हज़रत हमज़ा रज़ियल्लाहु अन्हु की सटीक जन्म-तारीख़ विश्वसनीय रूप से सुरक्षित नहीं है। उनका जन्म मक्का में बनू हाशिम के घराने में हुआ। स्रोत उन्हें नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की आयु के क़रीब बताते हैं, लेकिन उम्र के अंतर की रिवायतें अलग हैं, इसलिए किसी एक वर्ष को निश्चित जन्म-वर्ष नहीं माना गया।
हज़रत हमज़ा इब्न अब्द अल-मुत्तलिब रज़ियल्लाहु अन्हु
Hamza ibn Abd al-Muttalib ibn Hashim ibn Abd Manaf ibn Qusay ibn Kilab was a Qurashi Hashimite. His father was Abd al-Muttalib ibn Hashim and his mother Halah bint Uhayb ibn Abd Manaf al-Zuhriyya. The Prophet Muhammad was his paternal nephew and foster-brother through Thuwaybah. Biographical sources preserve sons Ya'la, Amir and Ammarah and daughters Umamah and Amat Allah. Abd Allah ibn Jahsh was his maternal nephew through Hamza's sister Umaymah bint Abd al-Muttalib.
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हज़रत हमज़ा रज़ियल्लाहु अन्हु शवाल ३ हिजरी / ६२५ ईस्वी में उहुद के युद्ध में शहीद हुए। सहीह अल-बुख़ारी में वहशी इब्न हरब की अपनी रिवायत सुरक्षित है कि उन्होंने भाले से हज़रत हमज़ा को मारा। इसके बाद उनके शरीर के साथ अंग-भंग किया गया।
हज़रत हमज़ा रज़ियल्लाहु अन्हु को मदीना में उहुद के शहीदों के साथ दफ़्न किया गया। इब्न इसहाक़ हज़रत अब्दुल्लाह इब्न जहश के परिवार से रिवायत करते हैं कि अब्दुल्लाह को उनके मामा हमज़ा के साथ एक ही क़ब्र में दफ़्न किया गया। मदीना की विरासत-शोध और वर्तमान मानचित्र उसी प्रसिद्ध साझा क़ब्र को उहुद शहीद क़ब्रिस्तान में पहचानते हैं। ४९ हिजरी / ६६९ ईस्वी में बाढ़ के ख़तरे के कारण बताई गई स्थानांतरण-रिवायत और बाद की निर्माण-परतें स्थल के बाद के इतिहास का हिस्सा हैं।
जीवनी और ऐतिहासिक परिचय
जीवनी और वंशावली के स्रोत हज़रत हमज़ा रज़ियल्लाहु अन्हु के परिवार की अधिक विस्तृत तस्वीर सुरक्षित करते हैं। उनके बेटों में यअला, आमिर और अम्मारा के नाम मिलते हैं; अलग पुस्तकों में बच्चों की माताओं की पहचान के कुछ विवरण भिन्न हैं, लेकिन ख़ौला बिन्त क़ैस इब्न क़हद उनकी पत्नियों में मज़बूती से सुरक्षित हैं और सलमा बिन्त उमैस को भी उनकी पत्नी और परिवार की एक माता के रूप में रिवायत किया गया है। बेटियों में उमामा और अमतुल्लाह के नाम मिलते हैं। इब्न अब्द अल-बर्र के अनुसार केवल यअला के बेटे हुए, लेकिन वे भी आगे स्थायी वंश नहीं छोड़ सके। उनकी बहन हज़रत सफ़िय्या बिन्त अब्द अल-मुत्तलिब रज़ियल्लाहु अन्हा हज़रत ज़ुबैर इब्न अल-अव्वाम की माता थीं। हज़रत अब्दुल्लाह इब्न जहश, जिनकी हमज़ा के साथ दफ़्न की रिवायत है, हमज़ा की बहन उमैमा बिन्त अब्द अल-मुत्तलिब के बेटे और इस तरह उनके वास्तविक भांजे थे। इन विवरणों से कोई असमर्थित रजिस्ट्री संबंध नहीं बनाया गया।
इस्लाम से पहले हज़रत हमज़ा रज़ियल्लाहु अन्हु क़ुरैश के प्रतिष्ठित योद्धा वर्ग में थे और शक्तिशाली शिकारी तथा कुशल लड़ाके के रूप में जाने जाते थे। उनके इस्लाम स्वीकार करने की सीरत-रिवायत तब शुरू होती है जब वह शिकार से लौटे और उन्हें बताया गया कि अबू जहल ने सफ़ा के पास नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को अपमानित और पीड़ित किया है। उन्होंने धनुष से अबू जहल को मारा और खुले रूप में मुहम्मद के धर्म का समर्थन घोषित किया। यह घटना पारिवारिक रक्षा से आरम्भ होकर सचेत ईमान में बदली; घटना प्रसिद्ध है, पर मक्की काल की सही तारीख़ पर मतभेद है।
हज़रत हमज़ा के इस्लाम स्वीकार करने का तत्काल सार्वजनिक प्रभाव हुआ। इब्न इसहाक़ की रिवायत, जिसे बाद की जीवनियों ने सुरक्षित रखा, बताती है कि क़ुरैश ने समझा कि नबी को अब बनू हाशिम के एक प्रभावशाली और शक्तिशाली व्यक्ति की रक्षा प्राप्त है, इसलिए उन्होंने कुछ अत्याचार कम किए। उनका महत्त्व केवल शारीरिक बल नहीं था; उनके निर्णय ने दिखाया कि नया धार्मिक विश्वास मक्की क़बीलाई दबाव से ऊपर हो सकता है। उनके साहस ने पीड़ित मुस्लिम समुदाय को भरोसा दिया और उन्हें नबी के सबसे प्रमुख प्रारम्भिक रक्षकों में शामिल किया।
हिजरत के बाद हज़रत हमज़ा रज़ियल्लाहु अन्हु मदीना के मुहाजिर समुदाय में शामिल हुए और प्रारम्भिक संगठित सैन्य दायित्व सँभाले। सीरत और मग़ाज़ी स्रोत उन्हें ईस क्षेत्र की समुद्री दिशा में लगभग तीस मुहाजिरों की टुकड़ी का सेनापति बताते हैं, जिसके पास सफ़ेद ध्वज था। कुछ ग्रंथ इसे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम द्वारा बाँधा गया पहला ध्वज कहते हैं, हालांकि आरम्भिक अभियानों की क्रम-व्यवस्था में इतिहासकारों का मतभेद है। उनका सामना क़ुरैश के बड़े कारवां दल से हुआ, पर मज्दी इब्न अम्र अल-जुहनी ने मध्यस्थता की और युद्ध नहीं हुआ।
बद्र के युद्ध में २ हिजरी में हज़रत हमज़ा उन तीन मुस्लिम योद्धाओं में थे जिन्होंने क़ुरैश की प्रारम्भिक द्वंद्व-चुनौती स्वीकार की। सहीह अल-बुख़ारी सूरह अल-हज्ज की दो विरोधी समूहों से संबंधित एक आयत को इन योद्धाओं से जोड़ती है: एक ओर हमज़ा, अली और उबैदा इब्न अल-हारिस, और दूसरी ओर उत्बा, शैबा और अल-वलीद। हर योद्धा के सामने कौन था, इस पर रिवायतों में अंतर है; निश्चित बात यह है कि हमज़ा उस मुकाबले और मुस्लिम विजय के केंद्रीय पात्र थे। दूसरे वृत्तांत उन्हें क़ुरैश के प्रमुख लड़ाकों की मृत्यु से भी जोड़ते हैं, जिसने बाद में उनके विरुद्ध बदले की भावना को जन्म दिया।
शव्वाल ३ हिजरी, ६२५ ईस्वी में उहुद के युद्ध में हज़रत हमज़ा रज़ियल्लाहु अन्हु अग्रिम पंक्तियों में लड़े। आरम्भिक मुस्लिम बढ़त अनेक तीरंदाज़ों के निर्धारित स्थान छोड़ने के बाद गंभीर अव्यवस्था में बदल गई। बाद की जीवनियाँ उन्हें असाधारण शक्ति से लड़ते और स्वयं को असदुल्लाह कहते हुए वर्णित करती हैं। उनकी शहादत का सबसे मज़बूत विवरण सहीह अल-बुख़ारी में वहशी इब्न हरब की लंबी रिवायत है। वहशी ने कहा कि जुबैर इब्न मुतइम ने बद्र में मारे गए रिश्तेदार का बदला लेने के लिए हमज़ा को मारने पर उसे स्वतंत्र करने का वादा किया था।
वहशी के अनुसार हज़रत हमज़ा ने पहले सिबा इब्न अब्द अल-उज़्ज़ा को मार गिराया और फिर उसके छिपने के स्थान के पास से गुज़रे। वहशी ने भाला फेंका जिससे उनकी शहादत हुई। यह प्रत्यक्ष व्यक्तिगत वर्णन हत्यारे, हत्या की विधि और बदले के कारण को असाधारण स्पष्टता से स्थापित करता है। प्रारम्भिक इतिहास और जीवनी ग्रंथ उनके शरीर के विकृत किए जाने की भी सूचना देते हैं। बाद की प्रसिद्ध कथाएँ अधिक दृश्य और विशिष्ट व्यक्तियों की कार्रवाइयाँ जोड़ती हैं, पर सभी सनद समान मज़बूत नहीं हैं; इसलिए यहाँ मूल विकृति को स्वीकार किया गया है, हर नाटकीय विवरण को नहीं।
नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का हज़रत हमज़ा की दशा देखकर गहरा दुःख सीरत में स्पष्ट रूप से सुरक्षित है। यह भी मिलता है कि उन्हें चिंता थी कि उनकी बहन हज़रत सफ़िय्या अपने भाई की स्थिति देखकर अत्यधिक आहत होंगी। कफ़न और जनाज़े की कुछ रिवायतों में विवरण अलग हैं। उहुद के शहीदों के बारे में अधिक मज़बूत सामान्य प्रमाण यह है कि उन्हें वहीं दफ़्न किया गया जहाँ वे शहीद हुए और मदीना के भीतर नहीं ले जाया गया। हमज़ा पर बार-बार अलग जनाज़ा पढ़ने की रिवायतें उस दिन के सामूहिक दफ़्न नियम के प्रमाण जितनी मज़बूत नहीं हैं।
इब्न इसहाक़ की सीरत में हज़रत अब्दुल्लाह इब्न जहश रज़ियल्लाहु अन्हु के परिवार से यह रिवायत सुरक्षित है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उन्हें उनके मामा हज़रत हमज़ा रज़ियल्लाहु अन्हु के साथ एक क़ब्र में दफ़्न किया, और इब्न इसहाक़ स्पष्ट करते हैं कि यह विशेष विवरण उन्होंने केवल अब्दुल्लाह के परिवार से सुना। मदीना अनुसंधान और अध्ययन केंद्र स्वतंत्र रूप से हमज़ा और अब्दुल्लाह की पारंपरिक क़ब्र को उहुद शहीद क़ब्रिस्तान की विशेष रूप से पहचानी गई साझा क़ब्र बताता है। वर्तमान मानचित्र भी उसी पहचाने गए क्षेत्र में हमज़ा की क़ब्र का अलग निशान दर्ज करते हैं और इस अभिलेख के संरचित भौगोलिक ख़ानों में उसी वर्तमान निशान का बिंदु रखा गया है। इस प्रकार प्रमाण ऐतिहासिक रूप से पहचानी गई साझा क़ब्र और सत्यापित वर्तमान स्थान दोनों का समर्थन करते हैं, लेकिन आज के दिखाई देने वाले निशान को मूल दफ़्न-संरचना नहीं मानते।
मदीना की विरासत-अध्ययन सामग्री बताती है कि पहली दफ़्न युद्धक्षेत्र के पास हुई और ४९ हिजरी / ६६९ ईस्वी में बाढ़ के ख़तरे के कारण अवशेषों को वर्तमान क़ब्रिस्तान के पहचाने गए स्थान पर ले जाने की रिवायत है। यह स्थान के बारे में बाद की ऐतिहासिक रिपोर्ट है, सातवीं सदी का समकालीन दस्तावेज़ नहीं। यही अध्ययन बाद के गुम्बदों, घेरों, संदूकों, मस्जिद तथा निर्माण और हटाने के अनेक चरणों को भी दर्ज करता है। ये स्थापत्य चरण स्मरण और सुरक्षा के इतिहास का भाग हैं; वे मूल क़ब्र-निशान या भवन के बिना परिवर्तन बचे रहने को सिद्ध नहीं करते। इसलिए वर्तमान घेरा पारंपरिक साझा क़ब्र-क्षेत्र को दर्शाता है, जबकि उसकी दिखाई देने वाली सतह बाद के हस्तक्षेपों का परिणाम है।
हज़रत हमज़ा रज़ियल्लाहु अन्हु का ऐतिहासिक महत्त्व रिश्तेदारी, नैतिक चुनाव, नेतृत्व और बलिदान के मेल में है। उन्होंने अपने सामाजिक स्थान से नबी की रक्षा की, मदीना के आरम्भिक अभियानों में दायित्व लिया, बद्र में प्रमुख भूमिका निभाई और उहुद में शहीद हुए। असदुल्लाह और सैय्यद अल-शुहदा की उपाधियाँ मुस्लिम स्मृति में उनसे गहराई से जुड़ीं, यद्यपि अलग-अलग हदीसी रूपों की शक्ति समान नहीं है। इस प्रकार उनकी जीवनी में सहीह रिवायतें, प्रारम्भिक सीरत, परिवार से चली दफ़्न-स्मृति और बाद की स्मारक परंपरा एक साथ आती हैं, पर हर परत को उसके अपने प्रमाण-स्तर पर रखा जाता है।
ऐतिहासिक महत्व और विरासत
उनका मदीनी जीवन प्रारम्भिक अभियान-व्यवस्था, बद्र की शुरुआती द्वंद्व-लड़ाई और उहुद की अग्रिम पंक्ति को जोड़ता है। ये घटनाएँ समझाती हैं कि पहला मुस्लिम समुदाय असुरक्षा से संगठित सार्वजनिक दायित्व तक कैसे पहुँचा। वे यह भी सिखाती हैं कि सैन्य प्रसिद्धि को सामान्य वीर-प्रशंसा के बजाय विशिष्ट और प्रमाणित घटनाओं से लिखना चाहिए।
उनकी शहादत उहुद की सबसे बड़ी क्षतियों में थी। वहशी की विस्तृत गवाही, शरीर-विकृति की रिवायतें और नबी का दुःख युद्ध की हिंसा और समुदाय की मानवीय कीमत दोनों को सुरक्षित रखते हैं। शहीदों को युद्धस्थल पर दफ़्न करने ने उहुद की भूमि को नबी के युग की ऐतिहासिक स्मृति का भाग बना दिया।
हज़रत अब्दुल्लाह इब्न जहश रज़ियल्लाहु अन्हु के साथ पहचानी गई साझा क़ब्र का प्रमाण असाधारण महत्व रखता है क्योंकि यह क़ब्रिस्तान की अधिकांश अनिर्दिष्ट क़ब्रों की तुलना में अधिक विशिष्ट पहचान रखती है। इसका प्रारंभिक आधार इब्न इसहाक़ द्वारा स्पष्ट रूप से परिवार से ली गई रिवायत है, जिसे मदीना अनुसंधान और अध्ययन केंद्र की उसी साझा क़ब्र की पहचान और हज़रत हमज़ा की अलग वर्तमान मानचित्र-निशानी और मज़बूत करती है। इसलिए वर्तमान बिंदु को संरचित भौगोलिक ख़ानों में उच्च विश्वास के साथ दर्ज किया गया है, लेकिन ४९ हिजरी / ६६९ ईस्वी की रिपोर्ट की गई स्थानांतरण-रिवायत और बाद के स्थापत्य बदलाव सावधानी की मांग करते हैं: साझा क़ब्र की ऐतिहासिक पहचान और उसकी मूल सतह का बिना बदले रहना एक ही बात नहीं है।
पारिवारिक संबंध
स्रोत
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Sahih al-Bukhari | 4744 | Badr champions
Sahih Muslim | 1448 | Hamza as the Prophet's foster-brother
Al-Sirah al-Nabawiyyah | Ibn Hisham transmitting Ibn Ishaq | shared-burial family report
Medina Research and Studies Center | https://mawsuea.mrsc.org.sa/ar/milestones/141 | shared grave and site history
चित्र दीर्घा
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