-असहाब | इब्न अब्दुल बर्र | प्रविष्टि ३३४४; संस्करणों में पृष्ठ अलग | https://www.islamweb.net/ar/library/content/1080/3382/%D8%A8%D8%A7%D8%A8-%D8%A7%D9%84%D8%B1%D8%A7%D8%A1 | रमला का स्वीकृत नाम, अबू सुफ़यान का वंश, माता सफ़िय्या, उबैदुल्लाह इब्न जहश, हबशा विवाह और महर के भेदसियर आलाम अल-नुबला | शम्स अल-दीन अल-ज़हबी | खंड दो, उम्मे हबीबा की जीवनी; पृष्ठ अलग | https://www.islamweb.net/ar/library/content/60/155/%D8%A3%D9%85-%D8%AD%D8%A8%D9%8A%D8%A8%D8%A9-%D8%A3%D9%85-%D8%A7%D9%84%D9%85%D8%A4%D9%85%D9%86%D9%8A%D9%86 | पहचान, हिजरत, पूर्व विवाह, हबशा में विवाह और सामान्य जीवनी
अल-तबक़ात अल-कुबरा | इब्न सअद | उम्मे हबीबा की जीवनी; संस्करणों में पृष्ठ अलग | https://shamela.ws/book/1686/2746 | मदीना जीवन, ख़ैबर का हिस्सा और हदीस रिवायत
अल-मुस्तद्रक अला अल-सहीहैन | अल-हाकिम अल-नैसाबूरी | सहाबा परिचय, उम्मे हबीबा प्रविष्टि; पृष्ठ अलग | https://www.islamweb.net/ar/library/content/74/6673/%D8%B0%D9%83%D8%B1-%D8%A3%D9%85-%D8%AD%D8%A8%D9%8A%D8%A8%D8%A9-%D8%A8%D9%86%D8%AA-%D8%A3%D8%A8%D9%8A-%D8%B3%D9%81%D9%8A%D8%A7%D9%86-%D8%B1%D8%B6%D9%8A-%D8%A7%D9%84%D9%84%D9%87-%D8%B9%D9%86%D9%87%D8%A7 | माता सफ़िय्या, उबैदुल्लाह इब्न जहश, बेटी हबीबा और हबशा विवरण
सहीह मुस्लिम | मुस्लिम इब्न अल-हज्जाज | हदीस ७२८ | https://sunnah.com/muslim:728a | बारह नफ़्ल रकअतों की फ़ज़ीलत और उम्मे हबीबा का निरंतर अमल
Siyar A'lam al-Nubala | Shams al-Din al-Dhahabi | Vol. 2, pp. 219-223, biographical entry on Umm Habiba | https://www.islamweb.net/ar/library/content/60/155/ | Identity, migration and marriage; death-date reports; explicitly rejects the Damascus burial attribution, states that her grave is in Medina, and identifies the Bab al-Saghir grave with Asma bint Yazid al-Ansariyya, whose kunya was Umm Salama
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